लेखक : शिवसिंह
9784092381
यम का मतलब होता है निग्रह अर्थात् छोड़ना। हम जीवन में क्या छोड़ें? क्यों छोड़ें? हमारे जीवन की जो विकारी बातें हैं, पतित करने के हैं, जीवन के लिए जो अकरणीय हैं, उनको छोड़े बिना जीवन का विकास हो नहीं सकता। पतंजलि ने ऐसे पाँच यमों को योग की आधारशिला माना है। ये पांच यम हैं हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन या व्यभिचार तथा परिग्रह का त्याग। मनुष्य की सारी प्रवृत्तियां तीन क्रम द्वारा होती हैं। जैसे स्वयं किसी कार्य को करना, दूसरों से किसी कार्य को करवाना तथा तीसरा किसी कार्य को करने वालों की अनुमोदना या प्रशंसा करना।
उनके साथ तीन में से कोई न कोई अवश्य होता है। ये तीन योग हैं, मन का योग, वचन का योग और काया का योग। जैसे किसी कार्य को मन से करना, वाणी से करना, काया से करना। अन्य से करवाना अथवा कार्य करने वालों की मन, वाणी या काया से अनुमोदना करना, सहयोग देना। बिना करण और योग के कार्य हो नहीं सकता। किसी प्रवृत्ति के लिए कम से कम तीन करण और तीन योग में से एक करण और एक योग का होना अनिवार्य होता है। सच्चा साधक इन पांचों यमों का पूर्ण रूप से तीन करण और तीन योग से जीवन भर पालन करता है। उसके लिए संकल्प बद्ध होता है। अतः उनके व्रतों को महाव्रत कहते हैं। जीव-जीवन मन, वचन और काया से किसी जीव को न तो स्वयं कष्ट पहुंचाना, न किसी व्यक्ति से कष्ट पहुंचवाने में सहयोगी बनना और न प्रत्यक्ष रूप से किसी भी चेतन-अचेतन प्राणी को कष्ट पहुँचाने वाले को प्रोत्साहित करना, अच्छा न मानना ही हिंसा का पूर्णतः त्याग होता है। हिंसा-अहिंसा को जानने के लिए क्या है? अहिंसा क्या है, को जानना, समझना आवश्यक है?
उसके बिना पूर्ण अहिंसा का पालन कैसे संभव हो सकता है? परन्तु आज के मानव ने हिंसा को मात्र मानव तक सीमित कर दिया है। स्वार्थवश अन्य जीवों को कष्ट पहुँचाते तनिक भी संकोच नहीं होता। वनस्पति और पानी में भी आधुनिक विज्ञान ने जीव माना है परन्तु उनका दुरुपयोग करने प्रायः अधिकतर अहिंसक कहलाने वाले मानव तनिक भी नहीं हिचकिचाते। पृथ्वी, वायु और अग्नि में भी जीव होते हैं। अतः उनका कैसे उपयोग किया जाए, जानना और समझना आवश्यक है। आज पर्यावरण की सारी समस्याओं का कारण उनके प्रति हमारा अज्ञान और अविवेक ही है। हिंसा का मतलब किसी जीव को कष्ट पहुंचाना, प्रताड़ित करना, मारना आदि। दुःख देने से दुःख मिलता है। यह प्रकृति का सनातन सिद्धांत है। हिंसा दो प्रकार की होती है। प्रथम द्रव्य हिंसा तथा दूसरी भाव हिंसा। वर्तमान में मात्र द्रव्य हिंसा तक ही हमारा सोच प्रायः सीमित होता जा रहा है। परन्तु द्रव्य हिंसा की जड़ भाव हिंसा ही है। जिसके मूल कारण होते हैं आसक्ति, अनैतिकता, अनावश्यक कामनार्थ, धर्म के नाम पर साम्प्रदायिक उन्माद, जातिवाद, मानववाद, राष्ट्रवाद की संकीर्ण भावना तथा इन सब के मूल में होते हैं आध्यात्मिक चेतना का अभाव, स्वेच्छाद एवं संकीर्ण स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियाँ। ये ही वे कारण हैं, जो दूसरों के साथ निर्भरता, कुतन्त्र और दुःख देने जैसी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करते हैं, तथा हिंसा को बढ़ावा देते हैं। रोग भी एक प्रकार का दुःख है। अतः हमें अन्य जीवों को किसी भी प्रकार से प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से कष्ट नहीं देना चाहिए। यही स्वास्थ्य अथवा योग साधना की प्रारम्भिक भूमिका होती है।मन में जैसा सम्यक् ज्ञान से सोचा हो, आँखों से जैसा जो कुछ देखा हो और कानों से जैसा जो कुछ सुना हो उसे ठीक वैसा ही अभिव्यक्त न करना झूठ कहलाता है और वैसा ही प्रस्तुतीकरण करना सत्य कहलाता है। किसी की वस्तु को बिना पूछे लेना चोरी कहलाता है और समस्त इन्द्रियों के विषय विकारों पर संयम न रखना असंयम कहलाता है और उनका संयम ब्रह्मचर्य होता है। जबकि परिग्रह का मतलब धन, परिवार और अन्य भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति भाव या लगाव होना।अतः योगाभ्यास करने से पूर्व प्रत्येक साधक के लिए इन दुर्गुणों को त्याग कर अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का पालन आवश्यक होता है। जो योग की सफलता की आधारशिला है। बिना नींव के मकान बन नहीं सकता। बिना जड़ के वृक्ष विकसित नहीं हो सकता। ठीक उसी प्रकार यम के पालन के बिना योग का सम्पूर्ण लाभ प्राप्त नहीं हो सकता, मात्र शरीर की कार्य क्षमता बढ़ती है। यमों के पालन की कोई सीमा अथवा अवधि नहीं होती। वे सदैव सभी परिस्थितियों में प्राथमिकता के आधार पर आचरणीय होते हैं। जैन संतों के पाँचों यमों के पूर्णतया पालन का संकल्प होता है तथा सच्चे आत्मार्थी साधु आज भी उनका पालन करते देखे जा सकते हैं।





