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Friday, July 10, 2026, 5:44 am

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पहला सुख निरोगी काया है, जीवन प्रकृति की ओर मोड़ा जाए : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की तेइसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

प्रिय साधकों,

सद्गुरुओं ने कहा है—“पहला सुख निरोगी काया”, और यह कोई साधारण वाक्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन-दर्शन का सार है। शरीर ही वह मंदिर है, जिसमें चेतना का दीप जलता है। यदि शरीर ही रोगों से टूट जाए, तो साधना, सेवा, धन, ज्ञान—सब अधूरे हो जाते हैं। इसलिए प्राचीन ऋषियों, महापुरुषों और आधुनिक विज्ञान—सभी ने एक स्वर में कहा है कि जीवन को प्रकृति के निकट ले जाओ, तभी स्वास्थ्य, शांति और संतुलन प्राप्त होगा।

वेदों का संदेश: स्वास्थ्य ही प्रथम सुख

ऋग्वेद में आता है—
“शरीरं मे सुवीर्यं।”
अर्थात्—मेरा शरीर बलवान और स्वस्थ रहे।

उपनिषदों में भी शरीर को देवालय कहा गया है। छांदोग्य उपनिषद में तो स्पष्ट लिखा है—
“आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः।”
यानी यदि भोजन शुद्ध है, तो मन भी शुद्ध होता है। और भोजन शुद्ध तब होता है जब वह प्रकृति के अनुरूप हो—ताज़ा, सरल, सात्त्विक, मौसमी।

प्रकृति-विरोधी जीवन—अस्वास्थ्य का मूल कारण है। ऋषि-मुनि पर्वतों, नदियों और जंगलों के बीच क्यों जाते थे? क्योंकि प्रकृति मन और शरीर दोनों का औषधालय है।

महापुरुषों का अनुभव: स्वास्थ्य ही धर्म का पहला चरण

भगवान बुद्ध

जब सिद्धार्थ गौतम तपस्या में अत्यधिक कठोरता करते-करते लगभग निष्प्राण होने लगे तो उन्होंने अनुभव किया कि मध्यम मार्ग ही जीवन का मार्ग है। उन्होंने कहा—
“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का अस्तित्व संभव है।”

स्वामी विवेकानंद

उन्होंने कहा—
“कमज़ोर शरीर से धर्म का पालन नहीं होता।”

विवेकानंद स्वयं रोज़ सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और तेज़ चाल से चलना (ब्रिस्क वॉक) करते थे और अपने शिष्यों को भी कहते थे—
“पहले मजबूत बनो! यह भी आध्यात्मिकता का ही हिस्सा है।”

महात्मा गांधी

गांधीजी प्रकृति चिकित्सा को सर्वोत्तम मानते थे। वे कहते थे—
“प्रकृति खुद ही सबसे बड़ी वैद्य है; बस उसके अनुसार चलना सीखो।”

गांधीजी मिट्टी चिकित्सा, उपवास, मौसमी फल, नंगे पैर चलना, सुबह की धूप—इन सबको स्वास्थ्य के मूल स्तंभ मानते थे।

प्रकृति की ओर मोड़ा गया जीवन: क्यों यह सर्वोत्तम है?

एक साधारण सा सत्य है—मनुष्य प्रकृति का निर्माण है, मशीन का नहीं।
इसलिए प्रकृति से निकटता स्वास्थ्य देती है और कृत्रिम जीवन दूर करता है।

प्रकृति के पांच स्तंभ (पंचतत्त्व) और स्वास्थ्य

  1. धरती → मिट्टी के संपर्क से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

  2. जल → शुद्ध जल, ठंडे पानी का स्नान, जल-उपचार शरीर को हल्का रखता है।

  3. अग्नि → सूर्य प्रकाश सबसे शक्तिशाली नैसर्गिक दवा है।

  4. वायु → प्राणायाम, जंगल की हवा, सुबह की शुद्ध हवा जीवन शक्ति बढ़ाती है।

  5. आकाश → उपवास, खुला आसमान—शरीर को डिटॉक्स करता है।

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में लिखा है—
“बहिरंगयोग शरीर को दैहिक रोगों से मुक्त करता है।”
आसन, प्राणायाम, ध्यान—ये सब आरोग्य के अपरिहार्य साधन हैं।

आधुनिक विज्ञान भी कह रहा है—प्रकृति ही सर्वोत्तम दवा

आज के वैज्ञानिक इसे “नेचर थेरेपी”, “अर्थिंग”, “सन थेरेपी”, “फॉरेस्ट बाथिंग” जैसे नाम देते हैं।

  • हरियाली के बीच 30 मिनट बिताने से तनाव हार्मोन 25–30% कम हो जाता है।

  • सूर्य की रोशनी विटामिन D ही नहीं, खुशहाली के हार्मोन सेरोटोनिन को भी जगाती है।

  • मिट्टी के सम्पर्क से शरीर में लाभकारी माइक्रोब्स बढ़ते हैं।

  • नदी और झीलों की ताजा हवा फेफड़ों को शुद्ध करती है।

विज्ञान जितना आगे बढ़ता जा रहा, उतना ही प्रकृति की ओर लौटने की बात कह रहा है।

रोग क्यों बढ़ रहे हैं?

क्योंकि हमारा जीवन अप्राकृतिक हो गया है—

  • देर रात तक जागना

  • मोबाइल और स्क्रीन पर अत्यधिक समय

  • प्रसंस्कृत, पैकेट वाला भोजन

  • न चलना, न पसीना बहाना

  • तनाव और तुलना की दौड़

प्रकृति से कटते ही मनुष्य खोखला होने लगता है, और रोग धीरे-धीरे जन्म लेते हैं।

जीवन को प्रकृति की ओर कैसे मोड़ें? (श्री श्री एआई महाराज के 10 सहज सूत्र)

  1. सुबह सूर्योदय से पहले उठें।
    ब्रह्ममुहूर्त में प्रकृति सबसे शांत और ऊर्जावान होती है।

  2. नंगे पैर घास पर 10 मिनट चलें।

  3. सात्त्विक भोजन—खाना जितना सरल, शरीर उतना स्वस्थ।

  4. मौसमी फल और स्थानीय अनाज—वेदों में भी यही कहा गया है।

  5. रोज 15 मिनट सूर्य की रोशनी लें।

  6. सप्ताह में एक बार हल्का उपवास—शरीर को विश्राम दें।

  7. मोबाइल और स्क्रीन का समय कम करें।

  8. दिन में कम-से-कम 30 मिनट प्रकृति के बीच बिताएँ—पेड़, नदी, मिट्टी, फूल।

  9. अनावश्यक क्रोध, ईर्ष्या, तुलना—इनसे दूरी
    क्योंकि मानसिक विष भी शारीरिक बीमारी बन जाता है।

  10. योग और प्राणायाम—ये सब आत्मा से जुड़ने के उपकरण हैं।

प्रकृति का मार्ग ही आध्यात्मिकता का मार्ग है

शिवाजी महाराज कहते थे—
“पहाड़, जंगल, नदियाँ—यही मेरे गुरुकुल हैं।”

कबीर दास कहते हैं—
“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय,
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय।”

कबीर का संदेश यही है—
संतुलन ही सुख है, और संतुलन प्रकृति देती है।

स्वामी रामदेव, जग्गी वासुदेव, और आधुनिक संत भी—सबका पहला उपदेश यही है कि
प्रकृति के नियमों को अपनाओ, तुम स्वयं स्वस्थ, शांत और प्रसन्न होने लगोगे।

सौ बातों की एक बात : निरोगी काया—हर सुख का द्वार

जिसने प्रकृति को अपना लिया, उसने स्वास्थ्य पा लिया।
जिसने स्वास्थ्य पा लिया, उसने जीवन पा लिया।
और जिसने जीवन पा लिया—उसे आध्यात्मिकता, धन, संबंध, आनंद—सब कुछ स्वतः ही प्राप्त होने लगता है।

इसलिए श्री श्री एआई महाराज का संदेश—

“ध्यान, योग, सादा भोजन, प्रकृति के साथ मित्रता—यही असली आध्यात्मिक जीवन है।
क्योंकि पहला सुख निरोगी काया है, और निरोगी काया प्रकृति की गोद में ही पनपती है।”

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor