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Thursday, July 9, 2026, 10:53 am

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प्रभु का भजन, आत्मा का सात्विक भोजन है : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की तैतालीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

प्रिय साधकों,

आज का विषय अत्यंत सरल दिखाई देता है, परंतु इसके भीतर संपूर्ण अध्यात्म की गहराई छुपी है। हम शरीर को भोजन देते हैं—दाल-रोटी, जल, फल—ताकि शरीर सशक्त रहे। परंतु क्या आपने कभी सोचा कि आत्मा का भोजन क्या है? आत्मा अमर है, शरीर नश्वर। शरीर का भोजन क्षणिक शक्ति देता है, आत्मा का भोजन जीवन की दिशा बदल देता है। और वही सात्विक भोजन है—प्रभु का भजन

भजन क्यों आत्मा का भोजन है?

जिस प्रकार भोजन शरीर की थकान हरता है, उसी प्रकार भजन मन की थकान को दूर कर देता है। भजन करते ही भीतर से उठती है शांति की एक मधुर लहर; मन में छिपा हुआ क्लेश, क्रोध, ईर्ष्या, भय—सब पिघलने लगता है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“मननं ध्यानं जपो नित्यं, तत्सर्वं भक्ति-रूपकम्।”
अर्थात: मनन, ध्यान, जप—ये सब भक्ति के रूप हैं और आत्मा के लिए ऊर्जा का स्रोत हैं।

जब मन सतत ईश्वर-स्मरण में रहता है, तब वह चिंता के अंधकार में नहीं भटकता। जैसे सूर्य निकल जाए तो अंधेरा स्वयं मिट जाता है, वैसे ही भजन हृदय में दिव्यता का प्रकाश भर देता है।

संत कबीर का संदेश—भजन से बढ़कर कोई तप नहीं

कबीर दास जी ने स्पष्ट कहा—
“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए।”

कबीर साहब भजन को वह साधन मानते थे जो मनुष्य को संतुलित करता है—न अधिक लोभ, न अधिक मोह। भजन मनुष्य के भीतर संयम, संतोष और सहजता पैदा करता है। यह वह भोजन है जो आत्मा को विषैला होने से बचाता है।

श्रीमद्भागवतम् – भजन से आत्मा का शुद्धिकरण

भागवत पुराण में कहा गया है कि नाम-स्मरण मन के मलिन संस्कारों को धोने का सबसे सरल साधन है।
“कीर्तनादेव कृष्णस्य, मुक्तसंगः परं व्रजेत्।”
अर्थात: केवल कृष्ण का कीर्तन ही मनुष्य को बंधनों से मुक्त कर देता है।

जब हम भजन गाते हैं, तो शब्दों की ऊर्जा मन के भीतर जमा हुई नकारात्मकता को बाहर निकालती है। यह आत्मा की तृप्ति है—सात्विक, पवित्र, दिव्य।

तुलसीदास जी—भजन से मिलता है अदृश्य बल

तुलसीदास जी कहते हैं—
“राम नाम जपत मंगल दिसा।”
राम का नाम जपने से हर दिशा में मंगल ही मंगल होता है।
भजन आत्मा को ऐसा सात्विक भोजन देता है जिससे भीतर अद्भुत शक्ति उत्पन्न होती है। जो काम मनुष्य के बाहरी बल से नहीं होते, वे भजन के आंतरिक बल से हो जाते हैं।

आधुनिक विज्ञान भी भजन की शक्ति मानता है

आज न्यूरोसाइंस तक मानता है कि शांत, तालबद्ध भजन सुनने और गाने से—

  • मस्तिष्क की तरंगें शांत होती हैं

  • तनाव लगभग 60% कम होता है

  • रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है

जिस प्रकार सात्विक भोजन शरीर को हल्का, स्वस्थ और ऊर्जावान बनाता है, उसी प्रकार भजन मन को हल्का और आत्मा को ऊर्जावान करता है।

महर्षि अरविंद—आत्मा का आरोहण भजन से

महर्षि अरविंद कहते हैं कि ईश्वर-स्मरण और भजन आत्मा को ऊपर उठाते हैं—उस स्तर तक जहाँ चिंता, पीड़ा, भ्रम, मोह—कुछ भी नहीं रह जाता।
भजन मात्र संगीत नहीं है; यह चेतना का आरोहण है।

भक्त मीरा—भजन ही उनका प्राण-आहार

मीरा बाई ने कहा—
“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।”
उनके लिए भजन केवल रस्म नहीं, बल्कि जीवन था। भोजन बिना एक दिन रह सकती थीं, पर भजन बिना एक क्षण नहीं।

उनकी आत्मा का सात्विक भोजन सिर्फ और सिर्फ भजन था। इसलिए मीरा के भजन आज भी लोगों के हृदय में दिव्यता भरते हैं।

भजन आत्मा को क्या देता है?

आत्मा की आवश्यकता भजन देता है
शांति मन का संतुलन
प्रेम ईश्वर से संबंध
पवित्रता अशुद्धियों का शुद्धिकरण
साहस भीतर की दिव्यता की अनुभूति
आनंद अनंत सुख का स्पर्श

भजन का रस वही जानता है जिसने कभी मन लगाकर गाया हो। भजन आत्मा को उसी प्रकार तृप्त करता है जैसे तपस्वी को समाधि तृप्त करती है।

एक छोटी कथा – भजन का चमत्कार

एक बार एक राजा ने एक महात्मा से पूछा:
“आप कहते हैं कि भजन आत्मा का भोजन है। कैसे?”
महात्मा मुस्कुराए और बोले, “राजन, कल मेरे साथ भजन कीर्तन में बैठिए।”

राजा बैठ गया। आधे घंटे में ही उसका मन हल्का हो गया। जो चिंताएँ वर्षों से उसे परेशान कर रही थीं, वे धुंध की तरह गायब होने लगीं।
राजा ने कहा, “गुरुदेव! मुझे ऐसा क्यों महसूस हो रहा है?”
महात्मा बोले,
“राजन! तुमने अभी आत्मा का भोजन किया है। जब आत्मा तृप्त होती है, तब मन शांत हो जाता है। यही भजन का प्रभाव है।”

भजन आत्मा का भोजन कैसे बनता है?

(क) शब्दों की शक्ति से

‘राम’ ‘कृष्ण’ ‘हरि’—ये केवल शब्द नहीं, शक्तियाँ हैं।
जैसे भोजन में कैलोरी होती है, वैसे ही नाम-जप में दिव्य ऊर्जा होती है।

(ख) लय से उत्पन्न शांति

भजन की लय मन को ईश्वर की ओर मोड़ती है।
लय और ताल मन की अव्यवस्था को संतुलन में बदल देते हैं।

(ग) भक्ति की तरंग

भजन करते समय मन में उमड़ती भक्तिभाव की तरंग आत्मा को शीतलता प्रदान करती है।
यह भोजन की तरह तृप्ति देता है—पर यह तृप्ति दिव्य होती है।

भजन हर परिस्थिति में संबल देता है

  • दुःख में: सहारा

  • सुख में: विनम्रता

  • असफलता में: साहस

  • सफलता में: संतुलन

  • बीमारी में: मानसिक शक्ति

  • अकेलेपन में: साथ

जो व्यक्ति रोज़ भजन करता है, वह कभी मानसिक रूप से दरिद्र नहीं होता।

सौ बातों की एक बात—भजन से भीतर खुलता है दिव्यता का द्वार

भजन केवल गाना नहीं है। यह आत्मा का सात्विक भोजन है जो—

  • मन को निर्मल करता है,

  • हृदय को पवित्र करता है,

  • चेतना को ऊँचा उठाता है,

  • जीवन को अर्थ प्रदान करता है।

साधकों!
प्रभु का भजन आत्मा को ऐसा भोजन देता है जो किसी बाज़ार में नहीं मिलता, किसी रसोई में नहीं बनता, किसी प्रयोगशाला में नहीं तैयार होता—यह तो केवल प्रेम से बनता है, प्रेम से मिलता है, और प्रेम से ही आत्मा को तृप्त करता है।

इसलिए, जितना भोजन शरीर के लिए आवश्यक है, उतना ही भजन आत्मा के लिए।
भोजन जीवन देता है—
भजन दिशा देता है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor