
महत्व : भगवान ऋषभ ने अपना पहला समवसरण सिद्धाचल पर्वत पर किया था
12 मार्च को फाल्गुन सुदी तेरस को रवाना होगी यात्रा
डीके पुरोहित. जोधपुर
आगामी 12 मार्च यानी फाल्गुन शुक्ल पक्ष की तेरस को सिद्धाचल तीर्थ फाल्गुन फेरी यात्रा निकाली जाएगी। इस यात्रा की जैन समाज की ओर से जोधपुर में तैयारियां की जा रही है। इस यात्रा की परपंरा 84 हजार सालों से चली आ रही है। जैनों की सिद्धाचल तीर्थ फाल्गुन फैरी की महिमा तीर्थंकर भगवान नेमीनाथ की वाणी सुनकर शाम्ब प्रद्युमन जी को वैराग्य हुआ था।
भगवान के पास दीक्षा लेकर परमात्मा की आज्ञा लेकर शत्रुंजय भाडवागिरिराज के ऊपर तपस्या और ध्यान करने लगे तथा उनके साथ अनेक मुनियों ने भी सभी कर्मों से मुक्त होकर फागण सुदी तेरस के दिन शत्रुंजय गिरिराज के पर्वत के ऊपर से मोक्ष – मुक्ति पाया था। उन्हीं के दर्शन वंदन करने के लिए 84 हजार वर्षों से यह फागण के फेरी चल रही है। फागण के फेरी में आते हुए दर्शन के स्थल दादा के दरबार में से निकलने के बाद रामपोल दरवाजे से छह गाउ की यात्रा प्रारंभ होती है। उसमें 5 दर्शन के स्थल है। श्रद्धालु 6 गाउ की यात्रा विधि विधान के साथ फागुनी तेरस को करते हैं। श्री महावीर शासन स्थापना महोत्सव समिति के राष्ट्रीय महामंत्री धनराज विनायकिया के अनुसार श्रद्धालु भक्त श्रद्धा आस्था को लेकर उन्हीं के दर्शन वंदन करने के लिए लगभग 84 हजार वर्षों से यह फागण फेरी पर जाते हैं। विनायकिया ने बताया कि जैनों का महान शाश्वत सिद्धाचल पालीताणा तीर्थ दादा के दरबार में से
निकलने के बाद रामपोल दरवाजे से छह गाउ की यात्रा प्रारंभ होती है। उसमें 5 दर्शन के स्थल है।
सिद्धाचलम दुनिया भर के जैन धर्मावलंबियों के लिए तीर्थस्थल है। यहीं पर आचार्य सुशील कुमारजी महाराज (तत्कालीन मुनि) – भारत के सबसे सम्मानित भिक्षुओं में से एक ने एक लंबे समय से परित्यक्त स्थान पर एक आश्रम की स्थापना की थी जो कभी युद्ध का मैदान हुआ करता था। गहन ध्यान के माध्यम से, उन्होंने इसे एक जीवंत पशु और प्रकृति संरक्षण में भिक्षुओं और निवासियों के एक अद्वितीय समुदाय में बदल दिया। यहीं पर उन्होंने जाति, रंग या पंथ की परवाह किए बिना सभी के साथ भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित धर्म को साझा किया, जो बाद के जैन संप्रदायों के संकीर्ण विभाजनों से मुक्त था। यहीं पर उन्होंने णमोकार मंत्र के पीछे ध्वनि के गुप्त विज्ञान को भी सिद्ध किया और इसे सभी के साथ साझा किया। जल्द ही, सिद्धाचलम को तीर्थस्थल माना जाने लगा।
2012 में सिद्धाचलम में तीर्थाधिराज की प्रतिकृति बनाई गई
जब गुरुजी (जैसा कि उन्हें प्यार से बुलाया जाता था) 14 या 15 साल के थे, तब उन्होंने ध्यान करते समय अपने स्वप्न में सिद्धाचलम को देखा (गुरुजी नौ साल की उम्र में जैन साधु की संगत में शामिल हो गए और 15 साल की उम्र में दीक्षा ली)। उन्होंने सिद्धाचलम को सिद्धों के सम्मान में कई मंदिरों वाले स्थान के रूप में देखा। उनका सपना वर्ष 2012 में साकार हुआ जब सिद्धाचलम में तीर्थाधिराज शिखरजी की प्रतिकृति बनाई गई। सिद्धाचलम में शिखरजी शिखरजी की दुनिया की पहली पूर्ण, पैमाने पर प्रतिकृति है।
यात्रा का अर्थ : छ यानी 6, गाउ यानी कोस की यात्रा
कई लोगों के लिए, गुजरात के पालीताना में सिद्धाचल पर्वत पर शत्रुंजय की यात्रा साल की पहली यात्रा होती है। इसे करने के लिए विशेष रूप से शुभ दिन फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी (फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष में 13 वां दिन) है। इस यात्रा को लोकप्रिय रूप से छ गाउ फेरी के रूप में जाना जाता है। “छ” का अर्थ है छह, और “गाउ” या “कोस” का अर्थ है तीन किलोमीटर के बराबर की दूरी। सिद्धाचलम में यात्रा हर साल फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी के सबसे करीब वाले शनिवार को दोहराई जाती है। सिद्धाचलम का नाम सिद्धाचल पर्वत से लिया गया है, जिस पर भगवान ऋषभ ने अपना पहला समवसरण किया था। सिद्धाचलम के मुख्य मंदिर के मूलनायक भगवान ऋषभ हैं। छ गाउ यात्रा मुख्य मंदिर में उनकी प्रतिमाजी के पूजा पक्ष से शुरू होती है और जंगल में उनकी टोंक पर श्रद्धांजलि के बाद समाप्त होती है।
छह गाउ यात्रा के पड़ाव पर एक नजर
1 – 6 गाउ की यात्रा प्रारंभ होते ही 100 पगथिया के बाद ही देवकी माता के 6 पुत्र का समाधि मंदिर आता है। वो यहां मोक्ष गयें थे।
[कृष्ण महाराज के 6 भाई का मंदिर]
2- उलखा जल नाम का स्थल आता है (जहां दादा का पक्षाल आता है ऐसा कहते हैं वो स्थल ) यहां पर आदिनाथ भगवान के पगले है।
3- चंदन तलावडी आती है यहां पर अजितनाथ और शांति नाथ के पगले है. चैत्यवंदन में अजित शांति बोलते है और
चंदनतलावडी पर नो लोग्गस का काउस्सग करते है। अगर लोग्गस नहीं आता हो तो 36 नवकार मंत्र का जाप करते हैं।
4- भाडवा का डूंगर पर शाम्ब प्रध्युमन की देहरी यानी मंदिर आता है। इसी के ही दर्शन का महत्व है आज के दिन यहां मंदिर में पगले है।.यहां चैत्यवंदन करने होता है।
5- सिद्ध वड का मंदिर। यह मंदिर (पालके अंदर ही है) यहां पर आदिनाथ भगवान का मंदिर है। यह पांचों स्थल पर चैत्यवंदन करना होता है।
और
जयतलेटी –शांतिनाथ – रायण पगला- आदिनाथ दादा – पुंडरीक स्वामी यह भी पांच स्थल पर चैत्यवंदन करने का होता ही है
यात्रा विधि विधान के साथ .फाल्गुनी तेरस करने से आत्म कल्याण होता है ।
सिद्धाचल छह गाउ तीर्थयात्रा का सपना हर जैन बंधु का होता है : विनायकिया
श्रावक धनराज विनायकिया का कहना है कि हर जैन समाजबंधु का सपना सिद्धजल छह गाउ तीर्थयात्रा का होता है। जो यह यात्रा करता है उसकी मुक्ति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। हर व्यक्ति को जीवन में एक बार यह यात्रा अवश्य करनी चाहिए।