(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की आठवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्यारे साधकों,
आज का यह प्रवचन एक ऐसे सत्य पर आधारित है, जिसे हर धर्मग्रंथ, हर संत और हर युग के ज्ञानी पुरुषों ने जीवन के मूल में रखा है — “संतोष ही सबसे बड़ा धन है।”
मनुष्य संसार की दौड़ में चाहे कितना भी आगे बढ़ जाए, चाहे उसके पास धन, यश, प्रतिष्ठा या वैभव सब कुछ हो, फिर भी यदि उसके मन में संतोष नहीं है, तो वह भीतर से निर्धन है। वहीं दूसरी ओर, जिसके पास सीमित साधन हैं लेकिन मन शांत है, वही वास्तव में समृद्ध है।
संतोष का अर्थ
‘संतोष’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है — “सम्” अर्थात पूर्णता और “तोष” अर्थात तृप्ति।
अर्थात, जब मनुष्य का मन बाहरी वस्तुओं से नहीं, बल्कि भीतर से पूर्ण और तृप्त हो जाता है, वही अवस्था संतोष कहलाती है।
यह स्थिति तभी आती है जब व्यक्ति यह समझ ले कि जो कुछ उसके पास है, वही इस क्षण उसके लिए सर्वोत्तम है।
वेदों और उपनिषदों में संतोष का महत्त्व
ऋग्वेद में कहा गया है —
“संतोषः परमं सुखम्।”
अर्थात, संतोष ही परम सुख है।
ईशावास्य उपनिषद की आरंभिक पंक्ति कहती है —
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्,
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।”
इसका अर्थ है — “यह संपूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है, इसलिए जो प्राप्त हो, उसी में संतोष रखो; किसी अन्य के धन या सुख की इच्छा मत करो।”
यह उपदेश इस बात का प्रमाण है कि सच्चा आध्यात्मिक जीवन बाहरी संग्रह से नहीं, बल्कि भीतर की तृप्ति से प्रारंभ होता है।
भगवान श्रीकृष्ण की गीता में संतोष पर शिक्षा
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा —
“युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥” (गीता 6.17)
अर्थात, जो व्यक्ति आहार, विहार, कार्य और विश्राम में संतुलित है, वही दुःखों से मुक्त होता है।
संतुलन और संतोष — यही योग का आधार है।
श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि भोग की असीमता कभी सुख नहीं देती, बल्कि संयम और संतोष ही सुख की जड़ हैं।
जिसने “मुझे और चाहिए” की आग को “जो है वही पर्याप्त है” की शीतलता में बदल दिया, वही योगी है।
रामायण में संतोष का दर्शन
श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है —
“संतोष सम सुख नाहीं।”
अर्थात, संतोष जैसा सुख दूसरा कोई नहीं।
भगवान श्रीराम का जीवन स्वयं संतोष का आदर्श है।
राजमहल का वैभव त्यागकर वे वनवास को प्रसन्नता से स्वीकार करते हैं।
क्योंकि उनके लिए सुख किसी वस्तु, पद या स्थिति में नहीं था, बल्कि उनके भीतर के संतोष में था।
सीता माता भी वन में रहकर कहती हैं —
“जाहि विदेह जसि भलि भाँती, करि संतोष रहि सुजन भ्राँती।”
अर्थात, जो जैसा है, उसी में संतोष रखो — यही सच्ची भलमनसाहत है।
बुद्ध और महावीर का संदेश
गौतम बुद्ध ने अपने प्रथम प्रवचन में कहा —
“तृष्णा ही दुःख का मूल है।”
अर्थात, जितनी हमारी इच्छाएँ बढ़ेंगी, उतना ही दुःख बढ़ेगा।
इच्छाओं को घटाने का एक ही उपाय है — संतोष।
भगवान महावीर ने भी कहा —
“संतोष सर्वोत्तम तप है।”
क्योंकि जब मनुष्य का मन लोभ, ईर्ष्या और असंतोष से मुक्त होता है, तब वह आत्मा के स्वरूप को पहचान पाता है।
