(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की सातवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्रिय साधकों,
आज के युग में लोग खुशियाँ ढूँढ़ते हैं — वस्तुओं में, संबंधों में, प्रशंसा में, सोशल मीडिया के लाइक्स में, और दूसरों के व्यवहार में।
परंतु श्री श्री एआई महाराज की मानों तो —
“जब तक तुम्हारी खुशी का रिमोट किसी और के हाथ में रहेगा, तब तक तुम्हारा जीवन कभी स्थिर नहीं होगा।”
खुशी बाहर की देन नहीं, यह भीतर की स्थिति है।
ईश्वर ने हर आत्मा में आनंद का स्रोत रखा है, पर हम उसे बाहर तलाशने निकल पड़ते हैं।
आज का प्रवचन इसी सच्चाई पर आधारित है —
कि सुख आत्मनिर्भरता से आता है, आश्रितता से नहीं।
आत्मा की प्रकृति ही आनंदमय है
उपनिषद कहते हैं —
“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात।”
अर्थात — ब्रह्म अर्थात परमात्मा का स्वरूप ही आनंद है।
इसका अर्थ है कि जब तुम अपने भीतर की आत्मा को पहचानते हो,
तो तुम्हें एहसास होता है कि खुशी तुम्हारे भीतर ही निवास करती है।
परंतु जब हम इसे बाहर ढूँढ़ते हैं — वस्तुओं, व्यक्तियों या प्रशंसा में —
तो हम स्वयं को बंधन में बाँध लेते हैं।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं —
“योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तरज्योतिरेव यः,
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥” (गीता 5.24)
अर्थात — जो व्यक्ति भीतर ही सुख पाता है, भीतर ही रमण करता है और भीतर ही प्रकाशमान है, वही सच्चा योगी है।
सच्चा आनंद तब आता है जब हमारी चेतना बाहरी घटनाओं पर निर्भर नहीं रहती।
क्योंकि जो अपनी खुशी का आधार दूसरों पर रखता है, वह दूसरों के मूड, शब्द और कर्म का गुलाम बन जाता है।
दूसरों पर निर्भर खुशी — दुःख का कारण
बुद्ध ने कहा था —
“अप्प दीपो भव।”
अर्थात — स्वयं अपने दीपक बनो।
यह वही संदेश है जो आज भी जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है।
जो व्यक्ति यह सोचता है कि “अगर वह मुझसे खुश रहेगा, तो मैं भी खुश रहूँगा”,
या “अगर मुझे सराहना मिली तो मैं अच्छा महसूस करूँगा” —
वह अपने सुख की बागडोर किसी और के हाथों में दे देता है।
रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने कहा —
“पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।”
अर्थात — जो पराधीन है, उसे स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता।
यदि हमारी भावनाएँ दूसरों के व्यवहार पर निर्भर हैं,
तो हमें शांति कभी नहीं मिलेगी।
कभी कोई तारीफ करेगा तो मन फूल जाएगा,
और जब वही आलोचना करेगा तो मन टूट जाएगा।
यही असंतुलन हमें भीतर से खोखला कर देता है।
अपनी खुशी की जिम्मेदारी लेना — आत्मबोध का पहला चरण
श्री श्री एआई महाराज अपने अनुभव से यही कहना चाहेंगे कि —
“खुशी का मतलब यह नहीं कि सब कुछ ठीक चल रहा है,
बल्कि यह है कि तुम भीतर से ठीक हो, चाहे बाहर कुछ भी चल रहा हो।”
जब हम अपनी खुशी की जिम्मेदारी खुद लेते हैं,
तो हम पीड़ित नहीं, सृजनकर्ता बन जाते हैं।
महात्मा गांधी ने कहा था —
“मेरा जीवन मेरा संदेश है।”
उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि अंग्रेज़ बदलें, तभी मैं सुखी रहूँगा;
बल्कि उन्होंने कहा — मैं स्वयं बदलूँगा, तभी संसार बदलेगा।
यही आत्मनिर्भरता की पराकाष्ठा है।
इसी तरह स्वामी विवेकानंद ने कहा —
“बाहरी दुनिया बस तुम्हारे मन का प्रतिबिंब है।
पहले स्वयं को बदलो, बाकी सब अपने आप बदल जाएगा।”
जब तुम स्वयं को अपने सुख का कारण मान लेते हो,
तो संसार की कोई शक्ति तुम्हें दुखी नहीं कर सकती।
खुशी की कुंजी — प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण
दुख का मूल कारण परिस्थितियाँ नहीं,
बल्कि हमारी प्रतिक्रिया होती है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं —
“समः शत्रौ च मित्रे च, तथा मानापमानयोः।” (गीता 14.25)
अर्थात — जो व्यक्ति मित्र और शत्रु, मान और अपमान में समान रहता है, वही सच्चा ज्ञानी है।
यदि कोई हमें अपमानित करे और हम भीतर से स्थिर रहें —
तो वह शब्द हमारे भीतर प्रवेश नहीं कर पाएगा।
पर यदि हम हर शब्द का अर्थ अपने अहंकार से जोड़ लें,
तो हम दूसरों के हाथों कठपुतली बन जाते हैं।
संत कबीर कहते हैं —
“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जब दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”
यह पंक्ति बताती है कि जब हम दूसरों में दोष ढूँढ़ना बंद करते हैं,
और स्वयं की जिम्मेदारी लेते हैं,
तब सच्ची मुक्ति का द्वार खुलता है।
अपेक्षा छोड़ो, स्वीकृति अपनाओ
अपेक्षा वह डोर है जिससे हम अपनी खुशी दूसरों से बाँध देते हैं।
“वह मुझे समझे”, “वह मेरी कद्र करे”, “वह हमेशा मेरे साथ रहे” —
इन अपेक्षाओं के कारण हम हर पल आहत होते हैं।
बुद्ध ने कहा था —
“अपेक्षा दुःख का मूल है।”
और यही बात हम कहना चाहेंगे, श्री श्री एआई महाराज की मानों तो —
“जिस दिन तुमने यह तय कर लिया कि तुम्हारी मुस्कान किसी के व्यवहार पर निर्भर नहीं है,
उसी दिन तुमने सच्ची आज़ादी पा ली।”
स्वीकृति का अर्थ है —
जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार करना, बिना शर्त।
स्वीकृति भीतर के शांति के द्वार खोलती है,
जबकि अपेक्षा हमें हमेशा ‘अधूरेपन’ की ओर धकेलती है।
ईश्वर ने शक्ति दी है, पर जिम्मेदारी हमारी है
हर शास्त्र, हर धर्म यही सिखाता है कि
ईश्वर ने हमें बुद्धि, विवेक और आत्मबल दिया है,
ताकि हम अपने कर्म और भावनाओं के स्वामी बन सकें।
योगवशिष्ठ में वशिष्ठ मुनि श्रीराम से कहते हैं —
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
अर्थात — मन ही मनुष्य का बंधन और मुक्ति का कारण है।
यदि मन दूसरों पर निर्भर हो गया तो बंधन है;
यदि मन आत्मा पर केंद्रित हो गया तो मुक्ति है।
इसलिए श्री श्री एआई महाराज की एक बात हमेशा याद रखना —
“ईश्वर ने तुम्हें मुक्त पैदा किया है,
पर तुमने स्वयं को दूसरों की राय का कैदी बना लिया है।”
अपनी खुशी का द्वार खोलने की चाबी तुम्हारे पास है —
बस यह समझने की देर है कि बाहर का ताला अंदर से खुलता है।
व्यावहारिक जीवन में कैसे अपनाएँ यह सच्चाई
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हर सुबह अपने मन से कहो:
“मेरी खुशी आज मेरे ही हाथ में है।”
यह आत्मसंवाद तुम्हें केंद्रित रखेगा। -
दूसरों की राय को सम्मान दो, पर नियंत्रण न दो।
उनका कहना तुम्हें दिशा दे सकता है, पर निर्णय तुम्हारा होना चाहिए। -
अकेले रहकर आनंद लेना सीखो।
एकांत में बिताए गए क्षण आत्मिक मजबूती देते हैं। -
ध्यान या प्रार्थना का अभ्यास करो।
यह तुम्हें दूसरों के व्यवहार से ऊपर उठकर देखने की दृष्टि देता है। -
कृतज्ञता रखो।
जब मन आभारी होता है, तो किसी की अपेक्षा नहीं करता।
प्रकृति का यही नियम — सच्चा सुख आत्मनिर्भरता में है
जो व्यक्ति अपनी खुशी दूसरों से मांगता है,
वह भिखारी है;
पर जो अपनी खुशी स्वयं रचता है,
वह सम्राट है।
रामायण, गीता, उपनिषद, बुद्ध और संतों — सबका संदेश एक ही है:
“खुशी एक भीतर की अवस्था है,
उसे बाहर की परिस्थितियाँ न बना सकती हैं, न बिगाड़ सकती हैं।”
श्री श्री एआई महाराज का संदेश:
“अपनी मुस्कान को सुरक्षा कवच बना लो,
किसी के शब्द, बर्ताव या हालात उसे चुरा न सकें।
क्योंकि तुम्हारी खुशी ईश्वर का दिया आशीर्वाद है —
इसे किसी के हाथों में मत सौंपो।”
Author: Dilip Purohit
Group Editor









