संवाद : केंद्र के चेयरमैन सीपी संचेती से दिल की बात
दिलीप कुमार पुरोहित, ग्रुप एडिटर, राइजिंग भास्कर
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प्रतिभाओं को शारीरिक अक्षमताओं की वजह से आगे बढ़ने से नहीं रोका जा सकता। प्रतिभाएं अपना रास्ता खुद बनाती है। बस जरूरत है उन्हें सही गाइडेंस की और प्रोत्साहित करने की। शहर में एक ऐसा संस्थान है जो विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के शिक्षण, पुनर्वास और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में लंबे समय से कार्य कर रहा है। इस संस्थान का नाम है- नवज्योति मनोविकास केंद्र। यह केंद्र आज उन बच्चों के लिए आशा की किरण बन चुका है, जो सेरेब्रल पॉल्सी, बौद्धिक अक्षमता, ऑटिज्म, डाउन सिंड्रोम और अन्य बहुविकलांगताओं से प्रभावित हैं। इसके ऊर्जावान चेयरमैन सीपी संचेती से राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित ने लंबी बातचीत की। यहां प्रस्तुत है संपादित अंश-
प्रश्न 1: संचेती साहब, सबसे पहले आप हमें यह बताइए कि नवज्योति मनोविकास केंद्र की शुरुआत कब और किन उद्देश्यों से हुई थीं?
उत्तर (सी.पी. संचेती): नवज्योति मनोविकास केंद्र की स्थापना 1988 में हुई थी। उस समय समाज में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को लेकर जागरूकता बहुत सीमित थी। ऐसे बच्चों को शिक्षा और देखभाल का अवसर देने वाली संस्थाएं गिनी-चुनी थीं। हमने महसूस किया कि यदि इन बच्चों को समय पर सही शिक्षा, प्रशिक्षण और सहयोग नहीं मिला तो उनकी असली प्रतिभा और क्षमताएं दबकर रह जाएंगी। इसी सोच के साथ यह केंद्र शुरू किया गया। आज 36 वर्षों से अधिक की यात्रा पूरी करते हुए हमें गर्व है कि यह केंद्र हज़ारों बच्चों और उनके परिवारों के लिए आशा की किरण बन चुका है जो सेरेब्रल पॉल्सी, बौद्धिक अक्षमता, ऑटिज्म, डाउन सिंड्रोम और अन्य बहुविकलांगताओं से प्रभावित हैं।
प्रश्न 2: संस्था बच्चों को शिक्षा-पुनर्वास की मुख्यधारा से कैसे जोड़ रही है?
उत्तर (सी.पी. संचेती): हमारा उद्देश्य बहुत स्पष्ट है—विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को शिक्षा और पुनर्वास की मुख्यधारा से जोड़ना। इसके लिए हम शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, चिकित्सकीय सहयोग और रोजगार उपलब्ध कराने पर ध्यान देते हैं। हमारा सपना है कि हर बच्चा आत्मनिर्भर बने, समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जीए और खुद को बोझ नहीं बल्कि एक योगदानकर्ता महसूस करे।
प्रश्न 3: वर्तमान में कितने विद्यार्थी इस संस्था से लाभान्वित हो रहे हैं और उन्हें किस तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं?
उत्तर (सी.पी. संचेती): वर्तमान में 125 विद्यार्थी यहां अध्ययन और प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। हम हर बच्चे की क्षमता, आयु और आवश्यकताओं के आधार पर उन्हें अलग-अलग कक्षाओं में रखते हैं। प्रत्येक कक्षा में 8–10 विद्यार्थी होते हैं ताकि शिक्षक व्यक्तिगत ध्यान दे सकें। बच्चों के प्रवेश पर पुनर्वास विशेषज्ञ और विशेष शिक्षक उनका परीक्षण करते हैं और फिर उनकी क्षमता अनुसार शिक्षा व प्रशिक्षण की योजना बनाई जाती है।
प्रश्न 4: आपने शिक्षा और प्रशिक्षण की जो विशेष पद्धतियां विकसित की हैं, उनके बारे में विस्तार से बताइए।
उत्तर (सी.पी. संचेती): हम शिक्षा को पूरी तरह से बच्चों की क्षमता और रुचि के अनुरूप ढालते हैं। उदाहरण के लिए—
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स्मार्ट क्लासरूम में प्रोजेक्टर और शैक्षणिक वीडियो द्वारा कहानियां, कविताएं और चित्रों से सीखने का अवसर मिलता है।
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व्यावसायिक प्रशिक्षण के अंतर्गत बच्चे चॉक, मोमबत्ती, डिटर्जेंट, साबुन, कला-शिल्प, हस्तनिर्मित वस्तुएं और पेंटिंग बनाना सीखते हैं। राखी निर्माण जैसे कार्यों में वे अपनी रचनात्मकता का पूरा प्रदर्शन करते हैं।
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फिजियोथेरेपी सेंटर में योग्य विशेषज्ञ बच्चों को व्यक्तिगत आधार पर उपचार देते हैं, जिससे उनकी शारीरिक चुनौतियां कम होती हैं।
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साथ ही AIIMS जोधपुर से हर महीने चिकित्सकों की टीम आती है जो बच्चों की स्वास्थ्य जांच और अभिभावकों की काउंसलिंग करती है।
प्रश्न 5: संस्था के दैनिक कार्यक्रम किस तरह से बच्चों को सर्वांगीण विकास की दिशा में ले जाते हैं?
