ग़ज़ल
नफ़रत में जलने वालों के घाव भरते नहीं है,
जर्जर हो जाए बदन पर हर्गिज़ मरते नहीं है।
कतरा-कतरा बिखर जाए लहू का, जुनून में,
दुश्मन ताकतवर हो पर मौत से डरते नही है।
बुलंद हो हौसले मंजिल भी इंतज़ार करती है,
घर मजबूत इरादों से बने वो बिखरते नही है।
डगमाऐ कदम अगर, सफर से पहले समझो,
हरगिज़ वे इंसान मंज़िल फ़तह करते नहीं है।
लगन ओ मेहनत का जोश दौड़ता हो रगों में,
जंग ओ मैदान में कभी सन्नाटे पसरते नही है।
बेशख खुशी में शुमार न हो “जैदि” मगर तुम,
मुश्किलों में खड़े हो साथ तो अख़रते नहीं है।
शायर:-“जैदि”
डॉ.एल.सी.जैदिया “जैदि”
बीकानेर।
