कवि: डॉक्टर राजगोपाल करवा, सोलापूर
शाम का सच….
शाम होने को है
लाल सूरज समंदर पर खोने को है
यह सब को तो मालूम है
जिंदगी में अब भी खुशियों से भरने को है
जिंदगी भर सिर्फ काम ही किया
बच्चों को बड़ा बनाने के लिए –
हर एक पल, हर एक सांस
उनके नाम किया
इस सफर में
कही हम खुदको भूल गए
उनके सपने सजाते सजाते
हमने अपने सपनों को बहा दिया
बच्चे बड़े हो गए
उन्होंने अच्छी शिक्षा, अच्छा मुक्काम पाया
फिर एक दिन पंख फैला कर
उन्होंने अपना घोंसला बना लिया
ना यह उनकी गलती थी
या हमारे परवरिश में कोई कमी थी
बस वक्त बदल गया था
नई पीढ़ी को
स्टेटस और आजादी की पडी थी
शुरुआत में तो हमें
उनकी उपलब्धि पर
हमारा सीना चौड़ा होता था
उनकी तरक्की की
कहानी सुनाते सुनाते
मन खिल उठता था
जब हमारी शाम होने लगी
हमारी तबीयत साथ छोड़ने लगी
तब सहारे के लिए –
नजरें अपनोंको ढूंढने लगी
क्योंकि बच्चों को
ना हमारे लिए वक्त था
ना कोई खास फिक्र
और हम अपनी दुनिया में
चुपचाप सिमटने लगे
उनके दूर जाने का
ना हमे गम था ना कोई शिकायत
बस कभी-कभी पीछे मुडके देख लेते
यही हमारे लिए काफी था
पर शायद यही जिंदगी का एक पड़ाव है,
जहाँ हमें फिर से
खुद को ढूंढना होता है।
ये हकीकत है-
जिस घर में रोटी की तंगी है वहां
बच्चे मा-बाप का बहुत ख्याल रखते हैं
उनके लिए मां-बाप
आज भी भगवान जैसे होते हैं
और जिस घर में सब कुछ है
वहां मां-बाप के लिए वक्त नहीं है
“अजीब विडंबना है—
जहाँ अभाव है, वहाँ आज भी सम्मान है,
और जहाँ सब कुछ है…
वहाँ अपनों के लिए ही इंसान अनजान है।”
मुझे लगता है…
जो होने वाला था वह हो गया
उसमें उलझे रहने की जरूरत नहीं
अब-
क्यों डरे जिंदगी में क्या होगा?
बस थोड़ा सा खुद पर भरोसा करना है
खुद को संभालना है
स्वयं पर प्रेम करना सीखना है
सब कुछ अच्छा होने वाला है
अपनी जिंदगी शान से जीना है
क्योंकि—
देर है, अंधेर नहीं,
और अब सीख लिया है हमने—
झिरो एक्सपेक्टेशन—
यही आज की सबसे बड़ी खुशीयाली है,
खुद की रूह से मिलना ही…
सबसे सच्ची आजादी है।”
जो अपने थे, वो अपने ही रहना – ये जरूरी तो नहीं,
हर रिश्ता उम्र भर साथ निभाए – ये भी सही नहीं।
अब खुद से ही दोस्ती करना सीख लिया है हमने,
क्योंकि आखिर तक —
बस “मैं” ही खुद के साथ रहता है, कोई और नहीं
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“जिंदा दिल….”
हमने तो ठान ली जिंदा दिल रहने की
छोटी मोटी रुकावटें तो आती रहेंगी।
रुकावटें अपनी जगह रहेगी
हमारा जिंदा दिल अपनी जगह।
क्यों हम फिक्र करें अनहोनी की
जो होना है, सो हो कर ही रहेगा।
बस थोड़ी-सी हिम्मत से काम ले
तो बहुत कुछ अपने आप संभल जाएगा।
जब तक हम जिंदा है,
तब तक परेशानियां साथ में रहेगी
सिर्फ उसी की सोच में रहेंगे
तो जीना ही भूल जाएंगे ।
हम जिस तरह से जिंदगी जी रहे हैं
वह देखकर तो ईश्वर भी परेशान हो जाएगा
क्योंकि….
उसने हमें अनमोल जिंदगी..
जीने के लिए यहां भेजा है
ना कि सिर्फ परेशान रहने के लिए!
खुशियां हमें ढूंढनी नहीं पड़ती
वह तो अक्सर हमारे आसपास ही होती है।
वह हमारी राह नहीं
बस हमारे नजर का इंतजार कर रही है।
जरूरत नहीं….
हम हमेशा सिर्फ अपनी खुशियां तलाशें,
कभी-दूसरों के मुस्कान में मुस्कुराना,
किसी की सफलता में खुश हो जाना,
उन की खुशियों में भी खो जाना,
यह भी दिल जिंदा होने की पहचान है।
बस एक दफा यह ठान लो की…
हर हाल में हमें खुश और जिंदा दिल रहना है
यकीन मानो….
खुशियां अपने आप चलते-चलते
आपके कदम चुमने आ जाएगी।
हर चीज ढुंढने से मिलती है
बस नजरिया सही होना चाहिए
खुशी बहुत दूर नहीं होती
वह तो हमारे भीतर ही होती है
उसे महसूस करने का
बस एक छोटा सा प्रयास ही काफी है
जिंदगी बोझ नहीं, एक प्यारा सफर है,
हर दिन में छिपा, कोई नया अवसर है।
जो मुस्कुराकर हालातों से मिलता है,
असल मे वही जिंदगी जीना जानता है।
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“तुम्हारी ख़ामोशी का शोर…”
तुम्हारा चुपचाप रहना,
शांत नज़रों से देखना,
मन ही मन हल्का-सा मुस्कुराना,
मुझे बेचैन कर जाता है।
तुम्हारा कम बोलना,
बात करते-करते अचानक रुक जाना,
मुझसे नज़रें चुरा लेना,
मन को व्याकुल कर जाता है।
आज भी याद आती हैं
वे छोटी-छोटी बातें,
वह बेवजह हँसना,
और बिना कुछ कहे एक-दूसरे को समझ लेना।
कितनी बातें याद आती हैं,
कितनी बातें अब भी कहनी बाकी हैं,
कितनी बातें अब भी सुननी बाकी हैं,
और कितनी बातें समझनी बाकी हैं।
मैं तुम्हें क्या समझाऊँ?
कैसे समझाऊँ?
कब समझाऊँ?
यही सोचता रहता हूँ।
क्योंकि…
न मुझे समझाने की समझ है,
न रिश्ते निभाने की कला,
न किसी को पूरी तरह समझ पाने की क्षमता,
न ही हर “क्यों” का जवाब।
इसलिए कभी-कभी मन करता है—
तुम्हारे सामने चुपचाप रो लूँ,
निशब्द तुम्हारे सामने खड़ा रहूँ,
नज़रें झुका लूँ,
और अपना सारा अहंकार
तुम्हारे चरणों में रख दूँ।
शायद यही मेरा प्रायश्चित होगा…
तुम्हें ठीक से न समझ पाने का,
तुम्हें सहज ही अपना मान लेने का,
तुम्हारे त्याग को न पहचान पाने का,
तुम्हारे निस्वार्थ प्रेम को साधारण समझ लेने का,
और तुम्हें पर्याप्त समय न दे पाने का।
अब समझ में आता है—
प्रेम शब्दों से नहीं,
समय और संवेदनाओं से महसूस होता है।
और मैं…
शायद तुम्हें वही सबसे कम दे पाया।
इसलिए आज भी
जब तुम चुप रहती हो,
तुम्हारी ख़ामोशी
मेरे भीतर बहुत शोर मचाती है।
शायद यह सब भी बहुत कम है
मेरे प्रायश्चित के लिए…
क्योंकि कुछ रिश्तों की गलतियाँ
माफ़ तो हो जाती हैं,
लेकिन मन उन्हें
जीवनभर सँभालकर रखता है।
तेरी ख़ामोशी ने जो सिखाया,
वह शब्द कभी सिखा न सके।
तू साथ थी हर मोड़ पर,
और हम तुझे समझ न सके॥
रिश्ते शब्दों से नहीं टूटते,
वे ख़ामोशी में खो जाते हैं,
और फिर इंसान पूरी ज़िंदगी
बस प्रायश्चित करता रह जाता है।
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“मन की अदालत में…”
अपने चेहरे से जो जाहिर है,
उसे आखिर छुपाएँ कैसे,
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक
हम हर पल नज़र आएँ कैसे।
दिल में जो हलचल है,
उसे दबाएँ तो दबाएँ कैसे,
जो बात दिल में बसी हुई है,
उसे किसी को बताएँ कैसे।
हर कोई अपनी नज़र से
हमें परखता और देखता है,
उस शख्स को हमारे दिल की
असल बातें समझाएँ कैसे।
हर रिश्ता अपनी उम्मीदों के
तराजू में हमें तौलता है,
हर किसी की ख्वाहिशों का बोझ
हम अकेले संभालें कैसे।
हम अपने ही मन के अनुसार
बहुत कुछ कर नहीं पाते,
फिर अपने बेचैन दिल को
हर बार समझाएँ कैसे।
ज़िंदगी भी अक्सर
हमारी चाहत के मुताबिक नहीं चलती,
अपनी नाकामियों का कारण
खुद को ही समझाऍं कैसे।
ज़िंदगी तो जी रहे हैं हम,
जैसे-तैसे हर दिन गुजर रहा है,
मगर इसे खूबसूरती से जीना ही
यह हुनूर खुद को सिखाऍं कैसे।
जब खुद अपनी ज़िंदगी का अर्थ
पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं,
तो परिवार को जीवन का रास्ता
भला हम दिखाएँ कैसे।
हम तो बस मस्त और आनंदमय
जीवन जीना चाहते हैं,
लेकिन दुनियादारी के जाल से
खुद को बचाएँ कैसे।
इसलिए—
पहले खुद को जानो,
अपने जीने का मकसद पहचानो।
अपने भीतर थोड़ा बदलाव लाओ,
मन के आईने में खुद को देखो।
क्योंकि सच तो यही है—
ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है,
बस उसे देखने का नज़रीया चाहिए।
खुशियाँ बाहर नहीं मिलतीं,
खुद से मिलने की डगर चाहिए।
हर सवाल का जवाब नहीं
हर बात का हिसाब नहीं
जो खुद को समझ लिया एक दिन
फिर उसे कोई गम नहीं।
जो खुद को पहचान लेता है,
वो हर हाल में मुस्कुराता है।
मन की अदालत में जीत वही पाता है,
जो अपने दिल को अपनाता है।
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