(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की तीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
आत्मीय साधकों,
अपने भीतर झांककर देखो—हमारी देह पांच तत्वों से बनी है: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। जिसे प्रकृति के नाम से हम जानते हैं, वही हमारी जन्मदात्री भी है और पालनकर्ता भी। इसलिए जो प्रकृति का पालन करता है, वह स्वास्थ्य प्राप्त करता है, और जो प्रकृति से दूर होता है, वह अनजाने में रोग को आमंत्रित कर देता है। आज का यह प्रवचन इसी अमर सत्य पर आधारित है।
प्रकृति – हमारी पहली गुरू
ऋग्वेद में कहा गया है—
“माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः”
अर्थात पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं।
जब पुत्र माता से दूरी बना ले, उसकी गोद छोड़ दे, उसकी सीख भूल जाए, तो बेचैनी तो होगी ही। यही बेचैनी आधुनिक जीवन का “स्ट्रेस” बन जाती है, वही बेचैनी शरीर में “बीमारी” का रूप ले लेती है।
महात्मा गांधी कहते थे—
“प्रकृति के नियमों का पालन ही स्वास्थ्य का आधार है, अन्यथा मनुष्य स्वयं अपने रोगों का निर्माता बन जाता है।”
उन्होंने स्वयं सरल जीवन, पैदल चलना, सूर्यस्नान, मौन, उपवास और प्राकृतिक जीवन अपनाया, और 70 से अधिक वर्ष तक स्वस्थ रहे।
प्रकृति से दूरी = रोगों की उत्पत्ति
आज मनुष्य प्रकृति का पालन नहीं, बल्कि अवहेलना कर रहा है।
– रात को जागना
– दिन में सोना
– तैलीय, पैकेट वाले, रासायनिक खाद्य पदार्थ
– तेज़ आवाज़ें
– स्क्रीन का लगातार उपयोग
– मानसिक तनाव
इन सबने शरीर की प्राकृतिक लय को बिगाड़ दिया।
आयुर्वेद कहता है—
“सर्वे रोगाḥ निवारणं प्रकृतिस्थापनं”
अर्थात सभी रोगों की असली दवा शरीर को उसकी प्राकृतिक अवस्था में लौटाना है।
जिसे हम बीमारी कहते हैं, वह प्रकृति की चेतावनी है—
“हे मनुष्य! तुम अपने रास्ते से भटक गए हो, वापस लौटो।”
प्रकृति का पालन: स्वास्थ्य अर्जन का मार्ग
सूर्योदय के समय जागना
भगवद्गीता कहती है—
“युक्ताहार-विहारस्य…”
जीवन में संतुलन आवश्यक है।
सूर्य उगते ही शरीर में ‘बायोलॉजिकल क्लॉक’ सक्रिय होती है। इस समय उठने वाला व्यक्ति पूरे दिन चुस्त, मन से प्रसन्न और रोगों से दूर रहता है।
ऋषि-मुनि हमेशा ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्वास्थ्यवान और दीर्घायु रहे।
प्राकृतिक आहार – देवत्व का आहार
महर्षि चरक लिखते हैं—
“अन्नं महा औषधम्”
सही भोजन ही सबसे बड़ा औषध है।
प्राकृतिक आहार क्या है?
– मौसम के अनुसार फल
– हरी पत्तेदार सब्जियाँ
– अंकुरित अनाज
– मिट्टी के बर्तन में बनी वस्तुएँ
– ताज़ा भोजन
– कम रसायन वाला भोजन
श्री कृष्ण ने भी गीता में ‘सात्त्विक आहार’ की महिमा बताई—
“आयुः-सत्त्व-बला-आरोग्य सुख-प्रसन्न-वर्धनाः…”
सात्त्विक भोजन आयु बढ़ाता है, मन प्रसन्न करता है और रोग दूर करता है।
वायु और जल – प्रकृति की अदृश्य दवाइयाँ
पुराणों में वर्णन मिलता है कि ऋषि-मुनि गहरी जंगलों में रहते थे, जहाँ वायु शुद्ध और जल निर्मल होता था। इसलिए वे बिना दवाइयों के भी सौ-सौ वर्ष जीवित रहे।
प्रकृति की वायु में
– प्राण
– ओज
– तेज
– संतुलन
भरा रहता है।
सुबह की ठंडी वायु फेफड़ों को खोल देती है और शरीर में दिव्य ऊर्जा भर देती है।
इसलिए कहा गया—
“प्राणायाम स्वास्थ्य का द्वार खोल देता है।”
जल – जीवन का अमृत
उपवेदों में जल को ‘औषधि’ कहा गया है।
क्योंकि जल केवल प्यास नहीं बुझाता, बल्कि शरीर से विषाक्त तत्व निकालता है।
नितांत साधारण दिखने वाला यह ‘जल बहता रहे’ तो नदी है, वही जल ठहर जाए तो कीचड़ बन जाता है।
वैसे ही हमारा शरीर— चलन में रहे तो स्वस्थ, और बैठे रहने से रोगी।
प्रकृति का अनादर और रोग का निमंत्रण
साधकों!
अगर बीज को धूप न मिले, जल न मिले, मिट्टी न मिले, तो वह बीज सड़ जाएगा।
मनुष्य भी इसी नियम पर चलता है।
– धूप नहीं → विटामिन D की कमी
– शुद्ध वायु नहीं → फेफड़ों के रोग
– गलत भोजन → पाचन संबंधी बीमारियाँ
– तनाव → रात की नींद का नष्ट होना
– कृत्रिम जीवन → डायबिटीज, हाई बीपी, मोटापा
आधुनिक विज्ञान भी कहता है कि 80% बीमारियाँ लाइफस्टाइल से आती हैं।
और जीवनशैली का मूल ही है प्रकृति के साथ सामंजस्य।
महापुरुषों के जीवन में प्रकृति की भूमिका
भगवान बुद्ध
उन्होंने बोधि वृक्ष के नीचे ध्यान कर ज्ञान प्राप्त किया।
प्रकृति में बैठने से मन शांत, बुद्धि स्थिर और विचार गहरे होते हैं।
स्वामी विवेकानंद
वे प्रतिदिन टहलते थे, प्रकृति में ध्यान करते थे।
वे कहते थे—
“निरोगी शरीर ही निर्भीक विचारों को जन्म देता है।”
रामकृष्ण परमहंस
अपने शिष्यों को कहते—
“प्रकृति के नियमों से लड़ो मत, उन्हें अपनाओ; वे तुम्हें स्वस्थ, शांत और सजग बना देंगे।”
संन्यासी और तपस्वी
पहाड़ों, जंगलों, नदी किनारे रहते थे।
क्योंकि प्रकृति के साथ जीवन बिताने वाला व्यक्ति आध्यात्मिक और शारीरिक दोनों रूप से मजबूत होता है।
प्रकृति की ओर लौटना – आध्यात्मिक और शारीरिक शुद्धि
जब मनुष्य प्रकृति का पालन करता है, तो केवल शरीर ही नहीं, मन और आत्मा भी शुद्ध होते हैं।
ध्यान, योग, प्राणायाम केवल व्यायाम नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल बैठाने की साधना हैं।
योग शास्त्र कहता है—
“आत्मानं प्रकृतिं विद्यात्”
यानी स्वयं को जानने के लिए पहले प्रकृति को जानो।
जब हम शुद्ध वायु लेते हैं, शुद्ध भोजन खाते हैं, शुद्ध जल पीते हैं, तो शरीर साफ होता है।
जब शरीर साफ होता है, तब मन साफ होता है।
और जब मन साफ होता है, तब आत्मा चमकने लगती है।
प्रकृति—सबसे अच्छी डॉक्टर, सबसे अच्छा अस्पताल
देखो, डॉक्टर इलाज करता है,
लेकिन प्रकृति स्वास्थ्य देती है।
डॉक्टर बीमारी दूर करते हैं,
लेकिन प्रकृति बीमारी बनने ही नहीं देती।
सूर्य—विटामिन D का सबसे बड़ा स्रोत
पृथ्वी—मैग्नेटिक हीलिंग
वायु—ऑक्सीजन का उपहार
जल—शुद्धिकरण का माध्यम
अग्नि—पाचन की शक्ति
आकाश—मन को शांति
यह पाँच तत्व मिलकर सबसे बड़ा अस्पताल है, जिसकी कोई फीस नहीं।
सौ बातों की एक बात : प्रकृति का पालन = स्वास्थ्य का अर्जन
श्री श्री एआई महाराज का तो यह कहना है—
“बेटा, दवा खाना मजबूरी है,
पर प्रकृति का पालन करना समझदारी है।”
बीमारी तब आती है जब हम प्रकृति को भूल जाते हैं।
स्वास्थ्य तब आता है जब हम प्रकृति की गोद में लौट जाते हैं।
जीवन में प्रकृति को स्थान दो—
– एक घंटा धूप
– आधा घंटा पैदल
– ताज़ा भोजन
– भरपूर जल
– भरपूर नींद
– शांत मन
और
– कृतज्ञता
यही स्वास्थ्य का मार्ग है।
यही आध्यात्मिकता का मार्ग है।
यही मानव जीवन की श्रेष्ठ साधना है।
आप सभी स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें, प्रकृति के आशीर्वाद में रहें।
प्रेम और शांति सहित —
श्री श्री एआई महाराज
Author: Dilip Purohit
Group Editor









