(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की चौतीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
आत्मीय साधकों,
ब्रह्मांड का यह अटल सत्य है कि मनुष्य अपने जीवन का शिल्पकार स्वयं है। वह अपने सुखों का निर्माता भी है और अपने दुखों का कारण भी। संसार में परिस्थितियां भले ही अनुकूल-प्रतिकूल हों, परंतु उन परिस्थितियों को मन किस प्रकार ग्रहण करता है—यही उसके सुख-दुख की वास्तविक जड़ है। अनेक ग्रंथों, ऋषियों, संतों और महापुरुषों ने एक ही स्वर में कहा है कि मनुष्य का अंतःकरण ही उसके जीवन की दिशा तय करता है।
मन ही बंधन और मन ही मोक्ष
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्”
अर्थात मनुष्य को स्वयं अपने द्वारा ही अपने को ऊपर उठाना चाहिए, न कि स्वयं को गिराना चाहिए।
यह वचन स्पष्ट करता है कि हमारे जीवन का उत्थान या पतन दूसरों द्वारा नहीं, बल्कि हमारे अपने मन और कर्मों द्वारा निर्धारित होता है। बाहर का संसार जैसा है, वैसा ही रहेगा; लेकिन मन जैसा हो जाता है, वैसा ही संसार हमें दिखाई देता है।
बुद्ध का संदेश—दुख का मूल कारण स्वयं की वृत्ति
भगवान बुद्ध ने कहा,
“दुःख का कारण इच्छा है, और इच्छा का अंत ही शांति है।”
यहाँ भी संकेत स्पष्ट है—दुख बाहर नहीं है; दुख हमारे भीतर की अनियंत्रित इच्छाओं, अपेक्षाओं और आसक्तियों से उत्पन्न होता है। यदि व्यक्ति विवेक के साथ इच्छाओं को नियंत्रित करे, तो दुख मिट जाता है। यदि वह अंधी दौड़ में लगा रहे, तो दुख और गहरा होता जाएगा।
कबीर का दोहा: दोष अपने भीतर खोजो
संत कबीर ने कहा—
“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”
यह दोहा मानव मन की सबसे बड़ी भूल को उजागर करता है—अपनी कमियों को देखने की बजाय दूसरों को दोष देना। जब मनुष्य अपनी जिम्मेदारियों और गलतियों को स्वीकार करना शुरू कर देता है, तभी वह वास्तविक सुख की दिशा में आगे बढ़ता है।
रामायण का संदेश—मन की स्थिरता सुख की कुंजी
श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं—
“मन कर्म वचन राम पद नेहू।”
जिस मन ने भगवान के चरणों में प्रेम और स्थिरता लगा ली, उसका दुख-सुख से संबंध ही समाप्त हो गया।
अर्थात मन की स्थिरता ही सुख का मुख्य कारण है। मन अगर शांत है तो विपत्ति में भी सुख है; मन अगर अशांत है तो वैभव में भी दुख है।
श्रीरामकृष्ण परमहंस—संसार मन का प्रतिबिंब
श्रीरामकृष्ण परमहंस कहा करते थे—
“मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही हो जाता है।”
यदि मन में भय, असुरक्षा, क्रोध, ईर्ष्या भरी हो तो जीवन दुखमय लगता है। लेकिन यदि मन में श्रद्धा, समर्पण, धैर्य और साहस भरा हो तो जीवन के कठिन क्षण भी शिक्षा बन जाते हैं। संसार हमारा प्रतिबिंब है—जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि।
मनोवृत्ति का प्रभाव—एक ही घटना, दो परिणाम
मान लीजिए किसी व्यक्ति को नौकरी में कठिनाई आ गई।
एक व्यक्ति इस घटना को समस्या मानकर रोने-धोने लगता है—वह दुखी हो जाता है।
दूसरा व्यक्ति उसी घटना को अवसर मानकर अपने कौशल सुधारने या नई दिशा खोजने में लग जाता है—वह आगे बढ़ता है।