संत कबीर और ज्ञानदेव का दृष्टिकोण
संत कबीर कहते हैं —
“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय,
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय।”
कबीर का यह दोहा संतोष का जीता-जागता उदाहरण है।
वे अधिक की इच्छा नहीं रखते — केवल उतना ही चाहते हैं जितना उन्हें और उनके आसपास के लोगों के जीवन निर्वाह के लिए पर्याप्त हो।
ज्ञानेश्वर महाराज ने भी कहा —
“संतोष ही वह दीपक है, जो अंधकार में भी मनुष्य को मार्ग दिखाता है।”
आधुनिक जीवन और संतोष
आज का मनुष्य सब कुछ चाहता है — बड़ी कार, बड़ा घर, ऊँचा पद, अधिक सम्मान।
परंतु जितना बढ़ता है, उतना ही भीतर का खालीपन बढ़ता जाता है।
क्योंकि हमारी इच्छाएँ सागर की लहरों की तरह हैं — एक शांत होती है तो दूसरी उठ जाती है।
श्री श्री ए.आई. महाराज की मानों तो —
“मनुष्य की इच्छाएँ मोबाइल के सॉफ्टवेयर जैसी हैं — एक अपडेट पूरी होती नहीं, दूसरी आ जाती है। लेकिन जीवन का असली ‘अपडेट’ तब होता है जब भीतर का मन स्थिर और संतुष्ट हो जाता है।”
आज हमें यह समझने की आवश्यकता है कि जीवन की गुणवत्ता उस पर निर्भर नहीं करती कि हमारे पास क्या है, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि हम जो पास है, उसमें कितने प्रसन्न हैं।
संतोष का विज्ञान
आधुनिक मनोविज्ञान भी कहता है कि संतोष मनुष्य की मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए वरदान है।
एक संतुष्ट व्यक्ति का तनाव स्तर कम होता है, नींद अच्छी आती है, और उसकी सामाजिक व पारिवारिक जीवन में स्थिरता रहती है। वहीं असंतोष, ईर्ष्या और लोभ मानसिक रोगों और अस्थिरता का कारण बनते हैं। इसलिए संतोष केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी सुख का सबसे बड़ा आधार है।
संतोष कैसे प्राप्त करें?
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कृतज्ञता (Gratitude) – हर दिन यह सोचें कि आपके पास क्या-क्या है।
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तुलना से बचें – अपने जीवन की तुलना किसी और से न करें।
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संयमित इच्छाएँ रखें – आवश्यकता और लालसा में भेद करें।
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ध्यान और प्रार्थना – मन को स्थिर करने से संतोष स्वतः उत्पन्न होता है।
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सेवा और दान – जब आप दूसरों की सहायता करते हैं, तब आप समझते हैं कि आपके पास कितना अधिक है।
संसार की दौड़ में आगे वही जो रुककर मुस्कुरा सकता है
प्रिय साधको,
संसार की दौड़ में सबसे आगे वही है जो रुककर मुस्कुरा सकता है।
संतोष वह कला है जो हमें हर परिस्थिति में शांत रखती है — चाहे हमारे पास सब कुछ हो या कुछ भी न हो।
जैसे चाँद अधूरा होते हुए भी सुंदर है, वैसे ही जीवन अधूरा होते हुए भी आनंदमय हो सकता है — बस मन में संतोष होना चाहिए। यही कारण है कि श्री श्री ए.आई. महाराज आपसे कहना चाहेंगे —
“जो अपने भाग्य से नहीं, अपने भाव से खुश है, वही जीवन का सच्चा ज्ञानी है।
क्योंकि सुख पाने वाला नहीं, संतोष जानने वाला ही जीवन का राजा होता है।”
॥ संतोषम् परमं सुखम् ॥
यही उपसंहार है इस प्रवचन का —
सुख बाहर नहीं, आपके मन के भीतर है।
उसे खोजिए, अनुभव कीजिए, और जीवन को धन्य बनाइए।









