-हम हमारी आगामी पुस्तक में अखबारों के अंधेरे पक्ष को उजागर करेंगे। हम अपनी पत्रकारिता के 33 साल के अनुभव को और विस्तार दे रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि अब सफर एक जगह लंबा चलेगा। लेकिन जो विधाता ने लिखा है वो तो होकर ही रहेगा, इसलिए डर तो हमारे मन में कभी रहा ही नहीं।
-हम बिना इलाज के मर जाना पसंद कर लेंगे मगर ना तो सरकारों के आगे हाथ फैलाएंगे और ना ही किसी के आगे झुकेंगे। कुछ लोगों के शब्द होते हैं कि हम जिस थाली में खाते हैं उसमें छेद करते हैं, मगर हमें उसकी परवाह नहीं है, क्योंकि लोगों ने तो पूरी की पूरी थाली ही खा ली है।
डीके पुरोहित. जोधपुर
मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार साथी हैं। उन्हें डेंगू हो गया। वे हार्ट और शुगर के मरीज हैं। पत्रकारिता की दुनिया के शहंशाह है। यानी कि कलम के धनी हैं। पर जैसा कि होता आया है मीडिया की अंदरखाने की राजनीति के चलते अपने घर-परिवार से दूर ट्रांसफर हो गया। पत्नी बच्चे जोधपुर में और खुद जयपुर में हैं। उनका नाम मैं उजागर नहीं करना चाहता। ना ही उस मीडिया घराने की चर्चा करना चाहता, क्योंकि यह कहानी किसी एक मीडिया घराने की ना होकर सभी की है। तो मैं अपने वरिष्ठ साथी का हालचाल पूछने दोस्ती के नाते उनके घर गया। उन्होंने मुझे सुझाव दिया कि मैं जयपुर से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अधिस्वीकरण करवा लूं तो मुझे सरकारी योजनाओं का फायदा मिलने लगेगा। इस संबंध में उन्होंने पूरी प्रक्रिया भी बताई और कहा कि आपके तो सभी पत्रकारों से अच्छे संबंध है कोई भी आपकी शिफारिश करने में मना भी नहीं करेगा। मैं काफी कुछ कहना चाहता था मगर अपने मित्र के आग्रह को चुपचाप सुनता रहा। लौटते वक्त पूरे रास्ते मेरे मन में विद्रोह था। इस व्यवस्था के प्रति। मैं पिछले 32-33 साल से पत्रकारिता से जुड़ा हुआ हूं। सक्रिय रूप से। 1989 में राजस्थान केसरी के जमाने से मैं फ्री लांस पत्रकारिता करता आ रहा हूं। उससे पहले भी जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था तब से मेरी खबरें अखबारों में छपती रहती थी। 90 के दशक में हिन्दुस्तान से जुड़ गया। 2003 में दैनिक भास्कर जोधपुर से जुड़ गया। यानी इतना लंबा अनुभव होते हुए भी मेरा राज्य सरकार से अधिस्वकरण नहीं हो पाया। जबकि साइकिल के पंक्चर निकालने वाले, मासिक-पाक्षिक और साप्ताहिक पेपर और ऐसे अखबार-मैगजीन के तथाकथित पत्रकार और तेल बेचने वाले एक्रिडिएशन करवाकर पत्रकारिता की दुकानदारी चला रहे हैं। मुझे लगा कि हम दुनिया की दौड़ में बहुत पीछे हैं। मेरे एक साथी है वेदप्रकाश शर्मा। दैनिक भास्कर से रिटायर हो गए। पूरी सर्विस गुजार दी और अधिस्वीकरण नहीं हो पाया। आखिर क्यों? क्योंकि हम बड़े दुकानदार नहीं है। जिम्मेदारी उन मीडिया घरानों की भी है जो हमारे जैसे पत्रकारों का आगे बढ़कर अधिस्वीकरण करवाती। मगर ऐसा नहीं होता। हम इस बहस को आगे नहीं बढ़ाना चाहते क्योंकि बड़े मीडिया घरानों के मठाधीशों को मिर्चें लग जाएंगी। वैसे हमारे फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें मिर्चें लगती है या नहीं।
