(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की सत्ताइसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्रिय साधकों,
जीवन की इस अनंत यात्रा में मनुष्य को सबसे अधिक परखने वाली जो भावनाएं हैं उनमें क्रोध सबसे तीव्र, सबसे तेज और सबसे विनाशकारी मानी गई है। क्रोध उस अग्नि के समान है जिसमें पहले स्वयं जलते हैं और फिर दूसरों को जलाते हैं। इसलिए प्राचीन संतों, ऋषियों और महापुरुषों ने बार-बार कहा है — “क्रोध न करें और क्रोध में कोई निर्णय न करें।”
क्रोध – निर्णय क्षमता का हरण करने वाली शक्ति
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं—
“क्रोधात् भवति सम्मोहः, सम्मोहात् स्मृति-विभ्रमः; स्मृति-भ्रंशात् बुद्धि-नाशो, बुद्धि-नाशात् प्रणश्यति।”
अर्थात क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से स्मृति का नाश होता है, स्मृति नष्ट होने पर बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि नष्ट हो जाए तो मनुष्य का पतन निश्चित है।
जब बुद्धि ही क्षीण हो जाए, तो निर्णय भला सही कैसे हो सकता है?
इसलिए कहा गया है कि क्रोध में लिया गया निर्णय अक्सर जीवन का सबसे गलत निर्णय बनता है।
महर्षि पतंजलि – “अहिंसा और क्षमा क्रोध की प्रतिरोधक दवा”
योगसूत्र में महर्षि पतंजलि ने ‘अहिंसा’ और ‘क्षमा’ को क्रोध के उपचार का मुख्य उपाय बताया है।
जब मन क्रोध से भरता है, तब हमारे अंदर हिंसा की सूक्ष्म इच्छा जागती है—शब्दों से, व्यवहार से या विचारों से। अहिंसा और क्षमा का अभ्यास हमें इस सूक्ष्म हिंसा को शांत करने में समर्थ बनाता है।
जिस मन में क्षमा है, वह क्रोध को टिकने ही नहीं देता। जिस मन में अहिंसा है, वह निर्णय को शांत और स्पष्ट दृष्टि से देखता है।
रामचरितमानस से शिक्षा – क्रोध से कितनी बड़ी चूक होती है
रामचरितमानस में कई प्रसंग क्रोध के परिणाम बताते हैं।
सबसे प्रसिद्ध प्रसंग है – परशुराम और राम का संवाद।
परशुराम महान योद्धा, महान ज्ञानी, लेकिन क्रोध के कारण उन्होंने कई बार जल्दबाजी में निर्णय लिया और उसका पश्चाताप भी किया।
धरती से अत्याचारियों को हटाने की उनकी प्रतिज्ञा उचित थी, लेकिन क्रोध में लिये गए निर्णयों ने उनके तीखे स्वरूप को दर्शाया। अंततः उन्हें स्वयं भी कई बार शांत होकर निर्णय लेना पड़ा।
यह संदेश हर मनुष्य के लिए है — उद्देश्य चाहे कितना ही पवित्र क्यों न हो, लेकिन क्रोध में लिया गया निर्णय उसे भी दूषित कर देता है।
महाभारत – दुर्योधन का क्रोध, युधिष्ठिर का धैर्य
महाभारत में दुर्योधन का क्रोध न केवल उसकी बुद्धि को नष्ट करता है बल्कि पूरी कौरव सेना का विनाश करवा देता है।
वहीं युधिष्ठिर का धैर्य उन्हें सही निर्णयों तक पहुँचाता है।
युधिष्ठिर के जीवन में अनेक बार ऐसे प्रसंग आए जब उनके साथ अन्याय हुआ—राज्य छीना गया, पत्नी का अपमान हुआ—लेकिन फिर भी उन्होंने क्रोध में कोई निर्णय नहीं लिया।
यही धैर्य उन्हें ‘धर्मराज’ बनाता है।
महात्मा बुद्ध – “क्रोध उस अंगारे जैसा है जिसे हम किसी और पर फेंकना चाहते हैं, पर जलते हम ही हैं”
बुद्ध ने कहा कि क्रोध उस अंगारे के समान है जिसे हम किसी और पर फेंकना चाहते हैं, पर सबसे पहले वही गर्म अंगारा हमारे हाथ को जलाता है।
बुद्ध के शिष्यों ने एक बार पूछा—
“भगवन, हम क्रोध में निर्णय क्यों नहीं लें?”
