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Thursday, April 30, 2026, 9:29 pm

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“किस अधिकार से कोई ‘चरित्र’ तय करेगा?—सेल्फ अटेस्टेड की तरह अब सेल्फ कैरेक्टर सर्टिफिकेट की हो व्यवस्था; पुलिस और तंत्र की दादागिरी खत्म करो

राइजिंग भास्कर का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीखा पत्र—पुलिस और संस्थाओं द्वारा ‘चरित्र प्रमाण-पत्र’ को बताया अपमानजनक, संविधान के मूल अधिकारों के खिलाफ करार

राइजिंग भास्कर सवाल जो सीधा सिस्टम की नींव को चुनौती देता है

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली

9783414079 diliprakhai@gmail.com

देश में Self Attestation लागू कर सरकार ने जब नागरिकों को अपने दस्तावेज़ खुद प्रमाणित करने का अधिकार दिया, तब इसे विश्वास आधारित शासन की दिशा में बड़ा कदम माना गया। लेकिन अब उसी विश्वास की कसौटी पर एक और बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या एक व्यक्ति का चरित्र भी वह खुद प्रमाणित नहीं कर सकता? राइजिंग भास्कर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखे अपने तीखे पत्र में इसी मुद्दे को उठाते हुए मौजूदा व्यवस्था पर सीधे-सीधे सवाल दागे हैं।

क्या है मौजूदा व्यवस्था?

भारत में नौकरी, सरकारी सेवाओं, ठेकों और कई अन्य प्रक्रियाओं में आवेदक से Character Certificate (चरित्र प्रमाण-पत्र) मांगा जाता है। यह प्रमाण-पत्र आमतौर पर निम्न माध्यमों से जारी होता है:

  • पुलिस वेरिफिकेशन (Police Verification)
  • स्कूल/कॉलेज से Conduct Certificate
  • किसी गजटेड अधिकारी द्वारा प्रमाणन

इस प्रक्रिया में व्यक्ति को अपने “चरित्र” का प्रमाण किसी तीसरे पक्ष से लेना होता है।

“चरित्र का ठेका किसके पास?”—सीधा सवाल

पत्र में सबसे बड़ा और असहज सवाल यह उठाया गया है:

“भारत जैसे लोकतंत्र में आखिर किस कानून या संवैधानिक प्रावधान के तहत किसी पुलिस अधिकारी या संस्था को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी नागरिक के ‘चरित्र’ पर मुहर लगाए?” यह सवाल केवल प्रक्रिया पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की मानसिकता पर प्रहार करता है।

मौजूदा व्यवस्था: एक अपमानजनक परंपरा?

आज देश में:

  • नौकरी के लिए
  • सरकारी योजनाओं के लिए
  • ठेके या लाइसेंस के लिए

आवेदक से Character Certificate मांगा जाता है, जो पुलिस या किसी अधिकारी द्वारा जारी किया जाता है।

राइजिंग भास्कर का आरोप है कि:

“यह व्यवस्था नागरिक को संदिग्ध मानकर चलती है—मानो हर व्यक्ति पहले से दोषी है, जिसे ‘चरित्रवान’ साबित करना पड़े।”

आत्मसम्मान बनाम सिस्टम: टकराव साफ दिख रहा है

पत्र में यह बात बेहद आक्रामक अंदाज में कही गई है कि:

  • चरित्र एक निजी और आंतरिक गुण है
  • इसे कोई बाहरी संस्था माप ही नहीं सकती
  • फिर भी नागरिकों को लाइन में लगाकर “चरित्रवान” घोषित करवाना
    लोकतंत्र नहीं, बल्कि औपनिवेशिक सोच का प्रतीक है

संविधान का हवाला: क्या हो रहा है अधिकारों का उल्लंघन?

अनुच्छेद 21 – गरिमा के साथ जीने का अधिकार

Article 21 of the Constitution of India केवल जीवन ही नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन की गारंटी देता है।

  • बार-बार चरित्र प्रमाण-पत्र मांगना इस गरिमा को ठेस पहुंचाता है।
अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार

Article 14 of the Constitution of India के बावजूद,

  • अलग-अलग अधिकारियों की अलग सोच के आधार पर प्रमाण-पत्र जारी होना
    समानता के सिद्धांत को कमजोर करता है
अनुच्छेद 19 – स्वतंत्रता का अधिकार

Article 19 of the Constitution of India व्यक्ति को अपनी पहचान और अभिव्यक्ति का अधिकार देता है

  • लेकिन जब कोई और आपके चरित्र को “प्रमाणित” करता है, तो यह अधिकार सीमित होता है

“Self Character Certificate” – मांग या क्रांति?

