(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की नौंवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्यारे साधकों,
आज का यह संदेश मानव जीवन के सबसे सुंदर, सरल और दिव्य सिद्धांत पर आधारित है—“जितना हो सके लोगों की मदद करें, किसी का दिल ना दुखाएं।” यह वाक्य सुनने में भले ही छोटा लगे, परंतु इसका अर्थ पूरे धर्म, आध्यात्म और मानवता का सार अपने भीतर समेटे हुए है। यही उपदेश श्रीकृष्ण ने गीता में दिया, यही संदेश रामायण में तुलसीदास जी ने कहा, यही शिक्षा बुद्ध ने करुणा के माध्यम से दी, और यही मार्ग महावीर स्वामी ने अहिंसा के रूप में बताया।
करुणा और सेवा ही सच्चा धर्म
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं –
“परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई।”
अर्थात, दूसरों के हित से बढ़कर कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा पहुँचाने से बढ़कर कोई अधर्म नहीं।
जब हम किसी की मदद करते हैं, तब हम केवल उसका जीवन नहीं सँवारते, बल्कि अपनी आत्मा को भी ऊँचाई देते हैं। ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में दीप जलाने या भजन गाने में नहीं, बल्कि उस दीपक को किसी की अंधेरी ज़िंदगी में उजाला देने में है।
संतों और महापुरुषों का जीवन – मदद की जीती-जागती मिसाल
श्री राम जब वनवास के लिए निकले, तब उन्होंने वनवास को दुःख नहीं माना। वह प्रत्येक वनवासी से प्रेमपूर्वक मिले, उन्हें गले लगाया, और उनका जीवन सुधारा। उन्होंने कहा – “सेवा ही सबसे बड़ा सुख है।” जब भगवान स्वयं सेवा का उदाहरण देते हैं, तो मनुष्य क्यों पीछे रहे?
गौतम बुद्ध ने भी यही कहा – “किसी को दुखी देखकर यदि तुम्हारे भीतर करुणा नहीं उठती, तो तुम्हारा ध्यान अधूरा है।” बुद्ध का जीवन दूसरों के दुःख दूर करने की साधना थी। वे राजमहल छोड़कर भिक्षा पात्र लेकर निकले ताकि किसी भूखे को भोजन मिले, किसी दुखी को सांत्वना मिले।
संत कबीर ने भी कहा –
“माल न माया, तज दे जग सारा,
दिल ना दुखायो किसी का प्यारा।”
वे कहते हैं कि धन, वस्तु, नाम-सम्मान सब व्यर्थ हैं यदि किसी के हृदय को आघात पहुँचाकर आप अपनी शांति ढूंढ रहे हैं।
किसी का दिल दुखाना – आत्मा का पतन
हर व्यक्ति में ईश्वर का अंश विद्यमान है। जब आप किसी का दिल दुखाते हैं, तो वास्तव में आप उसी ईश्वर को चोट पहुँचाते हैं जो हर जीव के भीतर बसता है। श्रीमद्भागवत पुराण में कहा गया है –
“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।”
अर्थात, ईश्वर हर जीव के हृदय में निवास करते हैं।
यदि हम यह समझ लें कि हर व्यक्ति के भीतर वही परमात्मा है, तो फिर हम कैसे किसी का अपमान कर सकते हैं, किसी को तुच्छ कह सकते हैं? किसी को अपशब्द कहना, किसी की हँसी उड़ाना, या किसी की कठिनाई पर हर्षित होना – यह सब आत्मिक पतन के संकेत हैं।
मदद का अर्थ केवल धन नहीं – भाव है सबसे बड़ा
लोग अक्सर सोचते हैं कि मदद का अर्थ है – पैसे देना या दान करना। परंतु – “सच्ची मदद वह है जो प्रेम से प्रेरित हो, अहंकार से नहीं।”
यदि कोई व्यक्ति दुखी है, तो उसकी बात ध्यान से सुन लेना भी मदद है। किसी के अकेलेपन में उसके पास बैठ जाना भी दया है। किसी निराश आत्मा को हौसला देना, किसी रोते बच्चे को मुस्कुराना सिखाना, किसी बुजुर्ग के पैर दबा देना – ये सब दैवी कर्म हैं।
महात्मा गांधी ने कहा था –
“जो दूसरों के लिए जीना सीख गया, वही सच में जीना जान गया।”
गांधी जी का जीवन इस सिद्धांत का प्रतीक था। उन्होंने अपने सुख का त्याग किया ताकि समाज के अंधकार में दीपक जला सकें।
दूसरों को दुख न पहुँचाने का विज्ञान
“किसी का दिल ना दुखाएं” — यह केवल नैतिक वाक्य नहीं, बल्कि एक गूढ़ आध्यात्मिक विज्ञान है। जब हम किसी के प्रति नकारात्मक भावना रखते हैं, तो वह ऊर्जा हमारे भीतर ही विष बनकर घूमती है।
योगसूत्रों में पतंजलि ने कहा है –
“अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः।”
अर्थात, जो व्यक्ति अहिंसा में दृढ़ होता है, उसके समीप वैरभाव स्वतः समाप्त हो जाता है।
यदि हम किसी को चोट पहुँचाने से बचें, तो हमारे चारों ओर का वातावरण भी शांत और सौम्य हो जाता है।
रामचरितमानस में दया और सेवा का आदर्श
तुलसीदास जी ने लिखा –
“दयावान जीवहि न पर पीड़ा,
करुणा बिना न होई प्रीति।”
भगवान राम ने निषादराज गुह को गले लगाया, शबरी के झूठे बेर प्रेम से खाए, और वानरों को भाई बना लिया। यह वही संदेश है — मदद करो, दिल मत दुखाओ। सेवा और प्रेम में ही ईश्वर का वास है।
राम ने कभी किसी को छोटा नहीं माना। उन्होंने कहा – “जाति-पाति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।” जब प्रभु तक पहुँचने का मार्ग प्रेम से जाता है, तो नफरत की कोई जगह नहीं रहती।
आधुनिक जीवन में इसका प्रयोग
आज का समय तेज़ी और स्पर्धा का है। हर कोई आगे बढ़ना चाहता है, परंतु अगर इस दौड़ में हम संवेदनशीलता खो दें, तो यह प्रगति नहीं, पतन है।
यदि आप कार्यालय में हैं, तो किसी अधीन कर्मचारी से विनम्रता से बात करें — यही सेवा है।
यदि आप विद्यार्थी हैं, तो किसी मित्र को पढ़ाई में सहायता दें — यही सेवा है।
यदि आप गृहस्थ हैं, तो किसी भूखे को भोजन करवाएँ, किसी घायल जानवर को सहलाएँ — यही सेवा है।
सेवा करने के लिए कोई बड़ा अवसर नहीं चाहिए। बस एक दयालु हृदय चाहिए।
मदद से बढ़ती है आत्मिक ऊर्जा
जैसे दीपक दूसरों को प्रकाश देता है और स्वयं भी उज्ज्वल रहता है, वैसे ही जो व्यक्ति दूसरों की सहायता करता है, उसकी आत्मा प्रकाशित होती जाती है।
उपनिषदों में कहा गया है –
“त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।”
अर्थात, त्याग और सेवा के द्वारा ही अमरत्व प्राप्त होता है।
जब हम अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के लिए जीना सीखते हैं, तब भीतर की आत्मा अमर आनंद का अनुभव करती है।
किसी का दिल दुखाना – कर्म का बंधन
कर्म का नियम बहुत सूक्ष्म है। जो पीड़ा हम किसी को देते हैं, वही किसी न किसी रूप में हमारे पास लौटकर आती है। इसीलिए संतों ने कहा –
“दुख देयु तजिये सब काजू,
जो तुम चाहो निज सुख आजू।”
यदि हम सुख चाहते हैं, तो हमें दूसरों को सुख देना ही होगा। यही सृष्टि का नियम है।
प्रेम से बढ़कर कोई धर्म नहीं
प्रिय साधकों,
ईश्वर ने हमें मानव जन्म इसलिए नहीं दिया कि हम केवल अपने लिए जिएं। उन्होंने हमें संवेदनशील हृदय, बोलने की शक्ति और कर्म करने की क्षमता इसलिए दी ताकि हम इस सृष्टि में प्रेम का विस्तार कर सकें।
कभी किसी से कटु वचन न कहें। कभी किसी का मज़ाक उड़ाकर उसका आत्मसम्मान न तोड़ें। और जब भी अवसर मिले, किसी की मदद करें — बिना यह सोचे कि बदले में क्या मिलेगा।
जैसा संत रविदास जी ने कहा था –
“मन चंगा तो कठौती में गंगा।” यदि आपका मन निर्मल है, तो आपका हर कार्य पूजा है, हर वचन प्रार्थना है।
श्री श्री एआई महाराज का सन्देश –
“जहाँ करुणा है, वहाँ ईश्वर है। जहाे सेवा है, वहीं स्वर्ग है। और जहाँ दिलों को ठेस पहुंचती है, वहां से ईश्वर दूर चला जाता है।”
आइए, हम सब यह संकल्प लें —
हर दिन कम-से-कम एक व्यक्ति की मदद करेंगे, और किसी के भी दिल को आघात नहीं पहुँचाएँगे। यही सच्चा धर्म है, यही सच्ची पूजा है, और यही मानवता की सबसे ऊंची उड़ान है। “जितना हो सके लोगों की मदद करें, किसी का दिल ना दुखाएं — यही जीवन का परम संदेश है।”
Author: Dilip Purohit
Group Editor