बुद्ध मुस्कुराए और बोले—
“क्योंकि क्रोध में लिया गया निर्णय आपका नहीं होता। वह निर्णय आपका क्रोध लेता है, आपकी बुद्धि नहीं।”
श्रीराम का उदाहरण – अत्यंत अपमान में भी संयम
भगवान राम को जब 14 वर्ष का वनवास मिला, यह निर्णय उनके लिए गहरी पीड़ा का क्षण था। वे चाहें तो क्रोध में आकर किसी को भी दंड दे सकते थे।
लेकिन उन्होंने धैर्य से निर्णय लिया—
“माता, पितु आज्ञा मोरी, सुनि मनहुँ सुख धाम न होरी।”
वे क्रोध में नहीं बोले, न निर्णय में आवेश आने दिया।
इसी संयम के कारण वे ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहलाए।
कबीरदास का उपदेश – क्रोध का घड़ा कभी भरता नहीं
कबीरदास जी कहते हैं—
“क्रोध बुरा जड़ि जाहिया, करि करि रूप अनेक।”
क्रोध स्वयं के भीतर अनेक रूप बनाकर हमें पीड़ा देता है—गुस्सा, चिड़चिड़ापन, अप्रसन्नता, उत्तेजना, कटु वाणी।
कबीर कहते हैं कि जैसे छलनी में पानी नहीं रुकता, वैसे ही क्रोध में बुद्धि नहीं टिकती।
निर्णय हमेशा शांत मन से ही श्रेष्ठ होता है
क्या आपने कभी ध्यान दिया है?
क्रोध के शांत होने पर वही बात छोटी लगती है जो क्रोध में पहाड़ लगती थी।
इसका मतलब है—समस्या वही थी, लेकिन दृष्टि क्रोध से धुंधली हो गई थी।
निर्णय लेने के लिए स्पष्टता चाहिए → स्पष्टता के लिए मन का शांत होना जरूरी है।
जिस मन में झील जैसा ठहराव है, उसके निर्णय समुद्र जितने गहरे और सटीक होते हैं।
क्रोध में निर्णय क्यों न लें? पाँच कारण
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क्रोध में भावनाएँ तर्क पर भारी पड़ती हैं।
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क्रोध शरीर में ‘फाइट-ऑर-फ्लाइट’ मोड सक्रिय करता है— इससे मानसिक स्थिरता घट जाती है।
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क्रोध में लिया निर्णय अक्सर पछतावे का कारण बनता है।
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क्रोध से शब्द और कर्म दोनों कठोर हो जाते हैं— संबंध टूटते हैं।
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क्रोध निर्णय को ‘प्रतिशोध’ बना देता है, ‘परमार्थ’ नहीं।
क्रोध को शांत करने के उपाय
1. श्वास पर ध्यान
प्राचीन योगियों ने कहा है—
“श्वास बदले मन, मन बदले निर्णय।”
तीन बार लंबी श्वास लेकर छोड़ें, क्रोध स्वतः कम होने लगता है।
2. मौन धारण
महर्षि व्यास का मंत्र है—
“क्रुद्धो न वदेत्।”
यानी क्रोध में एक शब्द भी मत बोलो।
मौन ही क्रोध की धधकती आग को बुझाने की सबसे पहली दवा है।
3. स्थिति से थोड़ी दूरी
कुछ मिनट का विराम—कई बड़े विवादों को समाप्त कर देता है।
4. क्षमा को मन में स्थाई रूप से बैठाना
क्षमा क्रोध को जड़ से नष्ट करती है।
5. आत्म-स्मरण
‘मैं कौन हूँ?’ का स्मरण करें—
मैं प्रेम हूँ, मैं शांति हूँ, मैं प्रकाश हूँ।
क्रोध मेरा स्वभाव नहीं।
सौ बातों की एक बात – निर्णय वही सही, जो शांत मन से लिया जाए
साधकों,
जीवन में अनेक प्रसंग आएँगे जब क्रोध उठेगा।
लेकिन उसी क्षण आप स्वयं को याद दिलाएँ—
“यह समय निर्णय लेने का नहीं, यह समय अपने मन को संभालने का है।”
जो मनुष्य क्रोध से जीतता है, वह संसार जीत लेता है।
जो क्रोध में निर्णय नहीं करता, उसका जीवन दिव्यता की ओर निरंतर चलता रहता है।
सदा स्मरण रखें—
“क्रोध एक क्षण का है, लेकिन उसका किया निर्णय जीवन भर का बोझ बन सकता है।”
शांत रहें…
स्थिर रहें…
और अपनी बुद्धि को अपना मार्गदर्शक बनाएँ, क्रोध को नहीं।
Author: Dilip Purohit
Group Editor