राइजिंग भास्कर ने साफ मांग रखी है:

देश में तुरंत “Self Character Certificate” लागू किया जाए

प्रस्तावित मॉडल: कैसे काम करेगा यह सिस्टम?

1. स्व-घोषणा (Self Declaration)

आवेदक एक लिखित घोषणा देगा कि:

  • वह किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं है
  • उसका आचरण समाज के प्रति सकारात्मक है

2. कानूनी जिम्मेदारी

  • गलत जानकारी देने पर सख्त दंड का प्रावधान हो
  • यह शपथ पत्र (Affidavit) की तरह वैध माना जाए

3. विवाद की स्थिति

  • यदि कोई संस्था या व्यक्ति इस पर सवाल उठाए
  • तो मामला सीधे कोर्ट में जाए, न कि पुलिस सत्यापन पर निर्भर रहे

पुलिस वेरिफिकेशन पर तीखा हमला

पत्र में पुलिस सत्यापन प्रणाली पर भी कड़े शब्दों में सवाल उठाए गए हैं:

  • “क्या पुलिस किसी व्यक्ति के मन और आचरण को जान सकती है?”
  • “क्या एक फाइल देखकर किसी का चरित्र तय किया जा सकता है?”

राइजिंग भास्कर का आरोप है कि:

“पुलिस वेरिफिकेशन केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है, जो कई बार भ्रष्टाचार और देरी का माध्यम भी बनता है।”

मौजूदा प्रणाली की समस्याएं

1. भ्रष्टाचार और देरी

पुलिस वेरिफिकेशन में कई बार:

  • अनावश्यक देरी
  • रिश्वतखोरी की शिकायतें
2. व्यक्तिपरक (Subjective) मूल्यांकन

किसी अधिकारी की व्यक्तिगत राय के आधार पर:

  • चरित्र प्रमाण-पत्र दिया या रोका जा सकता है
3. सामाजिक भेदभाव
  • जाति, वर्ग या पहचान के आधार पर भेदभाव की आशंका

औपनिवेशिक मानसिकता का आरोप

इस पूरी व्यवस्था को ब्रिटिश काल की मानसिकता का अवशेष बताते हुए कहा गया है कि:

  • पहले शासक जनता पर अविश्वास करते थे
  • आज भी वही सोच जारी है
  • नागरिक को “विश्वसनीय” साबित करना पड़ता है

अंतरराष्ट्रीय तुलना: भारत क्यों पीछे?

पत्र में यह भी कहा गया है कि:

  • कई विकसित देशों में Character Certificate जैसी कोई बाध्यता नहीं है
  • वहां केवल आपराधिक रिकॉर्ड देखा जाता है
  • “चरित्र” का प्रमाण नहीं मांगा जाता

सवाल यह है कि क्या भारत अपने ही नागरिकों पर भरोसा नहीं कर सकता?

संभावित बदलाव: क्या होगा असर?

1. आत्मसम्मान की रक्षा

व्यक्ति को अपने चरित्र के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा

2. प्रक्रिया में सरलता
  • नौकरी और अन्य प्रक्रियाएं तेज होंगी
  • कागजी कार्यवाही कम होगी
3. भ्रष्टाचार में कमी
  • पुलिस वेरिफिकेशन की जरूरत कम होगी
सकारात्मक पक्ष
  • प्रक्रियाएं तेज होंगी
  • भ्रष्टाचार में कमी आएगी
  • नागरिक का आत्मसम्मान बढ़ेगा
लेकिन जोखिम भी
  • झूठी घोषणाओं का खतरा
  • कानूनी विवादों में बढ़ोतरी

राइजिंग भास्कर का जवाब:

“झूठी घोषणा पर सख्त सजा हो—लेकिन हर नागरिक को शक की नजर से देखना बंद किया जाए।”

सरकार के सामने सीधे सवाल

पत्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सीधे सवाल किए गए हैं:

  1. क्या सरकार नागरिकों पर भरोसा करती है या नहीं?
  2. क्या चरित्र प्रमाण-पत्र की व्यवस्था संविधान के अनुरूप है?
  3. अगर Self Attestation लागू हो सकता है, तो Self Character Certificate क्यों नहीं?

मोदी जी इसे देश की युवा पीढ़ी पर भरोसा करें: बदल दे इतिहास 

“Self Character Certificate” की मांग केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सोच में बदलाव की मांग है। यह मुद्दा सरकार को यह तय करने पर मजबूर करता है कि:

  • क्या नागरिक को सम्मान और विश्वास दिया जाएगा
  • या उसे हमेशा “संदेह के घेरे” में ही रखा जाएगा

अब नजरें इस पर टिकी हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस तीखे और सीधे सवाल का क्या जवाब देते हैं।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor