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एम्स जोधपुर में अत्यंत गोपनीय प्रोजेक्ट पर हो रही रिसर्च : सूअर का रक्त, हृदय और किडनी इंसानों की बचाएगी जिंदगी!

  • एम्स के सूत्रों ने बताया कि हर वर्ष लाखों मरीजों को समय पर रक्त नहीं मिल पाता। दुर्घटनाओं, बड़े ऑपरेशनों, प्रसव संबंधी जटिलताओं और युद्ध जैसी परिस्थितियों में रक्त की कमी कई बार मृत्यु का कारण बन जाती है।
  • इसी प्रकार हार्ट और किडनी प्रत्यारोपण के लिए लाखों मरीज प्रतीक्षा सूची में रहते हैं। अनेक मरीजों की मृत्यु केवल इसलिए हो जाती है क्योंकि समय पर उपयुक्त डोनर नहीं मिल पाता। यहीं से जन्म लेती है “मिशन पिग” अवधारणा।

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com 

कल्पना कीजिए कि वर्ष 2045 का भारत है। देश के अस्पतालों में रक्त की कमी लगभग समाप्त हो चुकी है। सड़क दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल लोगों को कुछ ही मिनटों में रक्त उपलब्ध हो जाता है। युद्ध क्षेत्र में घायल सैनिकों की जान बचाने के लिए रक्त और अंगों की कमी अब बाधा नहीं रही। हार्ट और किडनी ट्रांसप्लांट के लिए वर्षों तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता समाप्त हो चुकी है।

क्या यह संभव है? यही प्रश्न आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। लेकिन एम्स जोधपुर के विशेषज्ञों की टीम —“मिशन पिग” पर काम कर रही है, जिसका उद्देश्य सूअर के रक्त और अंगों को मानव उपयोग के लिए सुरक्षित बनाना है।

रक्त संकट: दुनिया की बड़ी चुनौती

विश्व स्वास्थ्य एक्सपर्ट बताते हैं कि हर वर्ष लाखों मरीजों को समय पर रक्त नहीं मिल पाता। दुर्घटनाओं, बड़े ऑपरेशनों, प्रसव संबंधी जटिलताओं और युद्ध जैसी परिस्थितियों में रक्त की कमी कई बार मृत्यु का कारण बन जाती है। इसी प्रकार हार्ट और किडनी प्रत्यारोपण के लिए लाखों मरीज प्रतीक्षा सूची में रहते हैं। अनेक मरीजों की मृत्यु केवल इसलिए हो जाती है क्योंकि समय पर उपयुक्त डोनर नहीं मिल पाता। यहीं से जन्म लेती है “मिशन पिग” जैसी अवधारणा।

मिशन पिग का मूल उद्देश्य

  • रक्त की कमी को समाप्त करना
  • आपातकालीन चिकित्सा में जीवन बचाना
  • अंग प्रत्यारोपण की उपलब्धता बढ़ाना
  • सैनिकों और आपदा पीड़ितों को तत्काल चिकित्सा सहायता देना
  • चिकित्सा विज्ञान में नई क्रांति लाना

पहला चरण: रक्त संगतता की खोज

मिशन का पहला लक्ष्य यह समझना है कि सूअर और इंसान के रक्त में कौन-कौन से ऐसे तत्व हैं जो प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। मानव शरीर किसी भी विदेशी पदार्थ को पहचानकर उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया करता है। यदि सूअर का रक्त सीधे इंसान को चढ़ा दिया जाए तो शरीर उसे शत्रु मान सकता है।इसलिए एक्सपर्ट सबसे पहले उन जैविक संकेतकों की पहचान करने का प्रयास कर रहे हैं जो अस्वीकृति (Rejection) का कारण बनते हैं।

दूसरा चरण: खतरनाक तत्वों को हटाना

प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए एक्सपर्ट जीन एडिटिंग तकनीक का प्रयोग करते हुए ऐसे तत्वों को हटाने का प्रयास कर रहे हैं जो मानव शरीर में एलर्जी या अंगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। CRISPR जैसी उन्नत तकनीक का उपयोग कर सूअरों की विशेष नस्लें विकसित की जा सकती हैं जो मानव उपयोग के लिए अधिक अनुकूल हों।

तीसरा चरण: सुरक्षित स्टोरेज तकनीक

रक्त को सुरक्षित रखना किसी भी चिकित्सा प्रणाली की सबसे बड़ी आवश्यकता है। मिशन पिग के अंतर्गत ऐसी तकनीक विकसित करने की कल्पना की गई है जिससे रक्त को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके। इससे आपदा, युद्ध और दूरस्थ क्षेत्रों में भी रक्त उपलब्ध कराया जा सकेगा।

भविष्य में संभावित लाभ

  • रक्त की कमी समाप्त
  • हार्ट ट्रांसप्लांट आसान
  • किडनी प्रत्यारोपण में तेजी
  • दुर्घटना पीड़ितों को त्वरित सहायता
  • सैनिकों की जान बचाने में मदद
  • वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा मजबूत

चौथा चरण: वैज्ञानिक पेटेंट और मानकीकरण

यदि ऐसी तकनीक सफल होती है तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट कराया जा सकता है। इसके साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठनों द्वारा सुरक्षा मानकों का निर्माण किया जाएगा।

पांचवां चरण: सीमित मानव परीक्षण

एम्स जोधपुर की टीम प्रयास करेगी कि नई चिकित्सा तकनीक की तरह इसका परीक्षण भी अत्यंत सीमित और नियंत्रित वातावरण में किया जाए। केवल गंभीर परिस्थितियों में और स्वैच्छिक अनुमति के आधार पर ही मानव परीक्षण संभव होंगा। इन परीक्षणों का मुख्य उद्देश्य यह जानना होगा कि मानव शरीर ऐसी तकनीक को स्वीकार करता है या नहीं।

दीर्घकालिक निगरानी

प्रोजेक्ट के बारे में सूत्रों का कहना है कि जिन व्यक्तियों पर यह प्रयोग किया जाएगा, उनका वर्षों तक अध्ययन किया जाएगा। वैज्ञानिक निम्न बिंदुओं पर विशेष ध्यान देंगे—

  • प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया
  • अंगों की कार्यक्षमता
  • संक्रमण का खतरा
  • जीवन की गुणवत्ता
  • दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभाव

छठा चरण: सुरक्षा को और मजबूत बनाना

मानव परीक्षणों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर तकनीक को लगातार बेहतर बनाया जाएगा।

इसका लक्ष्य होगा—

  • जोखिम कम करना
  • सफलता प्रतिशत बढ़ाना
  • लागत कम करना
  • अधिक मरीजों तक पहुंच बनाना

मुख्य चुनौतियां

  • प्रतिरक्षा अस्वीकृति
  • संक्रमण का जोखिम
  • नैतिक प्रश्न
  • धार्मिक एवं सामाजिक चिंताएं
  • दीर्घकालिक प्रभावों की अनिश्चितता
  • नियामकीय स्वीकृतियां

सातवां चरण: हृदय और किडनी प्रत्यारोपण

दुनिया में पहले से ही जीन-संशोधित सूअरों के अंगों पर शोध चल रहा है।मिशन पिग के तहत भविष्य में विशेष रूप से विकसित सूअरों के हृदय और किडनी मानव प्रत्यारोपण के लिए उपयोग किए जा सकते हैं। इससे लाखों मरीजों को नया जीवन मिल सकता है।

आठवां चरण: सफलता प्रतिशत का अध्ययन

कोई भी चिकित्सा तकनीक तभी सफल मानी जाती है जब उसकी सफलता दर उच्च हो। इसलिए प्रत्येक प्रत्यारोपण का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा।

नौवां चरण: वैश्विक वैज्ञानिक मानक

भविष्य में यदि तकनीक सुरक्षित सिद्ध होती है तो अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा संस्थाएं इसके लिए वैश्विक मानक तैयार करेंगी। इन मानकों में शामिल होंगे—

  • अंग चयन प्रक्रिया
  • जैव सुरक्षा प्रोटोकॉल
  • संक्रमण नियंत्रण
  • मरीज चयन मानदंड
  • दीर्घकालिक निगरानी

दसवां चरण: जैव चिकित्सा उद्योग का विस्तार

यदि यह तकनीक सफल होती है तो विशेष जैव-सुरक्षित पशुपालन केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं। यह एक नया चिकित्सा उद्योग बन सकता है जो लाखों लोगों को रोजगार भी प्रदान करेगा।

क्या मानवता का भविष्य बदल सकता है?

  • लाखों जीवन बच सकते हैं
  • अंगों की कमी समाप्त हो सकती है
  • युद्ध और आपदा चिकित्सा मजबूत हो सकती है
  • चिकित्सा लागत कम हो सकती है
  • वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली में क्रांति आ सकती है

नैतिक और सामाजिक प्रश्न

एम्स जोधपुर के एक्सपर्ट नैतिक और सामाजिक प्रश्नों पर भी मंथन कर रहे हैं।समाज को भी कई प्रश्नों पर विचार करना होगा—

  • क्या पशु अंगों का उपयोग स्वीकार्य होगा?
  • धार्मिक दृष्टिकोण क्या होंगे?
  • मरीजों की सहमति कैसे सुनिश्चित होगी?
  • पशु कल्याण की रक्षा कैसे होगी?

2045 तक मिशन पिग को सफल बनाने का टार्गेट

एम्स के विशेषज्ञ इस अत्यंग गोपनीय “मिशन पिग” को 2045 तक पूरा करने का टार्गेट लेकर चल रहे हैं। इससे भविष्य की चिकित्सा आगे बढ़ सकती है। यदि विज्ञान प्रतिरक्षा अस्वीकृति, संक्रमण और सुरक्षा जैसी चुनौतियों को सफलतापूर्वक हल कर लेता है, तो संभव है कि आने वाले दशकों में रक्त और अंगों की कमी इतिहास बन जाए।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor