पुस्तक समीक्षा : नीलम व्यास ‘स्वयंसिद्धा’
हाल ही में जोधपुर के ‘डॉ. मदन सावित्री डागा साहित्य भवन’ में अनुज सूरज सोनी के उपन्यास ‘साए की शर्त’ के विमोचन का साक्षी बनने का अवसर मिला। उपन्यास हाथ में आया तो जिज्ञासावश पढ़ना प्रारंभ किया और स्वीकार करना होगा कि इसकी पठनीयता और प्रवाह ऐसा है कि इसे पूर्ण किए बिना चैन नहीं मिला।
किंतु, एक पाठक और समीक्षक के नाते इस कृति ने मन में जितनी प्रशंसा जगाई, उतनी ही शिकायतें भी छोड़ दीं। उपन्यास पढ़ते हुए मन भावुक तो हुआ, पर लेखक द्वारा बुने गए घटनाचक्रम ने कहीं न कहीं मन को एक गहरी पीड़ा और असंतोष से भर दिया। मेरी पहली शिकायत इसके अंत को लेकर है। यद्यपि साहित्य में ‘रेडमार्क’ या दुखद अंत का अपना महत्व है, पर क्या भास्कर की नियति इतनी क्रूर होनी अनिवार्य थी? क्या सृजन के पास सुखद अंत का कोई विकल्प शेष नहीं था? ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक ने जानबूझकर पाठकों को झकझोरने के लिए एक ‘पीड़ादायक अंत’ को उन पर थोप दिया है।
भास्कर के व्यक्तित्व का मनोवैज्ञानिक चित्रण निःसंदेह सटीक है। एक टिन की छत तले अभावों और ऋतुओं की मार सहते हुए उसका सतत कर्मशील रहना उसे एक एकांत योगी सिद्ध करता है। यहाँ लेखक की लेखनी सराहनीय है, जो गरीबी और भूख के बीच भी साहित्य साधना की अटूट निष्ठा को जीवंत कर देती है।
आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो ‘साए की शर्त’ में जीवन के सतरंगी सपनों को जिस कुशलता से बुना गया है, वहीं कुछ पात्रों की भूमिका मन में खटास पैदा करती है। वरिष्ठ लेखक अमित जी द्वारा भास्कर का शोषण और मुंबई जैसे महानगर में व्याप्त ‘बड़ी मछली’ वाली स्वार्थी मानसिकता कलाकार के संघर्ष को भयावह रूप में प्रस्तुत करती है। यद्यपि विक्रम, सुरेश और सौरभ जैसे पात्र यथार्थवादी हैं, किंतु उनकी अवसरवादी सोच आज के शहरी समाज की उस नग्न सच्चाई को उजागर करती है जो विचलित कर देने वाली है।
भास्कर की बिगड़ती मानसिक स्थिति और किरण के प्रेम के बीच का संतुलन सराहनीय है, किंतु ‘समयचक्र’ से आए साये के चित्रण में लेखक ने जो विरोधाभास रखा है, वह चौंकाता है। साये के रूप में उस औरत की पीड़ा को दिखाते-दिखाते अचानक उसे एक घिनौने रूप में बदल देना रोचक तो है, पर थोड़ा खटकता भी है। क्या वह साया वास्तव में इतना वीभत्स था या भास्कर का अपना मतिभ्रम?
उपन्यास का घटनाचक्र तीव्र गति से घूमता है। यह गतिशीलता रोचकता बढ़ाती है, संवाद प्रभावी हैं, पर अंत में पहुँचकर मन से एक ही टीस उठती है “काश! ऐसा न हुआ होता।”
एक ईमानदार प्रश्न यह भी है कि क्या वास्तव में आज का पाठक केवल त्रासदी में ही मनोरंजन खोजता है? क्या हम इतने संवेदनशून्य हो गए हैं कि हमें पात्रों का दुःख ही अपने दुखों का प्रतिबिंब लगता है? भास्कर और साये के संघर्ष में कौन सही था और कौन गलत, यह एक ऐसा धुंधला क्षेत्र है जहाँ लेखक ने पाठकों को अधर में छोड़ दिया है। जो आज कल बहुत सी अच्छी रचनाओं में देखने को मिलता है।
अंततः, अनुज सूरज सोनी को इस गंभीर प्रयास के लिए बधाई। उनकी कलम अपनी उम्र से अधिक परिपक्वता और कलयुगी परिवेश की थोथी मानसिकता को उजागर करने का साहस रखती है। शब्दों का विन्यास और मुंबई की जीवनशैली का चित्रण आकर्षक है, पर अगली बार लेखक से यह अपेक्षा रहेगी कि वह कला की क्रूरता के बीच थोड़ी मानवीय संवेदना और उम्मीद की किरण भी शेष रखे।








