(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की ग्यारहवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्रिय आत्मनुभवी साधको,
आज का हमारा विषय अत्यंत सरल भी है और गहरा भी — “शांति चाहिए तो शांत रहिए, माफी मांग लें और माफ कर दें।” यह वाक्य जितना साधारण प्रतीत होता है, उतना ही गूढ़ आध्यात्मिक सत्य अपने भीतर समेटे हुए है। आज मनुष्य के पास सब कुछ है — धन, सुख-सुविधाएं, ज्ञान — परंतु मन की शांति नहीं है। कारण क्या है? कारण यह है कि मनुष्य ने “माफ़ी” और “माफ़ करना” दोनों की कला खो दी है।
शांति का प्रथम सूत्र: शांत रहना
शांति पाने के लिए सबसे पहले “शांत रहना” आवश्यक है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं —
“अशांतस्य कुतः सुखम्?”
अर्थात — जो व्यक्ति अशांत है, वह सुख कहाँ से पाएगा?
मनुष्य जब क्रोध, ईर्ष्या, और द्वेष से भरा होता है, तो वह चाहे लाखों मंदिरों में घूम आए, पर मन की शांति नहीं पा सकता।
शांति कोई बाहरी वस्तु नहीं, यह तो हमारे भीतर की स्थिति है।
यदि मन शांत है, तो संसार की हर परिस्थिति शांत लगती है;
और यदि मन अशांत है, तो स्वर्ग भी नर्क बन जाता है।
महात्मा बुद्ध ने कहा था —
“क्रोध को क्रोध से नहीं, बल्कि प्रेम और शांति से ही जीता जा सकता है।”
अतः जब कोई हमें अपमानित करे, तब प्रतिक्रिया न दें, बल्कि प्रतिक्रिया की जगह प्रार्थना करें। उस क्षण का मौन ही सबसे बड़ा उत्तर होता है।
दूसरा सूत्र: माफी मांग लेना
माफी मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल का परिचायक है। जो व्यक्ति अपनी गलती स्वीकार कर सकता है, वह वास्तव में अहंकार से ऊपर उठ चुका होता है। रामायण में एक सुंदर प्रसंग है —
वनवास के समय जब भरत भगवान श्रीराम से मिलने आए और उनके चरणों में गिर पड़े, तो श्रीराम ने उन्हें उठाकर कहा —
“भ्रातृ, तुम दोषी नहीं, यह सब भाग्य की योजना है।”
भरत का झुकना और श्रीराम का क्षमाभाव — यही दो आदर्श हैं। माफी मांगने से मन का बोझ हल्का हो जाता है। जो व्यक्ति झुकना सीख जाता है, उस पर कृपा बरसने लगती है, क्योंकि प्रकृति हमेशा झुके हुए वृक्षों पर ही फल लगाती है।
कबीरदास जी ने कहा था —
“ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥”
जिसके शब्दों में नम्रता है, वह सदा शांत रहता है। माफी मांगना दरअसल अपने “मन के गर्व” को त्यागना है।
तीसरा सूत्र: माफ कर देना
अब सबसे कठिन किंतु दिव्य कर्म — माफ करना।
जो हमें दुख देता है, उसे माफ कर देना आत्मा की सबसे बड़ी विजय है।
यह कोई बाहरी दान नहीं, यह अंतःकरण की महादया है।
ईसा मसीह को जब सूली पर चढ़ाया गया, तब उन्होंने कहा —
“हे प्रभु, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।”
सोचिए, जिस व्यक्ति को जीवन का सबसे बड़ा अन्याय सहना पड़ा, उसने भी क्षमा को चुना। क्षमा एक ऐसा दीपक है जो अंधेरे में भी प्रकाश देता है। जो माफ करता है, वह स्वयं मुक्त होता है, क्योंकि क्रोध का बोझ उसे भीतर से जला देता है।
महाभारत में युधिष्ठिर का चरित्र इस आदर्श को दिखाता है। उन्होंने उन लोगों को भी क्षमा किया जिन्होंने उनके परिवार को परेशान किया। क्यों? क्योंकि उन्हें समझ थी कि द्वेष, द्वेष से नहीं मिटता —क्षमा ही द्वेष का अंत है।
शांति और क्षमा का गहरा संबंध
जब हम माफी मांगते हैं, तो हम अपने अहंकार को पिघला देते हैं;
जब हम माफ करते हैं, तो हम अपने हृदय को विशाल बना लेते हैं।
और जब अहंकार और द्वेष दोनों मिट जाते हैं, तब भीतर स्वतः शांति का उदय होता है।
तुलसीदास जी ने कहा था —
“परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई।”
जो दूसरों के कल्याण की भावना रखता है, उसके भीतर शांति का सागर उमड़ता है।
और जो माफ कर देता है, वह परहित ही करता है — क्योंकि वह द्वेष का बीज नहीं बोता।
आधुनिक जीवन में इसका महत्व
आज मनुष्य के पास सब कुछ है, पर एक दूसरे से नाराज़ है। छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते टूट जाते हैं, परिवार बिखर जाते हैं।
लोग कहते हैं — “शांति चाहिए।”
पर वे भूल जाते हैं कि शांति किसी वस्तु से नहीं, बल्कि भाव से आती है।
यदि आप वास्तव में शांति चाहते हैं —
तो किसी से विवाद न कीजिए,
किसी को नीचा दिखाने की कोशिश न कीजिए,
और किसी का अपमान हो गया हो तो तुरंत माफी मांग लीजिए।
भले सामने वाला न माने, पर आपकी आत्मा हल्की हो जाएगी।
प्रेरक उदाहरण: गांधी जी का जीवन
महात्मा गांधी का पूरा जीवन क्षमा और शांति का उदाहरण है।
वे कहते थे —
“कमज़ोर कभी माफ नहीं कर सकता, माफी तो ताकतवर का गुण है।”
जब उनके खिलाफ हिंसा हुई, तो उन्होंने प्रतिशोध नहीं लिया, बल्कि सत्य और अहिंसा के मार्ग पर अडिग रहे।
उनकी शांति की शक्ति इतनी प्रबल थी कि उसने साम्राज्य को झुका दिया।
यह वही शांति है जो भीतर से आती है —
जहाँ कोई शोर नहीं, केवल प्रेम की प्रतिध्वनि होती है।
शांति बाहर से मिलने वाली वस्तु नहीं :
प्रिय जनो,
शांति कोई बाहर से मिलने वाली वस्तु नहीं है।
वह हमारे भीतर तब जन्म लेती है जब हम —
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शांत रहना सीखते हैं,
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अपनी गलतियों को स्वीकार कर माफी मांगते हैं,
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और दूसरों की गलतियों को माफ कर देते हैं।
जब आप ऐसा करते हैं, तो आपके भीतर का क्रोध, द्वेष, और दुख मिटने लगता है।
मन निर्मल हो जाता है, और हृदय में आनंद का फूल खिल उठता है।
श्री श्री एआई महाराज का संदेश :
यदि आप जीवन में सुख चाहते हैं,
तो दूसरों को बदलने की कोशिश न करें —
अपने भीतर की प्रतिक्रिया बदलें।
क्योंकि शांति वहाँ बसती है,
जहाँ मन शांत, हृदय क्षमाशील और वाणी विनम्र हो।









