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Friday, May 1, 2026, 5:25 am

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जलम् अमृतम्: आयुर्वेद में जल का औषधीय महत्व

लेखक शिव सिंह भाटी
9784092381

​ऋग्वेद में कहा गया है— “अप्सु अन्तरमृतं अप्सु भेषजम्” ( जल के भीतर अमृत है और जल ही समस्त रोगों की दवा है)। हमारे शरीर का लगभग 70 % हिस्सा जल है, इसलिए इसका संतुलन ही हमारे स्वास्थ्य का निर्धारण करता है।

​1. आयुर्वेद के अनुसार जल पीने का सही तरीका

​आज की आधुनिक जीवनशैली में हम पानी तो पीते हैं, लेकिन गलत तरीके से। आयुर्वेद हमें जल के सही उपयोग के नियम सिखाता है:

* ​बैठकर पानी पीना: हमेशा बैठकर और घूँट-घूँट (Sips) भरकर पानी पिएं। खड़े होकर पानी पीने से यह सीधे जोड़ों और गुर्दों (Kidneys) पर दबाव डालता है, जिससे भविष्य में गठिया (Arthritis) की समस्या हो सकती है।

* भोजन और जल का संबंध

भोजन से पहले: पानी पीने से पाचन अग्नि मंद हो जाती है (दुबले होने के लिए)।

​भोजन के बीच में: एक-दो घूँट पानी अमृत समान है।

​भोजन के अंत में: भोजन के तुरंत बाद पानी पीना ‘विष’ के समान माना गया है, क्योंकि यह जठराग्नि को बुझा देता है।

​2. ऋतु और जल (Seasonal Water Therapy)

​आयुर्वेद कहता है कि हर मौसम में एक ही तरह का पानी नहीं पीना चाहिए:

* गर्मी में मिट्टी के घड़े का पानी जो प्राकृतिक रूप से ठंडा और क्षारीय (Alkaline) होता है।

* सर्दी / वर्षा में हल्का गुनगुना पानी पीना चाहिए जो कफ और वात को नियंत्रित करता है।

* सामान्य तांबे के बर्तन में रखा पानी बैक्टीरिया मुक्त और पाचन में सहायक होता है।

3. ‘ऊषःपान’ (Ushapan): सुबह का अमृत

​सुबह सूर्योदय से पहले खाली पेट तांबे के बर्तन में रखा पानी पीना ‘ऊषःपान’ कहलाता है। यह शरीर के दोषों को संतुलित करता है, पेट साफ करता है और त्वचा में चमक लाता है।

​4. गर्म जल (Ushnodaka) के चमत्कारी लाभ

​आयुर्वेद में उबले हुए पानी को ‘उष्णोदक’ कहा गया है। यह सादे पानी से भी अधिक प्रभावी होता है:

​यह शरीर के सूक्ष्म स्रोतों (Channels) को खोलता है।
​यह जमे हुए टॉक्सिन्स (आम) को पिघलाकर बाहर निकालता है।

​मोटापा कम करने और जोड़ों के दर्द में यह रामबाण है।

​5. जल कब अमृत है और कब विष?

​अमृत: जब प्यास लगने पर पिया जाए, जब शरीर थका हुआ हो, या जब शरीर में पित्त (गर्मी) बढ़ गया हो।
​विष: भूख लगने पर पानी पीना (अग्नि बुझ जाती है), अजीर्ण (Indigestion) में अत्यधिक पानी पीना, या फ्रिज का अत्यधिक ठंडा पानी पीना।

​जल को ‘अमृत’ बनाने के लिए किसी महंगे फिल्टर की नहीं, बल्कि सही जागरूकता की आवश्यकता है। जब हम जल को सम्मान के साथ और सही विधि से ग्रहण करते हैं, तो वह हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका को पुनर्जीवित कर देता है।
​”जीर्णे वारि बलप्रदं, भोजने चामृतं वारि।”

अर्थ: भोजन पचने के बाद पानी बल देता है और भोजन के बीच में लिया गया पानी अमृत है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor