राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र
दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली
अब समय आ गया है कि भारत में विशिष्ट मामलों में सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर “सुपर कोर्ट” (Hyper-Supreme Court की स्थापना की जाए। इसके लिए विपक्ष को बड़े ही कठोर शब्दों में मांग उठानी चाहिए और अगर सरकार संविधान संशोधन लेकर आती है तो उसमें साथ दे और ऐसा संविधान संशोधन पूर्ण रूप से दो तिहाही बहुमत से पारित हो। क्योंकि कई मुद्दे ऐसे हैं जो सुप्रीम कोर्ट के वश में नहीं रहे। अब आज यानी 27 नवंबर का मुद्दा ही लें जब दिल्ली-एनसीआर में पर्यावरण से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि उसके पास जादुई छड़ी नहीं हैं। जब सुप्रीम कोर्ट यह कहने लगे कि उसके पास जादुई छड़ी नहीं है तो बात यहीं खत्म नहीं हो जाती, क्योंकि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट इतनी कैज्युल टिप्पणी कैसे कर सकता है? अगर सुप्रीम कोर्ट के पास जादुई छड़ी नहीं है तो क्या उसे न्याय करने के लिए और मुद्दों का समाधान करने के लिए जादुई छड़ी चाहिए? क्या बगैर जादुई छड़ी सुप्रीम कोर्ट फैसला नहीं दे सकता? जहां बात करोड़ों लोगों के जीने-मरने से जुड़ी हो और स्वास्थ्य से जुड़ा हो वहां सुप्रीम कोर्ट का इतना कैज्युल जवाब सुप्रीम कोर्ट के जजों को शोभा नहीं देता। बहरहाल मैं पुराने कुछ अखबार पढ़ रहा था। जिसमें सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने बिल मंजूरी को लेकर खंडपीठ के 3 माह की समय सीमा तय करने के फैसले को पलट दिया और कहा कि बिल मंजूरी पर राज्यपाल-राष्ट्रपति के लिए कोई डेडलाइन नहीं हो सकती। ऐसा ही एक मामला अरावली पर्वत मामला को लेकर अखबार में प्रमुखता से छपा। लेकिन उस देश में जिस देश में जजों के घरों से नोट मिलते हैं, उस देश में जिस देश में राज्यों में सरकारें अलग दलों की होती है और राज्यपाल थौपा जाता है (हालांकि राज्यपाल दलगत राजनीति से ऊपर होता है, मगर यह मानी हुई बात है कि वह किसी न किसी पार्टी या विचारधारा से संबंध रखता है।), उस देश में जहां बिलों को राज्यपाल और राष्ट्रपति की दादागिरी चलती है, उस देश में जहां राज्यों में राज्यपाल और राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रपति को आपराधिक मामलों में कोर्ट में बुलाया नहीं जा सकता…। ऐसे में बहुत जरूरी हो जाता है कि एक ऐसी सुपर पाॅवर अदालत हो जो विशिष्ट मामलों की सुनवाई के लिए ही गठित हो और उसे Constitutional Court of India (भारतीय संवैधानिक न्यायालय) नाम दिया जा सकता है।
प्रस्तावित नाम निम्न प्रकार हो सकता हैं-
1. Constitutional Court of India (भारतीय संवैधानिक न्यायालय)
— यह नाम दुनिया के कई देशों (दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, फ्रांस) में इसी भूमिका वाली अदालतों के अनुरूप है।
2. National Constitutional Review Court (राष्ट्रीय संवैधानिक समीक्षा न्यायालय)
— जिसका कार्य केवल “सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक मामलों की पुनर्परीक्षा” हो।
3. Apex Constitutional Bench (शिखर संवैधानिक पीठ)
— यह संसद द्वारा गठित स्वतंत्र सर्वोच्च संवैधानिक पीठ हो सकती है।
4. Federal Constitutional Tribunal (संघीय संवैधानिक अधिकरण)
— “ट्रिब्यूनल” शब्द का उपयोग सुप्रीम कोर्ट से नीचे भी होता है, लेकिन “फेडरल” जोड़ने से यह सर्वोच्च संस्था बन सकती है।
5. Supreme Constitutional Council (सर्वोच्च संवैधानिक परिषद)
— न्यायाधीशों + विधि विशेषज्ञों + संसद सदस्यों का मिश्रित उच्च-स्तरीय मंच।
सबसे व्यवहारिक नाम:
Constitutional Court of India (CCI)
क्योंकि यह नाम भारतीय कानूनी परंपरा और अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों में सबसे अधिक स्वीकार्य हो सकता है। तो अब यह समय की मांग है कि भारत में सीसीआई का गठन किया जाए। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पर केस पेंडिंग का दबाव बढ़ता जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में करीब 40 जज और 88 हजार से ज्यादा मामले पेंडिंग : फिर क्यों न हो सीसीआई?
सुप्रीम कोर्ट में करीब 34 जज है और हो सकता है इस समय 40 जज हो। हम आंकड़ों पर फिलहाल नहीं जा रहे। लेकिन इतना तय है कि 88 हजार से ज्यादा मामले पेंडिंग है। फिर भला 40 जज या 34 जज 88 हजार पेंडिंग मामलों की सुनवाई कब करेंगे? तो क्या विशिष्ट मामलों के लिए अब Constitutional Court of India (CCI) जरूरी नहीं है। आखिर कब तक देश सुप्रीम कोर्ट के जजों की दादागिरी सहन करता रहेगा। हमारे देश में ज्यूडिशरी में बहुत सारे दोष आ गए हैं, जिसे सुधारने की जरूरत है।
भारत में आम आदमी कोर्ट आना ही नहीं चाहता, कब वो दिन आएगा जब एक पोस्टकार्ड या एक पत्र पर न्याय मिलेगा?
भारत की अदालतों में आम आदमी आना ही नहीं चाहता। अभी कुछ दिनों पहले ही सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने कहा था कि हर आदमी को अधिकार है कि वह कोर्ट के प्रति अविश्वास व्यक्त करे। न्यायाधीश का कहना था कि आप किसी व्यक्ति को जबरदस्ती यह नहीं कहलवा सकते कि उसे कोर्ट की कार्रवाई पर पूरा विश्वास है। यह बयान अखबारों में भी प्रकाशित हो चुका है। जब एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ही मानता हो कि भारत के आम आदमी को कोर्ट की कार्रवाई पर भरोसा नहीं है। या कोर्ट की कार्रवाई पर अविश्वास करने का उनका अधिकार है। मेरा यह मानना है कि भारत की न्यायिक व्यवस्था आम आदमी के साथ चोट करने वाली है। यहां भ्रष्टाचार की चरम स्थिति व्याप्त है। मैं खुद इसका जीता जागता सुबूत हूं। जब मैं हिन्दुस्तान का जैसलमेर का रिपोर्टर था तब एक धन्ना सेठ और पेशे से वकील एलएन मेहता के खिलाफ खबर प्रकाशित करने पर मुझे झूठे मुकदमों में फंसा दिया था। तब मैं गरीब था और आज भी मामूली वेतन भोगी हूं। यहां हर गरीब और जरूरतमंद को पूंजीवादी ताकतें दबाना चाहती है। तब मेरा पक्ष ना वहां के एसपी ने लिया, ना कलेक्टर ने लिया और ना ही अदालत में मेरी सुनवाई हुई। मुझे वहां के रीडर कहते- 50 रुपए दे पेशी आगे बढ़ा दूंगा। वकीलों का दलाल कहते अरे- 200 रुपए तो दे…। मैंने किसी को कुछ नहीं दिया और जजों ने क्या फैसला लिखा वो ही जाने? वो धन्ना सेठ और वकील एलएन मेहता जिसे भगवान ने उसके कुकर्मो की सजा दी और अंत समय में डायलिसिस पर पीड़ा भोगता रहा। जिंदगी भर जिसने तस्करों को छुड़ाया उस व्यवस्था में पूरा तंत्र दोषी रहा। जब धरती की अदालत न्याय नहीं करती तो ऊपर वाले की अदालत सक्रिय हो जाती है। वो उस दौर की बात कर रहा हूं जब मैं मानसिक संतुलन खो बैठा था। आज भी लोग मुझे पागल कहते हैं और मेरा जोधपुर में मनोचिकित्सक डॉ. जीडी कूलवाल से इलाज चल रहा है। तो मैं जैसलमेर में उस दौर की बात कर रहा हूं, तब जैसलमेर की सारी पत्रकार लॉबी मेरे खिलाफ हो गई थी। ये वो पत्रकार थे जो आज करोड़पति हो चुके हैं और उनमें कई तो ब्लैकमेलर और हिस्ट्रीशीटर हैं। ऐसे पत्रकारों के बीच पत्रकारिता करना खतरे से खाली नहीं है और लोकतंत्र के तीनों महत्वपूर्ण स्तंभों के बीच आपराधिक गठजोड़ के बीच अपनी बात बेबाकी से लिखना खतरनाक है। खासकर न्यायपालिका के खिलाफ कलम चलाना अपनी मौत को आमंत्रण देना है, मगर मैं यह खतरा उठाने को भी तैयार हूं।
क्या आम आदमी को अपने मामले की पैरवी करने का अदालतों में हक मिलेगा?
बात मूल मुद्दे पर आने से पहले मैं यह सवाल उठाना चाहता हूं कि क्या आम आदमी को क्रूर वकीलों के चंगुल से छुटकारा मिलेगा। आज जबकि सरकारी वकील बिक जाते हैं और निजी वकील ऊंची फीस मांगते हैं। तो क्या आम आदमी को न्याय मिलेगा? ऐसे में वे लोग जो थोड़े भी बुद्धिजीवी हैं क्या उन्हें अपने मामलों में खुद पैरवी करने का हक मिलेगा? इस रिपोर्टर ने राजस्थान हाईकोर्ट में 23 नवंबर को एक पत्र लिखा है और उसे कूरिअर से भेजा है। अब देखना यह है कि क्या राजस्थान हाईकोर्ट उसके मामले को सूचीबद्ध करता है? क्या राजस्थान हाईकोर्ट इस रिपोर्टर को अपने मामले में सुनवाई करने का अधिकार देता है? अगर ऐसा नहीं होता है तो समझ लेना चाहिए कि भारतीय न्याय प्रणाली मे न्याय के लिए अभी आम आदमी को अपनी जान देने तक संघर्ष करना पड़ेगा।
अब आते हैं मूल मुद्दे पर : सुपर पॉवर कोर्ट की आवश्यकता क्यों?
21 नवंबर का दैनिक भास्कर मेरे हाथ में है। एक खबर है- बिल मंजूरी पर राज्यपाल-राष्ट्रपति के लिए कोई डेडलाइन नहीं : सुप्रीम कोर्ट…फिर फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ खंडपीठ का 3 माय की तय समय सीमा का फैसला पलट देती है। फिर आगे कोर्ट कहता है कि…लेकिन अनिश्चितकालीन देरी पर कोर्ट निर्देश देगा? क्यों? अनिश्चितकालीन देरी के मायने क्या? छह महीने, साल भर, दो साल, तीन साल…और हो सकता है तब तक राज्यपाल का ही ट्रांसफर हो जाए। या राज्यपाल का कार्यकाल ही पूरा हो जाए। दरअसल सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के ऊपर भी अब सु्प्रीम न्याय की जरूरत है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में ऐसे विशिष्ट मामले निर्णय होने के बाद उससे भी ऊपरी अदालत में आने चाहिए। दुर्भाग्य से भारत में सुप्रीम कोर्ट से ऊपर कोई अदालत नहीं है। आज मुझे यह लिखना पड़ रहा है कि बहुत जरूरी हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट की दादागिरी खत्म करने के लिए सुपर पावर अदालत गठित हो।
सुपर पॉवर अदालत में राज्यपालों, राष्ट्रपति, हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ भी आपराधिक और सिविल मुकदमा चले
-क्योंकि लोकतंत्र से बड़ा कोई नहीं हो सकता? अगर लोकतंत्र में देश के पहले और राज्य के पहले व्यक्ति को कोर्ट में खड़ा नहीं किया जा सकता तो लोकतंत्र में अंतिम और आम व्यक्ति को खड़ा क्यों किया जा रहा है? किसी को इतनी विशिष्ट शक्तियां दी जाए तो लोकतंत्र रहा ही कहां? वो भी तब जबकि राष्ट्रपति और राज्यपाल लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने ही नहीं जाते। जो जनता द्वारा चुने नहीं जाते उन्हें कोर्ट से छूट और आम जनता के लिए कोर्ट? ऐसा क्यों? ऐसे में तो संविधान में लोकतंत्र की परिभाषा फिर से निर्धारित करनी होगी और लिखना होगा कि यहां आम आदमी और विशिष्ट आदमी के लिए दो व्यवस्थाएं की गई है…लोक सेवकों और राजनेताओं के बारे में भी सबकुछ नए सिरे से तय करने की जरूरत है :
हम अपनी बात को रखने से पहले कहना चाहेंगे कि भारत वो देश है जहां राजाओं पर भी आरोप लगे और उन्होंने भी अपने आपको सजा दी। ऐसा ग्रंथों में भी कई उदाहरण मिल जाएंगे। जब भगवान राम पर आरोप लगे तो उन्होंने अपनी बेकसुर पत्नी तक को त्याग दिया। फिर अब बात करते हैं भारत की अदालतों की। जिस देश में राम को आदर्श मानते हैं और राम राज्य की कल्पना की बात सरकारें करती है तो देश के राजा (राष्ट्रपति) को अदालतों में क्यों नहीं बुलाया जा सकता। हां, यह हो सकता है कि उन्हें विशिष्ट मामलों में देश की विशिष्ट अदालत जिसे सुपर पॉवर यानी कि Constitutional Court of India (CCI) में बुलाया जाए और राज्यपाल को भी ऐसी ही अदालत में बुलाया जाए। क्योंकि कानून में कोई भी इतनी शक्ति नहीं रखता कि उसके खिलाफ मुकदमा ही ना चलाया जाए क्योंकि अगर ऐसा होता है तो फिर लोकतंत्र रहा ही कहां? फिर तो हमें लोकतंत्र की परिभाषा फिर से परिभाषित करने की जरूरत होगी। इसलिए एक ऐसी अदालत का गठन होना जरूरी है जहां पर राष्ट्रपति, राज्यपाल और हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ भी मुकदमा चले।
बिल मंजूरी में डेडलाइन क्यों ना हो? कई बार सुप्रीम कोर्ट संविधान की सीमा का उल्लंघन कर जाता है तो फिर क्यों धाराओं पर बंधकर फैसला दिया? इस फैसले का कोई लौजिक भी नहीं है
मैं यह बात सुप्रीम कोर्ट की मानहानि करने के उद्देश्य से नहीं लिख रहा हूं। एक बुद्धिजीवी और जागरूक पत्रकार के रूप में लिखने का साहस कर रहा हूं। 5 जजों की संविधान पीठ ने खंडपीठ का फैसला पलट दिया। खंडपीठ ने पहले फैसला दिया था कि बिल मंजूरी में 3 माह की समय सीमा तय की जाए। अब 5 जजों की संविधान पीठ ने फैसला ही पलट दिया और कहा कि बिल मंजूरी पर राज्यपाल-राष्ट्रपति के लिए कोई डेडलाइन तय नहीं कर सकते। फिर यह 5 जजों की संविधान पीठ ही कहती है कि…लेकिन अनिश्चतकालीन देरी पर कोर्ट निर्देश देगा…यहां यह 5 जज अनिश्चितकालीन कहकर क्या कहना चाहते हैं…कई बार बिल छह महीने, साल भर, दो साल, तीन साल लटकाए जाते हैं…इस बीच राज्यपाल का ट्रांसफर कर दिया जाता है। कई बार राज्यपाल का कार्यकाल पूरा हो जाता है। राष्ट्रपति भी बिलों को लटकाए रखते हैं। तो क्या 5 जजों का फैसला तर्कपूर्ण और न्यायपूर्ण है? इसे मैं देश के बुद्धिजीवियों और बुद्धिजीवी पत्रकारों के समक्ष रखता हूं। सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों ने फैसला दिया इसका मतलब यह नहीं है कि देश की 140 करोड़ जनता उसे माने ही, देश की 140 करोड़ जनता सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर सुपर पॉवर अदालत की मांग करती है। इस मुद्दे पर विपक्ष को भी कड़े शब्दों में आवाज उठाने की जरूरत है। वो उस दौर में जब राजनीतिक प्रतिद्वंद्वता और मूल्यों मे गिरावट की पराकाष्ठा का दौर हो तब सुपर पॉवर कोर्ट की अत्यंत आवश्यकता हो जाती है। यहां यह बात काबिले गौर है कि राज्यपाल आमतौर पर राज्यों में उस दल का हो यह जरूरी नहीं है क्योंकि राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र की शिफारिश पर की जाती है। केंद्र आमतौर पर अपनी विचारधारा या अपने दल से प्रेरित व्यक्ति को ही राज्यपाल बनाता है। चाहे तो देश का इतिहास उठाकर देख लो। फिर हम कैसे मान लें कि राज्यपाल निष्पक्ष निर्णय करेगा? राज्यपाल बिलों को लटकाए रखता है। इसमें बदनीयती भी हो सकती है। होती भी है। राज्य सरकारें चिल्लाती रहती है, राज्यपाल बिल लटकाए रखते हैं। फिर खंडपीठ ने क्या गलत फैसला दिया? आखिर कुछ तो समय सीमा तय होनी ही चाहिए? यस या नो…कुछ तो होना चाहिए? मगर ऐसा नहीं होता। फिर सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों का फैसला देखते हुए यह अत्यंत ही अनिवार्य हो गया है कि देश में उससे भी ऊपर एक और सुपर पॉवर अदालत का गठन हो।
एक और मामला : अरावली मामले में सुप्रीम कोर्ट नाकाम…?
मेरे हाथ में 21 नवंबर का ही दैनिक भास्कर है। खबर है- अरावली में पुराने खनन जारी रहेंगे, नए लाइसेंस जारी करने पर रोक…सख्ती : केंद्र सरकार अरावली के लिए मैनेजमेंट प्लान बनाए : सुप्रीम कोर्ट….। इस खबर को मैंने पूरा पढ़ा। जहां तक मैं समझ पाया हूं सुप्रीम कोर्ट ने 2 लाख लोगों का रोजगार बचाने की तरफ तो सोचा मगर अरावली जैसी देश और राजस्थान की हार्टलाइन के बारे में नहीं सोचा। अखबार में लिखा है- 3000 से अधिक जगहों पर खुदाई से 31 पहाड़ियां गायब हो गई थीं। इसमें लिखा है- कोर्ट को बताया गया कि अरावली की कोई परिभाषा नहीं है। हर राज्य मनमानी करता है। 2018 की एक रिपोर्ट में सामने आया था कि राजस्थान और हरियाणा में 3 हजार जगहों पर खनन से 31 पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि अरावली पारिस्थितिकी तंत्र ग्रीन बैरियर के रूप में कार्य करता है। यह उत्तर भारत के जलवायु और जैव विविधता को प्रभावित करता है। इसी खबर में आगे एक बॉक्स में लिखा है- अरावली से जुड़ी 11500 खानों पर संकट खत्म…दो लाख लोगों के रोजगार पर असर नहीं पड़ेगा…। यहां सवाल है कि एक संकट को खत्म करने के लिए क्या दूसरे संकट को जन्म दिया जाएगा? खानों से तो संकट खत्म हो गया, रोजगार का भी संकट खत्म हो गया, मगर जो सबसे बड़ा संकट आने वाला है अरावली पूरी खोद दी जाएगी। 11500 खानों से जो खुदाई होगी, उसका दूरगामी परिणाम का आकलन कौन करेगा? देश और राज्य के लोगों को रोजगार देना केंद्र ओर राज्य की सरकारों का कर्त्तव्य है। रोजगार मंत्रालय को सोचना होगा कि 2 लाख लोगों को रोजगार से कैसे जोड़ा जाए? 2 लाख लोगों को खनन क्षेत्र से रोजगार छिन जाए तो उन्हें दूसरे क्षेत्र में रोजगार से जोड़ने का प्लान बनाने की बजाय मौजूदा संकट को टालने की परिभाषा कोर्ट ने न्याय की परिभाषा से जोड़ दी। यह तो उचित नहीं जान पड़ता। कोर्ट काे निर्देश यह देना चाहिए था कि राज्य सरकार दो लाख लोगों के रोजगार की वैकल्पिक व्यवस्था करे और हम 11500 खानों का लाइसेंस रद्द करते हैं तब तो कोई समझदारी भरा फैसला होता, मगर यह तो कोई समझधारी भरा फैसला नहीं हुआ। जिस देश और राज्यों में सरकारें निशुल्क धनराशि बांटती है तो क्या फर्क पड़ता साल भर 2 लाख लोगों को निश्चित अमाउंट सरकार अपने खजाने से देती और फिर साल भर में उनके रोजगार का पुनर्वास कर देती। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी आसान राह निकालने में कौनसा न्याय नजर आता है। वे समस्या को जड़ से खत्म करना क्यों नही चाहते? अरावली पर्वतमाला के बारे में हम बचपन से किताबों में पढ़ते आए हैं। अरावली पर कई कवियों ने कविताएं लिखी है जो अब हमें याद नहीं है। लेकिन इतना जरूर पढ़ा है कि अरावली महत्वपूर्ण पर्वत शृंखला है। और सब बातें छोड़ों इतना तो विज्ञान ने हमें पढ़ाया ही है कि पहाड़ हमारी सेहत और पर्यावरण के लिए कितना महत्वपूर्ण होते हैं? फिर अरावली को लेकर परिभाषा में सुप्रीम कोर्ट क्यों उलझा? सीधा-सीधी फैसला देना था कि पुरानी सभी खानों के लाइसेंस रद्द और नए लाइसेंस पर रोक…। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी पूंजीपतियों के पक्ष में फैसला दिया।
अब इसी खबर का एक पार्ट देखते हैं। जयपुर। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खान विभाग को राहत मिली है। दरअसल 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली 10500 खान है जबकि इससे ऊंचाई वाली खानों की संख्या 900 है। ऐसे में यहां खनन जारी रहने से दो लाख लोगों के रोजगार से संकट दूर हो गया है। खान विभाग को 10 प्रतिशत से अधिक यानी एक हजार करोड़ का राजस्व मिलता रहेगा। विभाग की भी चिंता थी कि 100 मीटर से अधिक की ऊंचाई कम दिखाने के कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट नाराजगी नहीं जताई है। अरावली पर खनन रोकता तो राजस्थान के 20 जिलों जयपुर, अलवर, सीकर, झुंझुनूं, अजमेर, भीलवाड़ा, राजसमंद, उदयपुर, पाली, सिरोही, डूंगरपुर में दो लाख परिवारों पर असर देखने को मिलता। यहां उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस बात पर खुशी देखी गई कि राज्य सरकार को 1 हजार करोड़ का राजस्व मिलता रहेगा और 2 लाख परिवारों को रोजगार मिलता रहेगा। क्या राजस्व के लिए पर्यावरण और मानव जाति को खतरे में डालना उचित है? अरावली की खुदाई से आने वाले समय में भूकंप आएंगे और पर्यावरण तंत्र को कितना नुकसान पहुंचेगा इसका आकलन सुप्रीम कोर्ट करवा पाया और करवा रहा है? मगर सुप्रीम कोर्ट को 2 लाख परिवारों का रोजगार दिख रहा है, राज्य सरकार का 1 हजार करोड़ का राजस्व दिख रहा है। राजस्व का मसला राज्य का है। रोजगार का मसला राज्य और केंद्र का है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सबसे बड़ी समस्या की अनदेखी कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार अरावली के लिए मैनेजमेंट प्लान बनाए। लेकिन इस मैनेजमेंट प्लान के लिए कोई डेडलाइन नहीं दी है। ऐसे में मामला कब निपटेगा कोई नहीं जानता। तब तक अरावली खुदती रहेगी और सरकारें आती रहेगी और जाती रहेगी, इसका कोई रास्ता नहीं निकलेगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को दैनिक भास्कर ऐतिहासिक फैसला लिखता है। लेकिन हमें तो इसमें ऐतिहासिकता जैसी कोई चीज नजर नहीं आती, क्योंकि अरावली का सीना छलनी होना रुकेगा नहीं, जब तक पूरी तरह अरावली छलनी होने से रुक नहीं जाए तब तक सुप्रीम कोर्ट का जस्टिस अधूरा है। इसलिए सुपर पॉवर अदालत की और भी ज्यादा जरूरत है, जो सभी पहलुओं पर विचार करे ओर एक समझदारी भरा और पूर्ण जस्टिस करे।
कैसे गठित हो सकता है- Constitutional Court of India (CCI)- क्या संविधान में पहले से कोई प्रावधान है?
वर्तमान संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है
भारत का संविधान सुप्रीम कोर्ट को Apex Court घोषित करता है।
अनुच्छेद 124–147
में सुप्रीम कोर्ट की संरचना, अधिकार क्षेत्र और कार्यक्षेत्र पूरी तरह परिभाषित है।
इन धाराओं के अनुसार:
सुप्रीम कोर्ट final court of appeal है
इसके निर्णय final and binding हैं
इसके ऊपर कोई अदालत नहीं हो सकती—जब तक कि संविधान स्वयं बदल न दिया जाए।
अगर ऐसा Court बनाना हो — प्रक्रिया क्या होगी?
इसके लिए संवैधानिक संशोधन (Constitutional Amendment) आवश्यक है।
कौन-सा संशोधन?
अनुच्छेद 124 से 147 तक में संशोधन
एक नया अध्याय (New Chapter) जोड़ना होगा
सुप्रीम कोर्ट की “final authority” वाली धाराएँ बदलनी होंगी
संसद को संविधान के “basic structure” सिद्धांत का पालन भी करना होगा
इसलिए इसकी प्रक्रिया होगी:
(A) संसद में संविधान संशोधन बिल प्रस्तुत करना
– लोकसभा में 2/3 बहुमत
– राज्यसभा में 2/3 बहुमत
(B) आधे से अधिक राज्यों की विधायिकाओं द्वारा पुष्टि (ratification)
क्योंकि यह संशोधन न्यायपालिका के संघीय ढांचे से संबंधित है।
(C) राष्ट्रपति की स्वीकृति
इसके बाद ही ऐसा कोई नया “सुप्रीम कोर्ट से ऊपर” वाला न्यायालय अस्तित्व में आ सकेगा।
क्या संसद सामान्य कानून से ऐसा अदालत बना सकती है?
नहीं।
कारण:
साधारण कानून (simple Act of Parliament) से:
– हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को बदला नहीं जा सकता
– किसी नई सर्वोच्च अदालत का निर्माण नहीं हो सकता
सुप्रीम कोर्ट के ऊपर नई अदालत बनाने के लिए संविधान संशोधन अनिवार्य है।
क्या दुनिया में ऐसा मॉडल है?
हाँ:
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जर्मनी: Federal Constitutional Court
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फ्रांस: Constitutional Council
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द. कोरिया: Constitutional Court
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द. अफ्रीका: Constitutional Court
इन देशों में
“सुप्रीम कोर्ट” सामान्य आपराधिक/सिविल मामलों को देखता है
“संवैधानिक कोर्ट” केवल संविधान की सर्वोच्च व्याख्या करता है।
ये भी पढ़ें :
राष्ट्रपति पर आरोप लगने की स्थिति में (President of India)
भारत का संविधान — अनुच्छेद 361(1)
अनुच्छेद 361(1) कहता है:
“राष्ट्रपति को उनके कार्यकाल में किसी भी न्यायालय में अपराधिक कार्रवाई से पूर्ण संरक्षण प्राप्त होगा।”
इसका अर्थ:
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राष्ट्रपति अपने पद पर रहते हुए किसी भी कोर्ट में न तो बुलाए जा सकते हैं,
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और न ही उन पर कोई आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है।
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नोटिस, सम्मन, वारंट—कुछ भी जारी नहीं किया जा सकता।
लेकिन शिकायत की जा सकती है?
हाँ, शिकायत दर्ज हो सकती है, पर कार्रवाई उनके पद छोड़ने के बाद ही संभव है।
राज्यपाल पर आरोप लगने की स्थिति में (Governor of a State)
भारत का संविधान — अनुच्छेद 361(2)
अनुच्छेद 361(2) कहता है:
“राज्यपाल को भी उनके कार्यकाल में आपराधिक मामलों से पूर्ण प्रतिरक्षा (protection) प्राप्त होगा।”
इसका अर्थ:
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राज्यपाल को भी राष्ट्रपति की तरह किसी भी आपराधिक केस में कोर्ट नहीं बुला सकता।
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उनके विरुद्ध प्रोसिक्यूशन (मुकदमा) पद छोड़ने के बाद ही संभव है।
क्या सिविल (दीवानी) मामलों में बुलाया जा सकता है?
संविधान अनुच्छेद 361(3)
सिविल मामलों में राष्ट्रपति/राज्यपाल को बुलाया जा सकता है, लेकिन:
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उनके खिलाफ केस करने से कम से कम 2 महीने पहले नोटिस देना अनिवार्य है।
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कोर्ट उनके पद का सम्मान करते हुए कार्रवाई करता है।
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उन्हें कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से बुलाना अत्यंत दुर्लभ और संवैधानिक रूप से अनुचित माना जाता है।
राष्ट्रपति/राज्यपाल के हटाने (इम्पीचमेंट/रिमूवल) का तरीका
यदि गंभीर आरोप हों, तो कोर्ट नहीं बल्कि संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जाती है:
राष्ट्रपति का हटाना — अनुच्छेद 61 (इम्पीचमेंट)
राज्यपाल का हटाना — राष्ट्रपति का pleasure (अनुच्छेद 156)
संक्षेप में स्पष्ट उत्तर:
प्रश्न: क्या राष्ट्रपति और राज्यपाल को कोर्ट में बुलाया जा सकता है?
उत्तर:
आपराधिक मामलों में — नहीं।
सिविल मामलों में — धारा 361(3) के अंतर्गत नोटिस देकर संभव, परंतु व्यवहार में बेहद कम और सीमित।
किस धारा के तहत संरक्षण?
भारत का संविधान — अनुच्छेद 361(1), 361(2) और 361(3)
भारत के संविधान में “लोकतंत्र (Democracy)” की कोई एक सीधी, शब्दशः परिभाषा नहीं दी गई है, लेकिन संविधान की प्रस्तावना, मूल अधिकारों, और शासन की संरचना को देखकर भारत के लोकतंत्र की संवैधानिक परिभाषा स्पष्ट होती है।
संविधान में दी गई लोकतंत्र की परिभाषा भी पढ़ लो…नहीं तो परिभाषा बदलने की जरूर….?
1. प्रस्तावना (Preamble) में लोकतंत्र
प्रस्तावना में भारत को घोषित किया गया है:
“We, the People of India… to constitute India into a Sovereign Socialist Secular Democratic Republic…”
अर्थात भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है।
इससे लोकतंत्र के दो मूल तत्व सिद्ध होते हैं:
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सत्ता का स्रोत जनता है — We, the People of India (जनता से बढ़कर कोई नहीं। राष्ट्रपति को देश का पहला नागरिक कहा गया है, क्या पहले नागरिक को अदालत में खड़ा नहीं किया जा सकता? आखिर क्यों? राज्यपाल को राज्य का पहला नागरिक कहा गया है तो क्या उसे कोर्ट में खड़ा नहीं किया जा सकता? क्यों?…जब देश का अंतिम नागरिक कोर्ट में खड़ा हो सकता है तो पहला नागरिक क्यों नहीं? लोकतंत्र की परिभाषा फिर से लिखने की जरूरत है। राष्ट्रपति को देश की जनता नहीं चुनती। फिर उसे देश का सर्वोच्च सत्ताधीश कैसे कह सकते हैं? जिसे जनता नहीं चुनती उसके हाथ में सर्वोच्च शक्तियां कैसे दी जा सकती है? इंदिरा गांधी के कार्यकाल में राष्ट्रपति शासन और इमरजेंसी काला अध्याय हमारे सामने है। )
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जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन चलाती है — Democratic Republic (दुर्भाग्य : प्रतिनिधि शासन चलाते हैं जनता गौण हो जाती है…राइट टू रिकाॅल का सिस्टम नहीं…)
2. लोकतंत्र की संवैधानिक अवधारणा
संविधान में लोकतंत्र की परिभाषा सीधे शब्दों में नहीं, परन्तु इसके तत्व (elements) स्पष्ट रूप से स्थापित हैं:
(A) जनप्रतिनिधि शासन – Article 326
लोकसभा और विधानसभा के चुनाव “सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार” से होंगे।
यह लोकतंत्र की मूल अवधारणा है — एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य। राज्यपाल और राष्ट्रपति के चयन में जनता की सीधी भागीदारी नहीं फिर उन्हें लोकतंत्र में सर्वाधिक शक्तियां क्यों? अंबेडकर के बनाए संविधान में ही गलतियां हैं।
(B) संसद और राज्य विधानमंडल – Articles 79–122
जन-प्रतिनिधियों से बना शासन तंत्र लोकतंत्र का औपचारिक ढांचा देता है। …(यह औपचारिक ढांचा ही है वास्तविक नहीं।)
(C) मूल अधिकार – Part III
• अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 19) (जज जो चाहे टिप्पणी कर देते हैं, देश के राजनेता चाहे प्रधानमंत्री ही क्यों ना हो कोई भी टिप्पणी कर देते हैं मगर आम जनता पर ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्यों बाधित की जाती है? इसकी परिभाषाएं जज अपने तरीके से तय करते हैं। )
• समानता (Article 14) (अंबेडकर के संविधान में समानता के अधिकार की धज्जियां उड़ाई गई है। आरक्षण, एसटी एससी कानून, महिला कानून और बहुत से कानून ऐसे हैं जो समानता के इस पहलू की अनदेखी करते हैं। अंबेडकर का संविधान मनमाना और अतार्किक है। सबसे पहले अंबेडकर पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए।)
• जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार (Article 21) (पूरे देश में गुंडा और माफिया राज चल रहा है। ना सरकारें आम आदमी की सुरक्षा कर पाई और ना ही अदालतें, फिर काहे का जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार…?)
ये अधिकार लोकतांत्रिक समाज का आधार हैं।
(D) शक्तियों का विभाजन – Legislature, Executive, Judiciary
तीनों अंग स्वतंत्र, परंतु संतुलित — यह लोकतंत्र की विशेषता है। (यह दिखावा है दरअसल भारत में तीनों अंगों का गठजोड़ हो चुका है और पूरा लोकतंंत्र का रथ पटरी से उतर चुका है। )
(E) पंचायती राज और स्थानीय लोकतंत्र – Part IX & IX-A
• संविधान संशोधन 73वां व 74वां
• गांव और शहरों में स्थानीय स्वशासन
3. सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या (Judicial Interpretation)
सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसलों में लोकतंत्र की व्याख्या की है, विशेष रूप से:
1. केशवानंद भारती केस (1973)
लोकतंत्र को संविधान की “मूल संरचना” (Basic Structure) का हिस्सा माना गया।
इसका अर्थ है — लोकतंत्र को समाप्त या कमजोर करने वाला कोई संशोधन असंवैधानिक होगा। (हमारा तो यह मानना है कि जब संविधान बनाया गया तब ही लोकतंत्र की सही व्याख्या नहीं की गई। राष्ट्रपति, राज्यपाल लोकतंत्र से ऊपर कैसे हो सकते हैं? जब लोकतंत्र के अंतिम नागरिक को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है तो देश और राज्य के पहले आदमी को क्यों नहीं? समानता और लोकतंत्र की भावना की यहीं हत्या कर दी गई है। )
2. एस.आर. बोम्मई केस (1994)
लोकतंत्र = जनता की इच्छा से चलने वाला शासन। (सरकार बनने के बाद जनता की इच्छाएं कभी नहीं पूछी जाती। केवल सरकारें निर्णय लेती है। सरकार की इच्छा तो तब हो जाती जब विशिष्ट मामलों में रायशुमारी करवाते, पक्ष जानते, कानून बनाने से पहले जनता की राय जानी जाती। दरअसल लोकतंत्र में चुनाव के बाद जनता गौण हो जाती है और ब्यूरोक्रेसी और नेता हावी हो जाते हैं। लोकतंत्र की परिभाषा को फिर से लिखने की जरूरत है।)
4. संक्षेप में संविधान में स्थापित लोकतंत्र की परिभाषा
भारतीय संविधान के अनुसार लोकतंत्र की अवधारणा इस प्रकार समझी जाती है:
जनता सर्वोच्च है (केवल संविधान में सर्वोच्च, वास्तव में नहीं।)
सरकार जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता की होती है (माना जाता है।)
चुनाव सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से होते हैं
सत्ता के तीनों अंग स्वतंत्र हैं (तीनों का आपराधिक गठजोड़ हो चुका है।)
मूल अधिकार लोकतांत्रिक ढांचे के संरक्षक हैं (लोकतांत्रिक ढांचा ही ध्वस्त हो चुका है।)
स्थानीय स्तर पर भी सत्ता विकेन्द्रित है
उपरोक्त बिंदुओं की रोशनी में मोदीजी से राइजिंग भास्कर की मांग : Constitutional Court of India (CCI) का बिल लाएं
उपरोक्त बिंदुओं की रोशनी में राइजिंग भास्कर की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मांग है कि Constitutional Court of India (CCI) के गठन के लिए बिल लाए और सभी दलों को इसे सर्वसम्मति से पास करवाना चाहिए। एक बार फिर से संविधान को नए सिरे से लिखा जाए और आरक्षण, एसटी एससी, महिला कानून और कई कानूनों की समीक्षा की जाए। अभी भारत के संविधान पर बाबा साहेब अंबेडकर की चरण धूल हटाकर वास्तविक लोकतंत्र और समानता का संविधान लाना बाकी है। हम पहले आदमी होंगे जो इस संविधान को अपरिपक्व लोकतंत्र का जनक बताते हैं और संविधान के पुनर्लेखन का मुद्दा उठाते हैं।
Author: Dilip Purohit
Group Editor