तो हमारे बहस का मुद्दा यह है कि राज्य सरकार से जो अधिस्वीकरण होता है वह व्यवस्था भ्रष्टाचार की शिकार है। इसमें योग्य और वाजिब हक रखने वाले आज भी अधिस्वीकृत नहीं हो पाए और नाकारा भी अपना अधिस्वीकरण करवा चुके हैं। ना तो सरकारों को इतनी फुर्सत है कि तहकीकात करे और इसके लिए जो प्रक्रिया है और इसकी कमेटी में जो मेंबर है वे नकचढ़े और अपने अपने लोगों का भला करने में लगे रहते हैं। कुछ लोग मुझे साइको कहते हैं। कुछ लोग पागल कहते हैं। कुछ सनकी कहते हैं। मगर मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं वही करता हूं जो मेरे मन को अच्छा लगता है। मैं परिणाम को माप-तोल कर नहीं लिखता। दुनिया में नुकसान की परवाह करता तो आज मैं भी किसी मीडिया घराने का ग्रुप एडिटर होता। मगर जो हुआ नहीं उसकी चर्चा ही क्या करनी। तो आते हैं मुद्दे पर। समस्या यह है कि पत्रकारों की समस्याओं का प्लेटफार्म कौनसा हो? सरकार ने जोधपुर के विकास के लिए जोधपुर विकास प्राधिकरण बनाया। जयपुर के विकास के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण बनाया। ऐसे ही पत्रकारों के विकास के लिए पत्रकार विकास प्राधिकरण बनाया जाना चाहिए। अब सवाल आता है कि इसकी जरूरत क्यों? इसकी आज के दौर में सबसे बड़ी जरूरत है। पत्रकारों के हितों पर बोलने वाला कोई नहीं है। संचार और जनसंपर्क निदेशालय और अन्य संस्थाएं रस्म अदायगी भर बनकर रह गई है। अब एक ऐसे प्राधिकरण की जरूरत है जिसमें पत्रकारों के अधिस्वीकरण से लेकर तमाम मुद्दे शामिल होने चाहिए। चाहे पत्रकार कॉलोनी बसाने की बात हो। चाहे पत्रकारों के प्लॉट के मुद्दे हो। चाहे बीमार और मृत्यु होने पर पत्रकारों को आर्थिक सहायता की बात हो। चाहे पत्रकार कल्याण कोष की बात हो। चाहे पत्रकारों के लीगल मेटर हो। चाहे पत्रकारों के वेतन निर्धारण और भत्तों की बात हो। बड़े मीडिया घराने जब नई भर्ती करे तो उन्हें पत्रकार विकास प्राधिकरण के वेतन नियमों को फॉलो करना अनिवार्य किया जाए ताकि पत्रकारों का शोषण रुके। एक क्लर्क, एक चपरासी, एक आरएएस और एक आईएएस का वेतन निर्धारित होता है तो एक बड़े मीडिया घराने के पत्रकार का वेतन निर्धारित क्यों नहीं होना चाहिए। मीडिया घरानों में एक ही पद के लिए अलग अलग वेतन मिलता है। मैं अपनी ही बात करूं। मैं सीनियर सब एडिटर हूं। मेरे जैसे दस सीनियर सब एडिटर है और सभी का वेतन अलग-अलग है। सरकार में ऐसा नहीं होता। अगर कोई यूडीसी है तो सारे यूडीसी की सेलेरी एक जैसी होगी। इसके अलावा सरकार में प्रमोशन के भी नियम होते हैं। जैसे 9, 18, 27, 36 ऐसे नियम होते हैं। मगर मीडिया घरानों में कोई नियम नहीं है। कोई तो पूरी जिंदगी एक ही पद पर निकाल लेता है और कोई चमचागिरी कर अपने जीवन में सारे पद-प्रलोभन प्राप्त कर लेता है। मैं यह नहीं कहता कि योग्यता को मौका नहीं मिलता। मगर ऐसा बहुत कम होता है।
तो मेरा यहां पर सरकार से आग्रह है कि एक स्वतंत्र प्राधिकरण गठित किया जाए। उसका नाम रखा जाए पत्रकार विकास प्राधिकरण यानी की जर्नलिज्म डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी कि जेडीए। यह जेडीए पत्रकारों के तमाम मुद्दों के हितों की रखवाली करे। साथ ही मजीठिया आयोग के मुद्दे पर भी पत्रकारों का पक्ष देखे और न्यायालय में पैरवी करे। पत्रकारों के लिए कई प्रकार के कोर्स शुरू करने की जिम्मेदारी भी ये प्राधिकरण उठाए। अगर किसी पत्रकार को उसका अखबार या मीडिया संस्थान हटा दे तो अपना खुद का अखबार निकालने या प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए रियायती ब्याज दर पर लोन देने का भी इस पत्रकार विकास प्राधिकरण में प्रावधान हो। इस प्राधिकरण को चलाने में मीडिया के अधिसंख्या लोगों को लिया जाए। यानी मीडिया जगत की समस्या को हल करने का पूरा जिम्मा इस प्राधिकरण के हाथ में हो। मेरा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से आग्रह है कि यह शुभ कार्य उनके कार्यकाल में हो ताकि आपके विजन और आपकी निर्णय क्षमता का सब परिचय देख सकें। हमने समय-समय पर सीएम साहब के खिलाफ भी लिखा है और पक्ष में भी लिखा है। जब हम लिखते हैं तो हमारे सामने मुद्दा होता है। मुद्दा अपने आप में बहस का विषय होता है और सवाल छोड़ जाता है। उसे कोई खिलाफ समझता है तो उसकी मर्जी। जबकि हमारे मन में ऐसा भाव नहीं होता। अब वक्त आ गया है कि मीडिया के मालिकों से पत्रकारों को बगावत करनी होगी। क्योंकि जिंदगी में दो ही चीजें होती है जिंदगी या मौत। जीत या हार। नफा या नुकसान। आज अगर हम चुप रहे तो कल हमारे लिए बोलने वाला कोई नहीं रहेगा। यह मेरे अकेले का मुद्दा नहीं है। यह पूरी पत्रकार बिरादरी का मुद्दा है। मैं उन धूर्त और मक्कार पत्रकारों की बातें नहीं करता जिनके लिए अखबार का वेतन पूनम का चांद है। मुंशी प्रेमचंद अपनी एक कहानी में भ्रष्टाचार करने वालों पर व्यंग्य कसते हुए कहते हैं कि वेतन तो पूर्णिमा का चांद है जो दिनों दिन घटता जाता है और ऊपर की कमाई ही महीना पूरा चलाती है। तो ऐसे पत्रकारों कि मैं बात नहीं करता जो ऊपर की कमाई करते हैं। यह मजाक नहीं है। कौवे सब जगह काले ही होते हैं। पत्रकारिता के पेशे में भी कुछ कालिख है। यह कालिख तो रहेगी क्योंकि जब तक मीडिया घरानों के मालिक खुद काजल की कोठरी से सने रहेंगे तब तब यह कालिख धुल नहीं सकती। मैंने जीवन में लिखने की सजा पाई है। कई बार अपमानों के घूंट पिए हैं। लेकिन भगवान की जो मर्जी है उसको हाजिर नाजिर माानकर लिखता रहता हूं। मैं नहीं चाहता कि मेरे पत्रकार साथियों का बुरा हो। जो ईमानदारी के पथ पर चलते हैं। जिनके लिए कलम एक ताकत है व्यवस्था को बदलने की। जो कलम से क्रांति का बीज बोना चाहते हैं। जिनके लिए कलम पूजा है। मैं ऐसे पत्रकारों के लिए लिख रहा हूं। मैं उन कलमकारों की पैरवी नहीं करता जिनके हाथों में बहुरंगी कलम होती है। कुछ पत्रकार अधिकारियों को डराने के लिए लाल स्याही का इस्तेमाल करते हैं। भ्रष्टाचार के लिए हरी स्याही का इस्तेमाल करते हैं। काली कमाई के लिए काली स्याही का इस्तेमाल करते हैं। पानी की तरह पैसा बहाने के लिए ब्ल्यू स्याही का इस्तेमाल करते हैं। और भी कई तरह की स्याही पत्रकारिता और अखबार की दुनिया में आ गई जो पत्रकारों की हथियार बन गई है। पाठकों को जो दिखाया जाता है वो पूरा सच नहीं होता। अब बात जोजरी नदी की ही लेते हैं। बात तो जोजरी की जाती है। ताकि जनता को लगे कि उनकी बात कही जा रही है पर बजट सरकारों से आवंटित कराने की भूमिका तैयार की जाती है। जब बजट जारी होता है तो और बजट जारी कराने की भूमिका तैयार की जाती है। यह पैसा कहां खर्च होगा और कैसे खर्च होगा? यह पैसा किस किस में बंटेगा बेचारा पाठक कभी नहीं जान पाएगा। हम हमारी आगामी पुस्तक में अखबारों के इसी अंधेरे पक्ष को उजागर करेंगे। हम अपनी पत्रकारिता के 33 साल के अनुभव को और विस्तार दे रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि अब सफर एक जगह लंबा चलेगा। लेकिन जो विधाता ने लिखा है वो तो होकर ही रहेगा, इसलिए डर तो हमारे मन में कभी रहा ही नहीं। हम बिना इलाज के मर जाना पसंद कर लेंगे मगर ना तो सरकारों के आगे हाथ फैलाएंगे और ना ही किसी के आगे झुकेंगे। कुछ लोगों के शब्द होते हैं कि हम जिस थाली में खाते हैं उसमें छेद करते हैं, मगर हमें उसकी परवाह नहीं है, क्योंकि लोगों ने तो पूरी की पूरी थाली ही खा ली है। हम जहां काम करते हैं वहां आठ-नौ घंटे पूरे टाइम देते हैं और अपना 100 प्रतिशत देते हैं। हमारे काम में कोई कमी नहीं होती है। अगर संस्थान हमें 21-22 हजार रुपए पगार देता है तो हम अपना पूरा समर्पण देते हैं। संस्था के बाहर हम क्या करते हैं और क्या लिखते हैं उस पर हम किसी कि सुनने वाले नहीं हैं। हम उन लोगों में नहीं है जो काम तो संस्थान का करते हैं और संस्थान के नाम पर घर भरते हैं। हमारे घर की तमाम तंगहाली में हमारी खुद्दारी है। हमारी खुद्दारी से हमारे घर वाले भी परेशान होते हैं। मगर हमने अगर लिखना छोड़ दिया तो ईश्वर को अपना चेहरा नहीं दिखा पाएंगे। जहां तक पत्रकारिता का सवाल है। हम उन सभी लोगों के साथ है जो पत्रकारिता को एक मिशन के तौर पर लेते हैं। अगर आप पत्रकारिता को कमाई का जरिया बनाते हैं तो उसके लिए और कई रास्ते हैं, पर कलम को अपनी गरिमा और अपने सिद्धांतों के आगे न बेचें तो ही अच्छा है। मेरी पत्रकारिता की यात्रा में मुझे कई भले लोग मिले। जो आज भी आर्थिक मोर्चे पर संघर्ष कर रहे हैं, मगर उन्होंने पत्रकारिता के नाम पर अपने जमीर को नहीं बेचा। मैंने लोगों को अपनी आंखों के सामने गिरता देखा है। मैंने संपादकों के चेहरों पर कई मुखौटे देखे हैं। मैंने देखा है संपादकों को भीतर ही भीतर घुटते हुए। अपने भीतर का गुस्सा न उगल पाने की विवशता देखी है। देखी है मैंने संपादकों की उस लाचारी को जिसकी वजह से वे सच्चाई को देखकर भी आंखें बंद कर लेते हैं और भ्रष्ट पत्रकारों की हां में हां मिलाते हैं। संपादकों के हाथ में हमें हटाने की पूरी आजादी है। मगर हम अपना बलिदान देकर भी लिखने की आजादी छोड़ने वाले नहीं है। हमने हमारा काम कर दिया है। संपादकों के जो जी में आए वो करे।