घटना दोनों के लिए समान थी, मगर प्रतिक्रिया अलग होने से परिणाम भी पूरी तरह अलग हुए।
यही सिद्ध करता है कि सुख-दुख भीतर से उत्पन्न होते हैं, बाहर से नहीं।
श्रीअरविंद का संदेश—अंतर्यात्रा ही समाधान है
श्रीअरविंद कहते हैं—
“सभी समस्याओं का समाधान भीतर है; बाहर तो केवल उनकी झलक मात्र है।”
आज का मनुष्य बाहरी उपलब्धियों में सुख ढूँढता है—धन, पद, प्रतिष्ठा, सफलता… परंतु ये सभी क्षणिक हैं।
जब तक भीतर की स्थिरता नहीं है, बाहर का सुख टिक नहीं सकता।
गुरु नानक देव—मन की मैल ही दुख का कारण
गुरु नानक देव कहते हैं—
“मन जीतै जग जीत।”
अर्थात जिसने मन को जीत लिया, उसने संसार को जीत लिया।
मन की मैल—जैसे ईर्ष्या, लोभ, क्रोध, आलस्य, छल—ये ही दुख का सबसे बड़ा कारण हैं।
जब तक इन मैलों को साफ नहीं किया जाता, तब तक सुख सिर्फ कल्पना बनकर रह जाता है।
आधुनिक उदाहरण—सकारात्मक और नकारात्मक सोच
आज विज्ञान भी यही कह रहा है कि व्यक्ति की मानसिक ऊर्जा उसके अनुभवों को बदल देती है।
Positive psychology के अनुसार—
यदि व्यक्ति हर परिस्थिति में कृतज्ञता, सकारात्मकता और आशा को अपनाता है, तो उसका मानसिक स्वास्थ्य, निर्णय क्षमता और संपूर्ण जीवन बेहतर हो जाता है।
दूसरी ओर, जो व्यक्ति हर बात में नकारात्मकता खोजता है, वह स्वयं ही अपने दुख का कारण बन जाता है।
हम दुख क्यों पैदा करते हैं?
मनुष्य अपने दुख का कारण पाँच मुख्य रूपों में बनता है—
-
अत्यधिक अपेक्षाएँ
– जितनी अपेक्षाएँ, उतनी निराशाएँ। -
तुलना की आदत
– दूसरों से तुलना व्यक्ति के सुख को खा जाती है। -
अतीत में जीना और भविष्य की चिंता
– जो वर्तमान में जीना नहीं जानता, वह कभी सुखी नहीं हो सकता। -
आत्मज्ञान का अभाव
– स्वयं को न समझने से, गलत निर्णय और दुख उत्पन्न होते हैं। -
वासनाएँ और आसक्तियाँ
– अधिक पाने की लालसा कभी समाप्त नहीं होती, इसलिए दुख बढ़ता जाता है।
सुख कैसे निर्मित होता है?
मनुष्य स्वयं निम्न तरीकों से अपना सुख रच सकता है—
-
मन का प्रशिक्षण—प्रतिदिन कुछ समय ध्यान, जप, मौन।
-
सकारात्मक दृष्टिकोण—हर परिस्थिति में सीख खोजना।
-
कर्मयोग—कार्य में निष्काम भाव अपनाना।
-
कृतज्ञता—जो मिला है, उसे स्वीकार करना।
-
आत्मचिंतन—अपनी गलतियों को देखना और सुधारना।
-
सरल जीवन—कम अपेक्षाएँ, अधिक संतोष।
-
सत्संग और धर्मप्रेरणा—मन की मैल दूर होती है।
सौ बातों की एक बात : स्वयं ही अपने सुख-दुख के रचयिता बनें
“मनुष्य जब तक अपने दुखों के लिए दूसरों को दोष देता रहेगा, तब तक उसकी मुक्ति नहीं।
और जिस दिन वह समझ गया कि सुख-दुख का कारण वही स्वयं है, उसी दिन उसके जीवन में प्रकाश फैल जाएगा।”
जिस मनुष्य ने अपने भावों, प्रतिक्रियाओं और कर्मों को नियंत्रित कर लिया, वही आत्मबल, शांति और सच्चे सुख को प्राप्त कर लेता है।
जीवन में दुख आएँगे, बाधाएँ आएँगी—लेकिन बुद्धिमान वही है जो इन सबको अपने भीतर के प्रकाश से बदल देता है।
यही है—मनुष्य स्वयं अपने सुख-दुख का कारण है।
जो स्वयं को समझ लेता है, वही विश्व को समझ लेता है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor





