विश्व मायड़ भासा दिवस : मांग नहीं हमें परिणाम चाहिए…: राजस्थान की 10 करोड़ जनता
वर्ष 2024 में दैनिक भास्कर के स्थापना दिवस पर “राजस्थान का बहुमत पत्र” शीर्षक से एक ऐतिहासिक पहल की गई थी। इस पत्र में राजस्थान के 112 विधायकों ने हस्ताक्षर कर राज्य की जनभावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया था कि राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। इस बहुमत पत्र पर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी, उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा, तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, तथा जोधपुर के पूर्व नरेश गजसिंह सहित अनेक वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों के हस्ताक्षर शामिल थे।
सवाल : विधानसभा सदस्यों के हस्ताक्षर मायने नहीं रखते…क्या अमृता देवी और 363 बलिदान की तरह प्रधानमंत्री और संसद राजस्थान से फिर किसी बलिदान का इंतजार कर रही है…पीएम साहब या तो 21 फरवरी को राजस्थानी भासा को संवैधानिक मान्यता की घोषणा करो या पद से इस्तीफा दे दो…।
दिलीप कुमार पुरोहित. जयपुर
माननीय प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी जी,
सादर नमस्कार।
मैं, राइजिंग भास्कर समूह की ओर से, राजस्थान की 10 करोड़ जनता की भावनाओं और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए यह पत्र लिख रहा हूँ। यह पत्र केवल एक मीडिया समूह का निवेदन नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक न्याय की मांग है जिसका इंतजार राजस्थानी भाषा बोलने-समझने वाली पूरी पीढ़ियाँ दशकों से कर रही हैं।
21 फरवरी को विश्व मायड़ भासा दिवस आने वाला है। यह दिन दुनिया भर की मातृभाषाओं के सम्मान और संरक्षण का प्रतीक है। लेकिन विडंबना यह है कि भारत जैसे भाषाई विविधता वाले महान देश में करोड़ों लोगों की भाषा—राजस्थानी—आज भी संवैधानिक मान्यता के लिए संघर्ष कर रही है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि जनभावनाओं की अनदेखी का भी प्रतीक बन चुकी है।
दैनिक भास्कर की आवाज लोकतंत्र में मसल कर रख दी :
प्रधानमंत्री जी, वर्ष 2024 में दैनिक भास्कर के स्थापना दिवस पर “राजस्थान का बहुमत पत्र” शीर्षक से एक ऐतिहासिक पहल की गई थी। इस पत्र में राजस्थान के 112 विधायकों ने हस्ताक्षर कर राज्य की जनभावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया था कि राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। इस बहुमत पत्र पर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी, उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा, तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, तथा जोधपुर के पूर्व नरेश गजसिंह सहित अनेक वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों के हस्ताक्षर शामिल थे।
इतने व्यापक राजनीतिक समर्थन के बाद भी यदि आज तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर लोकतांत्रिक सहमति का मूल्य क्या रह गया है। क्या 112 विधायकों की सामूहिक इच्छा भी केंद्र सरकार के लिए पर्याप्त नहीं है? क्या राजस्थान की जनता की भाषा को मान्यता दिलाने के लिए पूरे राज्य की दस करोड़ जनता के अलग-अलग हस्ताक्षर आवश्यक हैं?
प्रधानमंत्री जी भाषा संवाद ही नहीं- संस्कृति, इतिहास, परंपरा और अस्मिता की जीवंत धरोहर होती है
प्रधानमंत्री जी, यह भी एक कठोर सत्य है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह संस्कृति, इतिहास, परंपरा और अस्मिता की जीवंत धरोहर होती है। राजस्थानी भाषा में लोकगीत, वीरगाथाएँ, संत साहित्य, लोकनाट्य और लोककथाओं का ऐसा विशाल भंडार है, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करता है। यदि इतनी समृद्ध भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलती, तो यह केवल एक भाषाई निर्णय नहीं बल्कि सांस्कृतिक उपेक्षा का भी संकेत माना जाएगा।
राजस्थान का इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि यहाँ की जनता अपनी परंपराओं और पहचान की रक्षा के लिए असाधारण त्याग करने से पीछे नहीं हटती। जब खेजड़ी वृक्षों को बचाने की बात आई थी, तब अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने अपने प्राणों की आहुति देकर दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का अद्वितीय संदेश दिया था। आज राजस्थानी भाषा की अस्मिता भी उसी प्रकार सम्मान की अपेक्षा कर रही है।
केंद्र सरकार सकारात्मक निर्णय लें, अन्यथा जनता बलिदान को तैयार
हम यह नहीं मानते कि लोकतांत्रिक भारत में किसी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए जनता को फिर से किसी बलिदान की आवश्यकता होनी चाहिए। संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था का उद्देश्य ही यह है कि जनता की वैध मांगों को समय पर सम्मानपूर्वक स्वीकार किया जाए। इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जब विधानसभा के बहुमत विधायक, राज्य के दोनों प्रमुख दलों के शीर्ष नेता, तथा समाज के विभिन्न वर्ग एकमत होकर किसी मांग का समर्थन कर रहे हों, तो केंद्र सरकार उस पर सकारात्मक और शीघ्र निर्णय ले।
भजनलाल जी यूं तो खूब भजन करते हैं, यहां मौन क्यों हैं?
माननीय प्रधानमंत्री जी, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि लोकतंत्र में जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों पर भरोसा करती है। राजस्थान की जनता ने आपको और आपकी पार्टी को भारी समर्थन दिया है। उसी प्रकार वर्तमान राज्य सरकार का नेतृत्व कर रहे मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को भी जनता ने बड़े विश्वास के साथ जिम्मेदारी सौंपी है। ऐसे में यदि जनता की सबसे बड़ी सांस्कृतिक मांग वर्षों तक अधूरी रहती है, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में यह प्रश्न उठने लगता है कि क्या उनकी आवाज़ सचमुच सत्ता तक पहुँच पा रही है।
यह पत्र किसी राजनीतिक टकराव या आलोचना के उद्देश्य से नहीं लिखा जा रहा, बल्कि उस लोकतांत्रिक विश्वास को सुदृढ़ करने के लिए लिखा जा रहा है, जो जनता और शासन के बीच पुल का काम करता है। जब जनता की भावनाएँ लंबे समय तक अनसुनी रहती हैं, तब असंतोष बढ़ता है और लोकतंत्र कमजोर होता है। इसके विपरीत, जब सरकार जनता की भावनाओं को सम्मान देती है, तो वही निर्णय इतिहास में जनहितकारी और दूरदर्शी माना जाता है।
केंद्र सरकार राजस्थानी भाषा को सम्मान के साथ मान्यता दे…
आज देश में अनेक क्षेत्रीय भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान प्राप्त है। यह भारतीय संघ की भाषाई विविधता और लोकतांत्रिक उदारता का प्रमाण है। राजस्थानी भाषा को भी उसी सम्मान के साथ मान्यता देना न केवल न्यायोचित होगा, बल्कि यह संदेश भी देगा कि भारत सरकार अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
प्रधानमंत्री जी, यह भी स्मरणीय है कि भाषा की मान्यता केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं होती; इसके साथ शिक्षा, शोध, साहित्य, प्रशासनिक उपयोग, सांस्कृतिक संरक्षण और रोजगार के अनेक अवसर जुड़े होते हैं। राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने से विश्वविद्यालयों में शोध को बढ़ावा मिलेगा, साहित्यकारों और कलाकारों को नई पहचान मिलेगी, और नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा पर गर्व के साथ आगे बढ़ सकेगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रश्नचिह्न?
आज जब विश्व स्तर पर भाषाओं के संरक्षण की बात हो रही है, तब भारत जैसे विशाल देश के लिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह अपनी क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाए। यदि करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा को अभी भी संवैधानिक मान्यता नहीं मिलती, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह एक प्रश्नचिह्न के रूप में देखा जा सकता है।
इसी संदर्भ में, राइजिंग भास्कर समूह और राजस्थान की जनता की ओर से आपसे यह दृढ़ निवेदन है कि आगामी 21 फरवरी—विश्व मायड़ भासा दिवस—के अवसर पर राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की ऐतिहासिक घोषणा की जाए। यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं होगा, बल्कि करोड़ों लोगों के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक गौरव का उत्सव बन जाएगा।
प्रधानमंत्री जी, इतिहास में वही नेता महान कहलाते हैं, जो समय की मांग को पहचान कर साहसिक और दूरदर्शी निर्णय लेते हैं। आज राजस्थानी भाषा की मान्यता भी उसी प्रकार का ऐतिहासिक अवसर प्रस्तुत कर रही है। यदि इस अवसर पर केंद्र सरकार सकारात्मक निर्णय लेती है, तो आने वाली पीढ़ियाँ इसे सांस्कृतिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम के रूप में याद रखेंगी।
अंत में, मैं एक बार फिर पूरे सम्मान और दृढ़ता के साथ यह कहना चाहता हूँ कि राजस्थान की जनता अब इस विषय पर और अधिक प्रतीक्षा की स्थिति में नहीं रहना चाहती। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की वैध मांगों का समाधान समय पर होना ही शासन की विश्वसनीयता का आधार होता है। इसलिए हम आपसे आग्रह करते हैं कि 21 फरवरी को राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने की घोषणा कर देश को यह संदेश दें कि भारत अपनी भाषाई विरासत के सम्मान में कभी पीछे नहीं हटेगा।
राजस्थान की करोड़ों जनता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए आपके सकारात्मक और ऐतिहासिक निर्णय की प्रतीक्षा में। हम कड़े शब्दों में निवेदन कर रहे हैं कि 21 फरवरी को राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता की घोषणा करें या सिंहासन छोड़ दें…आश्वासन के बोझ तले राजस्थान की जनता दब चुकी है, अब हम मांग नहीं करते, हमें परिणाम चाहिए…या तो गद्दी छोड़ो या मान्यता दो…रास्ता आपके सामने हैं।
सादर,
दिलीप कुमार पुरोहित
ग्रुप एडिटर
राइजिंग भास्कर समूह