उत्तर (सी.पी. संचेती): हर दिन की शुरुआत प्रातः सभा से होती है जिसमें प्रार्थना, योग, गीत, नृत्य और स्तुति गान कराया जाता है। इसके बाद शैक्षणिक गतिविधियां होती हैं, फिर व्यावसायिक प्रशिक्षण। बच्चों को सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई जाती है। योग, बागवानी, संगीत, नृत्य, खेलकूद और चलचित्र प्रदर्शन जैसी गतिविधियां उनके आत्मविश्वास को बढ़ाती हैं। हमारा मानना है कि शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबें पढ़ाना नहीं बल्कि जीवन कौशल सिखाना है।
प्रश्न 6: आपने कहा कि बच्चों की रचनात्मकता को बढ़ावा दिया जाता है। क्या इनकी बनाई वस्तुओं को कहीं प्रदर्शित या बेचा भी जाता है?
उत्तर (सी.पी. संचेती): हां, हमारे बच्चे जो भी उत्पाद बनाते हैं—जैसे मोमबत्तियां, चॉक, डिटर्जेंट, पेंटिंग्स या राखियां—उन्हें विभिन्न संस्थानों और प्रदर्शनियों में बेचा जाता है। कई बार ये उत्पाद मेलों और प्रदर्शनियों में प्रदर्शित होते हैं जहां लोगों से इन्हें सराहना भी मिलती है। इससे बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है और वे महसूस करते हैं कि उनका काम समाज के लिए मूल्यवान है।
प्रश्न 7: खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियों में बच्चों का प्रदर्शन कैसा रहता है?
उत्तर (सी.पी. संचेती): हमारे विद्यार्थी जिला, राज्य, राष्ट्रीय और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं। हमें गर्व है कि हमारे ही दो विद्यार्थी, प्रवीण और पूनम भाटी, ने ग्रीस और ऑस्ट्रिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय स्पेशल ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। जब वे भारतीय ध्वज लेकर मैदान में उतरे, तो हमारी आंखों में आंसू आ गए—खुशी और गर्व के आंसू। यह हमारे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।
प्रश्न 8: माता-पिता और अभिभावकों की इसमें क्या भूमिका रहती है?
उत्तर (सी.पी. संचेती): अभिभावक हमारे लिए संस्था का अहम हिस्सा हैं। हम नियमित काउंसलिंग सत्र करते हैं, जिससे वे बच्चों की प्रगति और ज़रूरतों को समझ सकें। कई बार माता-पिता हताश हो जाते हैं, उन्हें लगता है कि उनका बच्चा कभी सामान्य जीवन नहीं जी पाएगा। लेकिन जब वे यहां बच्चों को आत्मनिर्भर बनते देखते हैं तो उनका विश्वास लौट आता है। हमारा प्रयास है कि परिवार और संस्था मिलकर बच्चे को बेहतर भविष्य दें।
प्रश्न 9: अंत में, आप पाठकों और समाज को क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर (सी.पी. संचेती): मेरा यही कहना है कि किसी भी विकलांगता को कमजोरी न समझें। हर बच्चे में एक अनूठी प्रतिभा होती है। हमें बस उन्हें अवसर और सही दिशा देनी है। अगर समाज संवेदनशील होकर हाथ बढ़ाए, तो ये बच्चे बोझ नहीं बल्कि समाज की शक्ति बन सकते हैं। मैं सभी पाठकों से अपील करता हूं कि विशेष बच्चों को अपनाएं, उन्हें स्वीकारें और उन्हें वह सम्मान दें जिसके वे हकदार हैं।
उम्मीद का दीपक : हर बच्चा समाज का उज्वल हिस्सा
इस पूरी बातचीत में संचेती साहब ने साफ शब्दों में बताया कि दिव्यांगता किसी की पहचान को खत्म नहीं करती। यदि शिक्षा, प्रशिक्षण और अवसर मिले तो हर बच्चा समाज का उज्ज्वल हिस्सा बन सकता है। नवज्योति मनोविकास केंद्र इसी सोच के साथ 36 वर्षों से काम कर रहा है और आज सैकड़ों परिवारों के लिए उम्मीद का दीपक बन चुका है।













