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Thursday, April 30, 2026, 11:16 pm

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चिठ्ठी आई है : रामानन्द काबरा

चिठ्ठी आई है…
(भाग–3 : जड़ें)

घर के किसी कोने में
एक जोड़ी चप्पल
अक्सर चुपचाप पड़ी रहती है।
न कोई आवाज़,
न कोई मांग।
वह चुप्पी
बुज़ुर्गों की होती है।

आज के माता–पिता
किसी चीज़ से शिकायत नहीं करते।
वे जानते हैं—
बच्चे व्यस्त हैं,
जीवन तेज़ है,
समय कम है।
वे बोझ नहीं बनना चाहते।
इसलिए दर्द को
मुस्कान में छुपा लेते हैं

अस्पताल के गलियारे में
अकेले बैठे
किसी बुज़ुर्ग को देखिए।
फोन हाथ में है,
पर कॉल करने की हिम्मत नहीं।
डर है— कहीं बेटा कह न दे—
अभी मीटिंग में हूँ…
थोड़ा बाद में बात करते हैं…
और वह “थोड़ा बाद”
अक्सर
कभी नहीं आता।

यह पीढ़ी
मरने से नहीं डरती।
उसे डर है— अकेले मरने से।
डर है— कि यदि एक चला गया,
तो दूसरा
किसके सहारे रहेगा?
*शहर चमक रहे हैं*,
*पर घर सूने हो रहे हैं*।

फ्लैट ऊँचे हैं,
पर रिश्ते नीचे उतर गए हैं।
हम कहते हैं—
हम बहुत आगे बढ़ गए हैं…
पर शायद
हम अपनी जड़ों से
काफी दूर आ गए हैं।

बुज़ुर्ग
सिर्फ़ देखभाल नहीं चाहते।
वे चाहते हैं—
कोई सुने
कोई पूछे
कोई साथ बैठे
थोड़ी देर ही सही।
और जब यह नहीं मिलता,
तो वे
धीरे–धीरे
अपने भीतर
सिमटने लगते हैं।

उनकी पीड़ा
शोर नहीं करती—
वह
मौन होती है।

जिस समाज में
मौन पीड़ा बढ़ जाए,
वहाँ आत्मा बीमार हो जाती है।
और बीमार आत्मा वाला समाज
कभी स्थायी नहीं रहता।
जिस दिन हमने अपनी जड़ों को
बोझ समझ लिया, उसी दिन
हमारा भविष्य अस्थिर हो गया।

“चिठ्ठी आई है…”
कोई कहानी नहीं थी।
यह समाज के नाम
एक अनपढ़ी चिठ्ठी थी—
जो हर घर के पते पर
पहुँचती है।
अब प्रश्न यह नहीं कि—
हम समृद्ध हैं या नहीं।

प्रश्न यह है— क्या हम अब भी
जुड़े हुए हैं?

 

रामानंद काबरा
9414070142

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor