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Saturday, October 17, 2026, 6:11 pm

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Lifestyle

कविता : नीलम व्यास ‘स्वयंसिद्धा’- स्त्री जीवन

नीलम व्यास ‘स्वयंसिद्धा’

स्त्री जीवन

मिला जीवन एक ही
हुई उम्र पचास पार
की पूर्ण जिम्मेदारी
गई भूल खुद को
तू स्त्री!
अब जी खुद के लिए
कर पूरे सपनें
कर खुद से खुद
तू प्रेम स्त्री!

 

जिया हर रिश्ता
मन से तूने स्त्री
दूसरों के मन की करती
दूसरों को लुभाती
दूसरों की इच्छाओं खातिर जीती…. भुला कर खुद को
बिता देती जीवन
अक्सर… कुछ स्त्रियां.

 

कुछ स्त्रियों को मिलता
भरा पूरा परिवार
भरा पूरा जीवन
मग़र… बहुत सी
झेलती पीर
स्त्री जीवन की
आजीवन…
करती सेवा
तन मन से….
मग़र मिलता… बदले में
अपमान… घुटन..
जीती जीवन उपेक्षित
बरसों तक…।

घिर जाती
अवसाद से
जीती तनाव में
अनेक स्त्रियां
तू जाग स्त्री!
जी अब खुद के लिए
छोड़ करना कोशिश
दूसरों को खुश करने की
सीख.. जीवन जीने की कला… कर मन चाहा
कर खुद से प्यार
जी अपने लिए भी खुलकर
हो चेतन हक के लिए
ताकि जिए अवसाद मुक्त
ओ स्त्री!

करो आत्म मंथन
प्राणायाम.. योग से
संतुलित करो साँसों की राग…. पाओ खुशी
करके मनचाहा
करो पूरे शौक
बनो आत्म निर्भर
अच्छा खाओ.. पहनो
घूमो.. फिरो
कोई कहने वाला नहीं
तुमको कि…
जियो खुद के लिए
सुनो अपने पुकार
अंतर्मन की
दर्द की परतों को
उधेड़.. बुनो
नए जीवन के अरमान
ना रहो हरदम परेशान
जीवन है सौगात
सुधर जाएंगे
मन के हालात
तू जी ले जीभर स्त्री!
ले साँस सुकून की
निराश कर दो
निराशा को.. खुशी से अपनी….
तोड़ कारा उदासी की
तू जी ले.. हर पल को
उमंग से… नव सृजन के
उल्लास से… ओ स्त्री!

सब के साथ साथ
सोचो.. खुद के लिए भी
खुद से भी करो प्रेम
रखो जीवन को संतुलित
तब ही होगा
मन भी संतुलित
खूब पढो किताबें
करो बाग़वानी
भरो रंग… तस्वीरों में
नाचो गाओ… जी भर
पिघल जायेगा
हिम उदासी का तब
खूब लिखो.. पढो
दो शब्दों का उपहार
भावों को अपने
तब ही हो पूर्ण सपनें
ओ स्त्री!

कहती है काली घटाएं
आओ.. घुल मिलने दो
आँसुओं को.. इनमें
धुली धुली.. जिंदगी
नव सृजन की बारिश में
लगती… फुहारों जैसी
सुरमई साँझ सा
घनीभूत… व्योम
पिघल जायेगा धीमे धीमे
ढलते दिनकर की
लालिमा से..
उगते भानु की दीप्ती
कर देगी जगमग
तन मन को
जीवन को
प्रकृति भी लुटा रही
खुलकर…
तुषार बूंदों को
बनाकर हार
हीरक कनियों का
सुरम्य वादी पुकारती
तू.. बन पूर्ण नारी
ना रह दुःखी, टूटी, निराश
होगी जब सशक्त
तेजस्वी.. आत्मनिर्भर नारी. तब ही होगा
फलीभूत जीवन
सच्चे अर्थो में
ओ आज के युग की
स्त्री.. तू जाग अब!

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor