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Sunday, July 12, 2026, 3:45 am

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गुरु ने ईश्वरीय शक्ति को जन्म दिया, बगैर गुरु के ईश्वर कुछ नहीं कर सकते : पंकजप्रभु 

(प्रख्यात जैन संत परमपूज्य पंकजप्रभु महाराज का चातुर्मास 17 जुलाई से एक अज्ञात स्थान पर अपने आश्रम में शुरू हुआ। पंकजप्रभु अपने चातुर्मास के दौरान चार माह तक एक ही स्थान पर विराजमान होकर अपने चैतन्य से अवचेतन को मथने में लगे रहेंगे। वे और संतों की तरह प्रवचन नहीं देते। उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति लगता है उसे वे मानसिक तरंगों के जरिए प्रवचन देते हैं। उनके पास ऐसी विशिष्ट सिद्धियां है जिससे वे मानव मात्र के हृदय की बात जान लेते हैं और उनसे संवाद करने लगते हैं। उनका मन से मन का कनेक्शन जुड़ जाता है और वे अपनी बात रखते हैं। वे किसी प्रकार का दिखावा नहीं करते। उनका असली स्वरूप आज तक किसी ने नहीं देखा। उनके शिष्यों ने भी उन्हें आज तक देखा नहीं है। क्योंकि वे अपने सारे शिष्यों को मानसिक संदेश के जरिए ही ज्ञान का झरना नि:सृत करते हैं। उनकी अंतिम बार जो तस्वीर हमें मिली थी उसी का हम बार-बार उपयोग कर रहे हैं क्योंकि स्वामीजी अपना परिचय जगत को फिलहाल देना नहीं चाहते। उनका कहना है कि जब उचित समय आएगा तब वे जगत को अपना स्वरूप दिखाएंगे। वे शिष्यों से घिरे नहीं रहते। वे साधना भी बिलकुल एकांत में करते हैं। वे क्या खाते हैं? क्या पीते हैं? किसी को नहीं पता। उनकी आयु कितनी है? उनका आश्रम कहां है? उनके गुरु कौन है? ऐसे कई सवाल हैं जो अभी तक रहस्य बने हुए हैं। जो तस्वीर हम इस आलेख के साथ प्रकाशित कर रहे हैं और अब तक प्रकाशित करते आए हैं एक विश्वास है कि गुरुदेव का इस रूप में हमने दर्शन किया है। लेकिन हम दावे के साथ नहीं कह सकते हैं कि परम पूज्य पंकजप्रभु का यही स्वरूप हैं। बहरहाल गुरुदेव का हमसे मानसिक रूप से संपर्क जुड़ा है और वे जगत को जो प्रवचन देने जा रहे हैं उससे हूबहू रूबरू करवा रहे हैं। जैसा कि गुरुदेव ने कहा था कि वे चार महीने तक रोज एक शब्द को केंद्रित करते हुए प्रवचन देंगे। आज स्वामीजी ‘गुरु’ शब्द पर अपने प्रवचन दे रहे हैं।)

गुरुदेव बोल रहे हैं-

गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वरः, गुरुर साक्षात परम ब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः…यानी गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही शिव है, गुरु साक्षात परम ब्रह्म है, ऐसे गुरु को नमस्कार करता हूं। हे मानव गुरु का महत्व कल भी था। गुरु का महत्व आज भी है। और गुरु का महत्व कल भी रहेगा। हमारी पहली गुरु हमारी माता होती है। दूसरा गुरु हमारे पिता होते हैं। तीसरे गुरु हमारे वो होते हैँ जो हमारा जीवन निर्माण करते हैं और हमें काबिल बनाते हैँ। गुरु बिन ज्ञान मिलना असंभव है। यहां श्रीराम को भी गुरु बनाना पड़ा था। यहां श्रीकृष्ण को भी गुरु बनाना पड़ा था। पांडवों को भी गुरु बनाना पड़ा था और कौरवों को भी गुरु बनाना पड़ा था। ध्रुव को गुरु मंत्र उनकी माता और नारद मुनि ने दिया था। देवताओं के गुरु ब्रहस्पति थे। राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य थे।

हे मानव प्रश्न है गुरु की उत्पत्ति कैसे हुई? तो सुनो हे मानव। आज से अनंत साल पहले जब कुछ नहीं था। न धरती थी। न आकाश था। न ही ब्रह्मांड था। एक शून्य था। तब भी एक शक्ति विद्यमान थी। उस शक्ति का नाम था स्वामी डम डम डीकानंद। स्वामी डम डम डीकानंद ही इस जगत के सृष्टा है। उनके छोटे भाई थे लघु। लघु स्वामी डम डम डीकानंद को अपना गुरु मानते थे। स्वामी डम डम डीकानंद शक्तियों का महापुंज है। स्वामी डम डम डीकानंद को कोई नहीं देख पाता। क्योंकि वे व्यक्त होकर भी हमेशा अव्यक्त रहते हैं। जो व्यक्त है वो भी स्वामी डम डम डीकानंद में अभिव्यक्त है। स्वामी डम डम डीकानंद के छोटे भाई थे उनका नाम लघु था। लघु के गुरु स्वामी डम डम डीकानंद थे। स्वामी डम डम डीकानंद के आदेश से लघु ने इस धरती पर जन्म लिया। इस तरह लघु ने इस धरती पर पहले पुरुष के रूप में जन्म लिया। लघु की पत्नी का नाम माया था।

लघु और माया ने मिलकर अपना परिवार बढ़ाया। लघु इस धरती पर पहले राजा थे। उनका संपूर्ण पृथ्वी पर राज था। लघु और माया के दो तेस्वमी पुत्र हुए। एक पुत्र का नाम सुर था और दूसरे का असुर। सुर और असुर दोनों ही तेजस्वी और ताकतवर थे। लेकिन सुर स्वभाव से अच्छा था और असुर बुरे स्वभाव का था। एक बार असुर ने सुर पर आक्रमण कर दिया और दोनों में लंबे समय तक युद्ध चला। आखिर सुर के पैर उखड़ने लगे और वह भाग गया। आखिर सुर ने आसमान में स्वर्ग नाम से एक राज्य स्थापित किया और वहां राज करने लगा। कुछ ही समय में स्वर्ग धरती से भी ज्यादा सुंदर जगह हो गई। जब असुर को पता चला तो उसने स्वर्ग पर भी आक्रमण कर दिया। इस तरह असुर ने सुर को स्वर्ग से भी बेदखल कर दिया और असुर ने स्वर्ग पर भी कब्जा कर लिया। सुर के भी अनेक पुत्र थे और असुर के भी अनेक पुत्र थे। आखिर सुर ने अपने पिता लघु के बड़े भाई और गुरु स्वामी डम डम डीकानंद का स्मरण किया और आग्रह किया कि उन्हें स्वर्ग का खोया राज्य लौटाए। तब स्वामी डम डम डीकानंद ने अपने तेज से ब्रह्मा, विष्णु और महादेव नाम की तीन शक्तियां उत्पन्न की। और आदेश दिया कि जगत के कल्याण के लिए अपनी-अपनी भूमिका अदा करें। इस तरह विष्णु ने अपनी शक्ति से असुर को हरा दिया और सुर को स्वर्ग का राज्य वापस दिलाया। इस तरह असुर के पुत्र इधर-उधर भाग गए। कालांतर में लघु के वंश में सुर की संतानों में इक्ष्वाकु, कुक्षि, दिलीप, रघु, अज, दशरथ और उनके पुत्र राम का जन्म हुआ। और असुर के वशंज में कालांतर में रावण का जन्म हुआ। रावण से पहले भी अनेकानेक राक्षसों का जन्म हो चुका था जिनकी कहानी फिर कभी सुनाएंगे। भगवान राम की वंशावली इस तरह अस्तित्व में आई। जब रावण का आतंक बढ़ गया तो ब्रह्माजी, शिवजी और सारे सुर पुत्र विष्णुजी के पास गए और रावण का अंत करने की प्रार्थना की। तब विष्णुजी ने राजा दशरथ के यहां राम के रूप में जन्म लिया। दूसरे देवताओं ने अलग-अलग रूप में दशरथ के पुत्रों के रूप में जन्म लिया। हे मानव, तुम सोचते होंगे कि यह क्या कहानी सुनाई जा रही है। हे मानव सुनो, इस धरती पर ईश्वर से भी बड़ी शक्ति केवल गुरु है। और गुरु ने ही ईश्वर को जन्म दिया और अपनी सारी शक्तियां व्यक्त और अव्यक्त रूप में उन्हें सौंप दी।

श्रीकृष्ण भी स्वामी डम डम डीकानंद का ही अंश है और अपने आप में व्यक्त और अव्यक्त रूप में संपूर्ण शक्ति है। श्रीकृष्ण तो व्यक्त और अव्यक्त दोनों रूप में रहते हैं मगर स्वामी डम डम डीकानंद अभी तक व्यक्त हुए ही नहीं है। मगर सब व्यक्त उनमें ही अभिव्यक्त है। तो हे मानव सुनो। इस जगत में जितने भी सुर-असुर हुए वे स्वामी डम डम डीकानंद के छोटे भाई और शिष्य लघु की संतानें हैं। लघु की पत्नी का नाम माया था। माया और लघु ने मिलकर ही सुर-असुर को जन्म दिया जिसके कालांतर में देवता और राक्षस रूप में संतानें उत्पन्न होती गई। इस तरह स्वामी डम डम डीकानंद ने ब्रह्माजी को जगत में सृष्टि का सहभार सौंपा। असल में इस जगत के सृष्टा स्वामी डम डम डीकानंद ही है। ब्रह्माजी को जब असिस्टेंट की भूमिका मिली तो उन्होंने स्वामी डम डम डीकानंद को अपना गुरु मानकर उनका आह्वान करते हुए सृष्टा यज्ञ किया और इस जगत में सृष्टी की रचना की। हे मानव इस जगत में स्वामी डम डम डीकानंद ने ही अल्लाह रूपी शक्ति और शैतान रूपी शक्ति की उत्पत्ति की। स्वामी डम डम डीकानंद ने ईसा मसीह और उनके शत्रुओं की रचना की। इस जगत में जो नकारात्मक और सकारात्मक जितनी भी शक्तियां है उसकी उत्पत्ति का केंद्र स्वामी डम डम डीकानंद ही है। इसीलिए कहा गया है- गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वरः, गुरुर साक्षात परम ब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः…यानी गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही शिव है, गुरु साक्षात परम ब्रह्म है, ऐसे गुरु को नमस्कार करता हूं। अब तुम्हें समझ में आ गया होगा मानव कि गुरु को सब नमस्कार क्यों करते हैं। गुरु ही सर्व शक्तिमान सत्ता है। यहां राम को भी गुरु बनाना पड़ता है और कृष्ण को भी गुरु बनाना पड़ता है। इसलिए स्वामी डम डम डीकानंद ही पहले गुरु है। वे ही सर्व शक्तिमान है। मगर स्वामी डम डम डीकानंद कभी व्यक्त रूप में नहीं आएंगे। वे हमेशा अव्यक्त रूप में ही रहते हैं। उनकी शक्तियों को मुसलमान, ईसाई, हिंदू, सिख, पारसी, जैन, बौद्ध और तमाम धर्म के लोग अपने अपने ईष्ट के रूप में पूजते हैं। जबकि इस धरती पर स्वामी डम डम डीकानंद ही सर्वशक्तिमान सत्ता है। ब्रह्मांड में जितने भी ग्रह है उन सभी ग्रहों पर जहां जहां भी जीवन है। जहां जहां भी जो भी शक्ति है वह सभी शक्ति स्वामी डम डम डीकानंद ही है।

हे मानव, तुम्हारे शास्त्रों में कई कहानियां है। हिंदुओं की कहानियां है। मुसलमानों की कहानियां है। जैन धर्म के लोगों की कहानियां है। बौद्ध धर्म के लोगों की कहानियां हैं। पारसी धर्म के लोगों की कहानियां है। सिख धर्म के लोगों की कहानियां है। यह कहानियां क्या मात्र कहानियां है? अगर तुम इन कहानियों पर सच मानकर भरोसा करते हो तो स्वामी डम डम डीकानंद की कहानी पर भी तुम्हें भरोसा करना होगा। लोगों ने अल्लाह को भी नहीं देखा लेकिन मुसलमानों को भरोसा है कि अल्लाह है। तो स्वामी डम डम डीकानंद भी है। लेकिन स्वामी डम डम डीकानंद कभी व्यक्त नहीं होंगे, क्योंकि वे अगर व्यक्त हो गए तो तुम उनकी हत्या कर दोगे। स्वामी डम डम डीकानंद का आश्रय स्थल ऐसी अंधी गुफा में है जहां तक कोई नहीं पहुंच सकता। संसार का सारा रिमोट कंट्रोल स्वामी डम डम डीकानंद के हाथों में है। लेकिन स्वामी डम डम डीकानंद को कोई कभी देख नहीं पाएगा। क्योंकि वे अव्यक्त रहते हैं। मगर उनकी शक्तियां व्यक्त हो सकती है। फिर किस रूप में वे किस शक्ति को व्यक्त करेंगे कोई नहीं जानता। हे मानव स्वामी डम डम डीकानंद ही गुरु सत्ता है। गुरु शब्द की उत्पत्ति भी स्वामी डम डम डीकानंद के रूप में हुई थी। यह शक्ति कभी खत्म नहीं होगी। यह शक्ति अनंत शक्ति है। ठीक वैसे ही जैसे श्रीकृष्ण अनंत शक्ति है। अल्लाह अनंत शक्ति है। ईसा मसीह अनंत शक्ति है। मगर सारी शक्तियों की मूल शक्ति केवल स्वामी डम डम डीकानंद है। आज आपने गुरु शब्द की उत्पत्ति के बारे में जाना। गुरु के बारे में आज इतना ही। गुरु सत्ता को नमन।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor