राइजिंग भास्कर एक बहस छेड़ रहा है…आप सभी के विचार आमंत्रित है, इसे न्यूज पोर्टल में स्थान देंगे
राइजिंग भास्कर अपराधी रावण के साथ न्याय करने का मुद्दा भारत की अदालतों में रखता है…न्याय करें जज साहब…14 लाख सालों से कब तक रावण काे उसके गुनाहों की सजा के बाद भी मानसिक और शारीरिक यंत्रणा देंगे…
डीके पुरोहित. जोधपुर
राम-रावण युद्ध 14 लाख साल पहले हुआ था। वो त्रेता युग था। उसके बाद द्वापर युग आया और अब कलियुग चल रहा है। रावण ने माता सीता का अपहरण किया था और जबरन अपनी लंका में बंदी मना रखा था, लेकिन इतना भी स्पष्ट हाे चुका है कि माता सीता के साथ रावण ने कोई गलत हरकत नहीं की थी। वो माता सीता से शादी जरूर करना चाहता था, मगर इसके लिए रावण ने इंतजार किया…बाद में रावण और उसके परिवार का विनाश हो गया था…ये कहानी हम सब जानते हैं। बुरे कार्यों का बुरा परिणाम होता ही है। बुराई का न हम समर्थन करते हैं और न ही कोई सभ्य समाज समर्थन करेगा। हम सदियों से रावण और उनके परिजनों का पुतला जलाते आ रहे हैं। हालांकि इस पर हम सहमत नहीं है कि 14 लाख सालों से रावण का पुतला जलाया जाता आ रहा है। क्योंकि कोई नहीं जानता यह परंपरा कब से शुरू हुई?…
चलो मान लेते हैं कि 14 लाख सालों से रावण का पुतला जलाया जाता आ रहा है। जबकि इस पर विवाद हो सकता है। यह परंपरा कलियुग में ही कतिपय अति विद्वानों ने अपने स्वार्थ के लिए शुरू की है, ऐसा लगता है। क्योंकि शास्त्रों में ऐसा उल्लेख नहीं आता कि 14 लाख साल से रावण का पुतला जलाया जाता आ रहा है। अब हमारे आज की बहस का विषय भी यही है कि क्या आज के समय में रावण का पुतला जलाना उचित है? इस पर सारे हिंदूवादी संगठन हो सकता है हमारे विरोध में खड़े हो जाएं मगर हमारा सबसे विनम्र सवाल यही है कि आज रावण को जलाने का जाे आयोजन होता है वो कहीं नगर पालिका करती है। कहीं नगर परिषद करती है। कहीं नगर निगम तो कहीं कोई और निकाय करता है। गांव-गांव, ढाणी-ढाणी से लेकर गली-मोहल्लों में रावण दहन होता है। मगर हमारा सीधा सादा सवाल है कि क्या आज रावण का जलाने वाली भीड़ खुद चरित्रवान, ईमानदार, बिना आरोप वाले लोग हैं? हंसी आती है जब रावण का पुतला जलाने वाली संस्थाएं पुतला निर्माण और आयोजन में भ्रष्टाचार करती है और ऐसी खबरें छपती रहती है। आज देश में दुराचारियों की फौज है। संतों के वेश में रेपिस्ट घूम रहे हैं। आसाराम जैसे दुराचारी भी जेल से बाहर जमानत पर हैं। फिर कलियुग की अदालत में रावण काे आज भी जमानत क्यों नहीं मिल रही? कलियुग की अदालत में रावण को जिंदा क्यों जलाया जाता है? कलियुग की अदालत में रावण को हर साल मौत की सजा क्यों दी जाती है? बताते हैं कि रावण शास्त्रों और वेदों का ज्ञाता था। रावण शिव का अनन्य भक्त था। उसे अमर होने का एक तरह से वरदान था। सबसे बड़ी बात मरते वक्त उसके मुंह से श्रीराम का शब्द निकला था। और उससे भी बड़ी बात यह कि श्रीराम ने भी रावण के वध के बाद राम को माफ कर दिया था इस संदेश के साथ की दुराचारी का एक दिन ऐसा ही अंत होता है। मगर क्या आज के दौर में जब चारों तरफ रावणों की भीड़ में रावण का दहन उचित है? …अगर कलियुग में एक भी व्यक्ति यह दावा करता है कि वो श्रीराम की तरह मर्यादाधारी और चरित्रवान है तो हां हम कहते हैं कि रावण का पुतला जलाया जाए। कलियुग की अदालतों से बड़े से बड़े रेपिस्ट और कातिल छूट जाते हैं फिर कलियुग की अदालतें क्यों आदेश नहीं जारी करती कि अब रावण का पुतला जलाना बंद करें…।
अदालतें जब राम मंदिर निर्माण का आदेश जारी कर सकती हैं तो हमारा यह मुद्दा भी भारत की अदालतों के सामने पेश किया जा रहा है। इस मुद्दे को अदालतें एक याचिका के तौर पर ले सकती है। हालांकि अदालतें कह सकती है कि यह उनका मुद्दा नहीं है। मगर एक अपराधी के रूप में रावण के केस को भी भारत की अदालतों को सुनना चाहिए। यह परंपरा जरूर है, मगर भारत की अदालतों को इस परंपरा के सभी पहलुओं पर गौर करना चाहिए। अदालतें बड़े से बड़े अपराधी का पक्ष सुनती है। मुझे याद है एक बार जोधपुर में हाईकोर्ट में राधा-कृष्ण के विवाह का मुद्दा आया था तो जज ने पूछा था कि शास्त्रों में देखकर बताएं कि क्या कभी कृष्ण-राधा का विवाह हुआ था? जब जज को संतुष्ट किया गया कि हां ऐसा हो चुका है। यह इंवेट बाल व्यास राधाकृष्ण से जुड़ा था। तब मामला रफा-दफा हुआ। हमारा भी अदालतों से यह विनम्र आग्रह है कि रावण को अपराधी के रूप में खूब सजा हो चुकी है। अब इस पर बहस हो और इस पर तर्क-जिरह हो कि यह रावण का जलाने की परंपरा किसने और कब शुरू की? आज के दौर में यह सजा रावण काे हर साल दी जाती है। क्या यह उचित है? क्या अदालतें किसी रेपिस्ट को या दुराचारी को सजा देती है तो क्या उसकी इज्जत की भी इस तरह नीलामी होते देखती है? नहीं अदालतें अपराधी को भी सजा के तौर पर कारागृह में रखती है और उसके भी मानवाधिकारों की सुरक्षा करती है? फिर एक मानवाधिकार के रूप में रावण के अधिकारों और उसके मान-सम्मान का हनन क्यों हो रहा है?…हमारा भारत की अदालतों से आग्रह है कि रावण को जलाने के मुद्दे पर वृहद बहस हो। सुप्रीम कोर्ट के आला वकीलों की फौज बहस करे। देश के बुद्धिजीवियों और संतों को भी अदालत में बुलाया जाए। साथ में भी इस तथ्य को भी ध्यान में रखें कि आज कोई भी रावण को जलाने वाली भीड़ में न तो राम की तरह चरित्रवान है और न ही ईमानदार है? हर ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। हर आदमी अपने हमाम में नंगा है। फिर हम किस हक से रावण को जला रहे हैं? हे अदालतों! इस पर विचार करो। अब तो रावण को अभिशाप से मुक्त भलेही ना करो मगर उसकी इज्जत का जनाजा निकालना बंद करवाओ।
