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Saturday, April 5, 2025, 8:01 pm

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रिपोर्ट : अमेरिका-चीन में 2027 के अंत तक युद्ध की आशंका, वर्ल्डवार का संकट गहराया

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-क्योंकि… अमेरिका हथियारों का सौदागर, 1950 के बाद दुनिया भर को 21397 अरब डॉलर के हथियार और सामरिक ताकत बेच चुका है या छोटे देशों को मदद के नाम पर ऋणी बना चुका है

-अमेरिका एक ऐसा देश है जो दुनिया में प्रायोजित युद्ध करवाकर अपने हथियार और सामरिक ताकत बेचता आया है, मदद के नाम पर गुलाम बना देता है छोटे देशों को, चीन भी उसी की राह पर चल चुका है, अब अमेरिका और चीन में वैश्विक ताकत बढ़ाने की हौड़ मची हुई है।

-हाल ही में वाशिंगटन में इजराइली दूतावास के बाहर 25 साल के अमेरिकी वायुसैनिक ऐरॉन बुशनैल ने खुद को आग लगा ली। इस दौरान वह बार-बार कह रहा था, मैं गाजा में नरसंहार नहीं करूंगा। फिलिस्तीन को आजाद करना चाहिए। सैनिक ने अपने मोबाइल फोन से घटना की लाइव स्ट्रीमिंग की। उसने कहा- वह गाजा में हो रह अमानवीय अत्याचार को बर्दाश्त नहीं कर सकता। आग भड़काने के बाद सैनिक मौके पर गिर गया। अस्पताल में उपचार के दौरान सैनिक ऐरॉन की मौत हो गई। गौरतलब है कि इजराइल को अमेरिका शुरू से आर्थिक और सैन्य मदद करते आया है।

-अमेरिका ने पाकिस्तान को जो सामरिक मदद की है उसके बाद 170 परमाणु हथियार (वॉरहेड) हैं जिन्हें देश के विशेष सैन्य ठिकानों पर रखा गया है। अगर पाकिस्तान इसी गति से अपने जखीरे में इजाफा करता रहा तो वर्ष 2025 तक उसके परमाणु हथियारों की संख्या 200 तक पहुंच सकती है।

-अमेरिका रूस और यूक्रेन के बीच चुद्ध के दौरान यूक्रेन को 300 अरब डॉलर की सामरिक मदद प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कर चुका है, यह सिर्फ इसलिए ताकि रूस की ताकत कमजोर हो जाए और वह विश्व में एकछत्र राज कर सकें।

-एक्सियोस के अनुसार अमेरिका इजराइल को 2022 के बीच 70,000 से अधिक हथियार भेज चुका है। एमनेस्टी ने वाशिंगटन और अन्य देशों से इजराइल को हथियारों की आपूर्ति बंद करने का आग्रह किया था, चेतावनी दी थी कि वे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर सकते हैं।  

ओम गौड़ की वाशिंगटन और डीके पुरोहित की जोधपुर से विशेष रिपोर्ट

इस समय दुनिया में अमेरिका की दादागिरी चरम पर है। लेकिन रिपोर्ट है कि चीन इसको टक्कर देने पर उतारू है। बताया जा रहा है कि 2027 के अंत तक अमेरिका और चीन में युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। अगर अमेरिका और चीन में युद्ध हुआ तो तीसरे वर्ल्डवार की शुरुआत हो जाएगी। ऐसे में भारत की सरकारी और प्राइवेट बैंकों में ग्राहकों का जमा अरबों-खरबों रुपयों का धन सरकारी प्रॉपर्टी हो सकता है। इसलिए विशेषज्ञों के अनुसार भारत में सरकारी और प्राइवेट बैंकों में पैसा निवेश करना सुरक्षित नहीं है। वहीं दुनिया भर की आर्थिक हालत खराब हो जाएगी। कई देश बर्बाद हो जाएंगे। पाकिस्तान जैसे देश तो कभी उठ भी नहीं पाएंगे। अगर यह युद्ध हुआ तो लगभग 4 से 6 साल चलेगा और इस युद्ध से आधा एशिया, आधा यूरोप और आधा नॉर्थ अमेरिका तबाह हो जाएगा। चीन अमेरिका से बेहद कमजोर कहा जा सकता है, लेकिन अमेरिका इतना ताक़तवर नही है कि चीन के हमलों को अपनी ज़मीन पर होने से रोक सके। अमेरिका और चीन सीधा युद्ध कर भी नही सकेंगे और न ही करेंगे। आक्रमण अमेरिका को ही करना होगा और उसके लिए उसको एशिया में अपना आर्मी बेस बनाना होगा। और जिस देश में अमेरिका का आर्मी बेस बनेगा चीन के प्रहार उस देश पर सब से पहले होंगे। एक व्यापक युद्ध की स्थिति में कोई भी एशियाई देश चीन के सामने टिक सकने की स्थिति में नही है। ऐसे में शायद ही कोई मूर्ख राष्ट्र होगा जो अपनी ज़मीन चीन के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए अमेरिका को देगा। ऐसे में अमेरिका पाक अधिकृत कश्मीर में आर्मी बेस बनाने पर उतारू है।

इधर अगर अमेरिका और चीन के बीच युद्ध होता है तो अमेरिका और चीन के साथी देश भी युद्ध में सक्रिय हो जाएंगे। क्योंकि रूस के बाद चीन ही अमेरिका का विरोधी गुट का सब से शक्तिशाली राष्ट्र है। ऑस्ट्रेलिया से लेकर रूस तक की सेनाएं इस युद्ध में हिस्सा लेंगी। उस स्थिति में ब्रिटेन से लेकर इंडोनेशिया तक युद्ध का मैदान बन चुका होगा। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिका को घुटने टेकने की तैयारी कर ली है। बताया जा रहा है कि 2027 के अंत तक अमेरिका और चीन के बीच युद्ध की आशंका बन रही है। चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने अपनी सेना को तैयार रहने के निर्देश दिए हैं। चीन एक ऐसी रणनीति बना रहा है जो कई मोर्चों पर एक साथ काम कर रही है। एक तरफ कृत्रिम वायरस का हमला करने की योजना मूर्त रूप लेने जा रही है और तो दूसरी तरफ जमीनी जंग की भूमिका तैयार हो रही है। रिपोर्ट है कि चीन और अमेरिका के बीच युद्ध तय है। चीनी जासूसी की खबरें आने के बाद अमेरिका भी सतर्क हो गया है। इधर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के हवाले से अपुष्ट खबरें भी आ रही है कि चीन और अमेरिका के बीच संबंध सही नहीं है। दोनों देशों के बीच खटास है और यह दुनिया की सेहत के लिए ठीक नहीं है।

दरअसल अमेरिका और चीन के बीच युद्ध के हालात अकस्मात नहीं बने हैं। इसके पीछे पिछले करीब 70-75 साल का दौर है जो अब मूर्त रूप ले सकता है। पिछले 70-75 सालों में अमेरिका हथियारों का सौदागर बनकर उभरा है। 1950 के बाद दुनिया भर को 21397 अरब डॉलर से अधिक के हथियार और सामरिक ताकत बेच चुका है या छोटे देशों को मदद के नाम पर ऋणी बना चुका है। अमेरिका एक ऐसा देश है जो दुनिया में प्रायोजित युद्ध करवाकर अपने हथियार और सामरिक ताकत बेचता है। मदद के नाम पर गुलाम बना देता है छोटे देशों को। चीन भी उसी की राह पर चल चुका है। अब अमेरिका और चीन में वैश्विक ताकत बढ़ाने की हौड़ मची हुई है। पिछले सालों में विदेशों में अमेरिकी हथियारों की बिक्री तेजी से बढ़ी जो रिकॉर्ड कुल $238 बिलियन (£187 बिलियन) तक पहुंच गई, क्योंकि यूक्रेन पर रूस के आक्रमण ने मांग को बढ़ा दिया। विदेश विभाग ने बताया कि अमेरिकी सरकार ने सीधे बिक्री में $81 बिलियन की बातचीत की  जो 2022 से 56% की वृद्धि है। बाकी अमेरिकी रक्षा कंपनियों द्वारा विदेशी देशों को सीधी बिक्री थी। यूक्रेन के पड़ोसी पोलैंड, जो इस समय अपनी सेना का विस्तार करने के अभियान पर है, ने कुछ सबसे बड़ी खरीदारी की। एक रिपोर्ट में कहा कि पोलैंड ने 12 अरब डॉलर में अपाचे हेलीकॉप्टर खरीदे, और हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम (हिमार्स) के लिए 10 अरब डॉलर और एम1ए1 अब्राम टैंक के लिए 3.75 अरब डॉलर का भुगतान भी किया। इसने इंटीग्रेटेड एयर और मिसाइल डिफेंस बैटल कमांड सिस्टम पर 4 बिलियन डॉलर भी खर्च किए। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने तर्क दिया था कि यूक्रेन को अमेरिकी समर्थन हथियारों की बिक्री के माध्यम से घरेलू अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है। फिर भी, अमेरिकी सांसद यूक्रेन को प्रत्यक्ष समर्थन समाप्त करने के इच्छुक दिख रहे हैं, कई रिपब्लिकन इस बात पर जोर दे रहे हैं कि सहायता को अमेरिकी आव्रजन नीति में सुधार से जोड़ा जाए। अगर अमेरिका और चीन के बीच युद्ध होता है तो इजराइल की इसमें विशेष भूमिका रहेगी। इधर हाल ही में वाशिंगटन में इजराइली दूतावास के बाहर 25 साल के अमेरिकी वायुसैनिक ऐरॉन बुशनैल ने खुद को आग लगा ली। इस दौरान वह बार-बार कह रहा था, मैं गाजा में नरसंहार नहीं करूंगा। फिलिस्तीन को आजाद करना चाहिए। सैनिक ने अपने मोबाइल फोन से घटना की लाइव स्ट्रीमिंग की। उसने कहा- वह गाजा में हो रह अमानवीय अत्याचार को बर्दाश्त नहीं कर सकता। आग भड़काने के बाद सैनिक मौके पर गिर गया। अस्पताल में उपचार के दौरान सैनिक ऐरॉन की मौत हो गई। यह तो एक पहलू है। मगर इतना साफ है कि खुद अमेरिका की सेना के लोग भी इजराइल और हमास युद्ध के खिलाफ है। क्योंकि इस युद्ध में इजराइल के 1200 लोग और फिलिस्तीन के 29 हजार लोग मारे जा चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका इजराइल को 1.16 लाख करोड़ रुपए की मदद व 50 हजार करोड़ के हथियार दे चुका है। जबकि इधर चीन इस परिस्थितयों पर नजर रखे हुए हैं। इधर बताया जा रहा है कि अमेरिका पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर अपने सैनिक भेजना चाहता है और वहां पर सामरिक ताकत स्थापित करना चाहता है। जबकि चीन की उस पर पहले से नजर है। गौरतलब है कि अमेरिका ने पाकिस्तान की जो सामरिक मदद की है उसके बाद 170 परमाणु हथियार (वॉरहेड) हैं जिन्हें देश के विशेष सैन्य ठिकानों पर रखा गया है। अगर पाकिस्तान इसी गति से अपने जखीरे में इजाफा करता रहा तो वर्ष 2025 तक उसके परमाणु हथियारों की संख्या 200 तक पहुंच सकती है। अमेरिका के शीर्ष परमाणु वैज्ञानिकों के मुताबिक़ पाकिस्तान के पास इस वक़्त कुल 170 परमाणु हथियार (वॉरहेड) हैं, जिन्हें देश के विशेष सैन्य ठिकानों पर रखा गया है। 11 सितंबर को जारी बुलेटिन ऑफ़ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स में बताया गया है कि इन परमाणु हथियारों को ले जाने वाली छोटी और लंबी दूरी की मिसाइलों को देश के किन किन हिस्सों में रखा गया है। परमाणु हथियारों को ले जाने में सक्षम मिसाइलों और उनके मोबाइल लॉन्चर इस्लामाबाद के पश्चिम में काला चिट्टा दहर पर्वत शृंखला में स्थित नेशनल डिफ़ेंस कॉम्प्लेक्स में विकसित किए जा रहे हैं।

इधर चीन अमेरिका द्वारा रूस के खिलाफ यूक्रेन को दी जा रही मदद पर भी नजर रखे हुए हैं। क्योंकि अमेरिका रूस और यूक्रेन के बीच चुद्ध के दौरान यूक्रेन को 300 अरब डॉलर से अधिक की सामरिक मदद प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कर चुका है, यह सिर्फ इसलिए ताकि रूस की ताकत कमजोर हो जाए और वह विश्व में एकछत्र राज कर सकें। हर साल संयुक्त राज्य अमेरिका अपनी सुरक्षा, आर्थिक और मानवीय हितों की पूर्ति के नाम पर दुनिया भर के लाभार्थियों को अरबों डॉलर की सहायता भेजता है। फरवरी 2022 में रूस के आक्रमण के बाद से यूक्रेन अमेरिका विदेशी सहायता का शीर्ष प्राप्तकर्ता बन गया है। यह पहली बार है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद हैरी एस ट्रूमैन प्रशासन द्वारा मार्शल योजना के माध्यम से महाद्वीप के पुनर्निर्माण के लिए बड़ी रकम का निर्देश दिए जाने के बाद से किसी यूरोपीय देश ने शीर्ष स्थान हासिल किया है। कील इंस्टीट्यूट फॉर द वर्ल्ड इकोनॉमी के अनुसार जो बाइडेन प्रशासन और अमेरिकी कांग्रेस ने यूक्रेन को लगभग 75 बिलियन डॉलर की सहायता का निर्देश दिया है, जिसमें मानवीय, वित्तीय और सैन्य सहायता शामिल है। इस आंकड़े में सभी युद्ध संबंधी अमेरिकी खर्च शामिल नहीं है, जैसे कि सहयोगियों को सहायता, ऐतिहासिक रकम शरणार्थियों, कानून प्रवर्तन और और स्वतंत्रत रेडियो प्रसारकों सहित यूक्रेनी लोगों और संस्थानों के एक व्यापक समूह की मदद कर रही है, हालांकि अधिकांश सहायता सैन्य संबंधित रही है। उत्तरी अटलांटिक संधी संगठन (नाटो) और यूरोपीय संघ (ईयू) के अधिकांश सदस्यों सहित दर्जनों अन्य देश भी यूक्रेन को बड़े सहायता पैकेज प्रदान कर रहे हैं। हालांकि 2024 की शुरुआत में यूक्रेन को अमेरिकी सहायता का प्रवाह अनिश्चित लग रहा था क्योंकि नया फंडिंग कानून कांग्रेस में रुका हुआ था। इस बीच यूरोपीय संघ के नेता हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन के विरोध को दूर करने के बाद यूक्रेन को बहुवर्षीय वित्तीय सहायता में 50 बिलियन यूरो और प्रदान करने पर सहमत हुए हैं। अधिकांश सहायता हथियार प्रणाली, प्रशिक्षण और खुफिया जानकारी प्रदान करने के लिए दी गई है जो यूक्रेनी कमांडरों को रूस के खिलाफ बचाव के लिए चाहिए। जिसके पास दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक है। कई पश्चिमी विश्लेषकों का कहना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य सहयोगियों द्वारा प्रदान की गई सैन्य सहायता ने यूक्रेन की रक्षा और रूस के खिलाफ जवाबी कार्रवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अमेरिका और सहयोगी नेता रूस के आक्रमण को नाटो की सीमा पर आक्रामकता का एक क्रूर और अवैद्ध युद्ध मानते हैं, जो सफल होने पर लाखों यूक्रेनियन को अधीन कर लेगा, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के विद्रोहवादी उद्देश्यों को प्रोत्साहित करना और अन्य विश्लेषकों का कहना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य सहयोगियों द्वारा प्रदान की गई सैन्य सहायता ने यूक्रेन की रक्षा और रूस के खिलाफ जवाबी कार्रवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अमेरिका और सहयोगी नेता रूस के आक्रमण को नाटो की सीमा पर आक्रामकता का एक क्रूर और अवैद्ध युद्ध मानते हैं जो सफल होने पर लाखों यूक्रेनियन को अपने अधीन कर लेगा। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के विद्रोहवादी उद्देश्यों को प्रोत्साहित करना और अन्य प्रतिद्वंदी शक्तियों विशेषकर चीन से समान आक्रामकता को आमंत्रित करें। नाटो सहयोगी विशेष रूप से सीधे शत्रुता में शामिल होने से सावधान हैं जो नाटकीय रूप से परमाणु युद्ध का खतरा बढ़ा सकता है। हालांकि जैसे-जैसे लड़ाई आगे बढ़ी है, कई दाता सरकारों ने यूक्रेन को युद्धक टैंक और आधुनिक लड़ाकू विमान जैसी अधिक परिष्कृत संपत्तियां देने में अपनी अनिच्छा छोड़ दी है। 2023 की गर्मियों में संयुक्त राज्य अमेरिका अपने यूरोपीय सहयोगियों को यूक्रेन को अमेरिका निर्मित एफ-16 प्रदान करने की अनुमति देने पर सहमत हुआ था। इन उन्नत लड़ाकू विमानों का पहला हस्तांतरण 2024 के मध्य में होने की उम्मीद थी, लगभग उसी समय जब यूक्रेनी पायलटों का पहला समूह विमान पर अपना प्रशिक्षण पूरा करने वाला था। युद्ध के दो साल बाद बाइडेन प्रशासन ने यूक्रेन को अब्राम्स युद्धक टैंक, विमान भेदी मिसाइलें, तटीय रक्षा जहजा और उन्नत निगरानी और रडार सिस्टम सहित रक्षा क्षमताओं की एक लंबी सूची प्रदान की थी या प्रदान करने पर सहमति व्यक्त की थी। जुलाई 2023 में बाइडन प्रशासन ने यूक्रेन को क्लटर युद्ध सामग्री की आपूर्ति करने पर सहमति व्यक्त करके कुछ विवाद खड़ा कर दिया, जिस पर अधिकांश देशों द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया है, क्योंकि उनके उपयोग के कई वर्षों बाद उनके बिना विस्फोट वाले घटक नागरिकों के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।

अमेरिका द्वारा यूक्रेन को दी गई मदद का ब्यौरा :

मानवीय

$1.6 बिलियन (2%)

आपातकालीन खाद्य सहायता, स्वास्थ्य देखभाल, शरणार्थी सहायता और अन्य मानवीय सहायता

वित्तीय

$26.4 बिलियन (35%)

आर्थिक सहायता निधि, ऋण और अन्य वित्तीय सहायता के माध्यम से बजटीय सहायता

सुरक्षा सहायता

$18.3 बिलियन (25%)

यूक्रेन सुरक्षा सहायता पहल के माध्यम से प्रशिक्षण, उपकरण, हथियार, रसद सहायता और अन्य सहायता प्रदान की जाती है

हथियार और उपकरण

$23.5 बिलियन (32%)

रक्षा विभाग के स्टॉक से हथियार और उपकरण, राष्ट्रपति की छूट के माध्यम से प्रदान किए गए

हथियारों के लिए अनुदान एवं ऋण

और उपकरण

$4.5 बिलियन (6%)

विदेशी सैन्य वित्तपोषण कार्यक्रम के माध्यम से अनुदान और ऋण प्रदान किए जाते हैं

पैदल सेना के हथियार और उपकरण

हवाई रक्षा

10,000 जेवलिन एंटी-आर्मर सिस्टम

1 पैट्रियट वायु रक्षा बैटरी और युद्ध सामग्री

90,000 अन्य कवच-रोधी प्रणालियाँ और युद्ध सामग्री

12 NASAM सिस्टम

2,000 स्टिंगर विमान भेदी प्रणालियाँ

बदला लेने वाली वायु रक्षा प्रणाली

9,000 TOW मिसाइलें

HAWK वायु रक्षा प्रणालियाँ और युद्ध सामग्री

35,000 ग्रेनेड लांचर और छोटे हथियार,

गोला बारूद के साथ

लेजर-निर्देशित रॉकेट सिस्टम

AIM-7 मिसाइलें

बॉडी कवच ​​और हेलमेट के 100,000 सेट

RIM-7 मिसाइलें

रात्रि दृष्टि उपकरण, निगरानी प्रणाली,

थर्मल इमेजरी सिस्टम, ऑप्टिक्स, और

लेजर रेंजफाइंडर

AIM-9M मिसाइलें

विमान भेदी बंदूकें और गोला-बारूद

एकीकृत करने और बनाए रखने के लिए उपकरण

यूक्रेन की प्रणालियों और महत्वपूर्ण की रक्षा के लिए

आधारभूत संरचना

सी-4 और अन्य विस्फोटक

विस्फोटक-आयुध-निपटान उपकरण

वैम्पायर एंटी-ड्रोन सिस्टम और युद्ध सामग्री

M18A1 क्लेमोर खदानें

ड्रोन रोधी बंदूक ट्रक और गोला-बारूद

टैंक रोधी खदानें

एंटी-ड्रोन लेजर-निर्देशित रॉकेट सिस्टम

खदान साफ़ करने वाले उपकरण

वायु रक्षा प्रणाली घटक

बाधा-स्थापन उपकरण

अन्य ड्रोन रोधी उपकरण

चिकित्सा की आपूर्ति

फ़ील्ड उपकरण, ठंड के मौसम में गियर, जनरेटर,

और स्पेयर पार्ट्स

हवा से ज़मीन पर मार करने वाली मिसाइलें

रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल, और

परमाणु सुरक्षा उपकरण

उच्च गति विकिरणरोधी मिसाइलें (HARMs)

परिशुद्ध हवाई युद्ध सामग्री

18 बख्तरबंद ब्रिजिंग सिस्टम

रॉकेट लांचर और गोला बारूद

6,000 ज़ूनी विमान रॉकेट (कार्य कर सकते थे

वायु रक्षा के रूप में)

25 मिमी गोला बारूद

जवाबी वायु रक्षा क्षमता

हवाई रक्षा

10,000 जेवलिन एंटी-आर्मर सिस्टम

1 पैट्रियट वायु रक्षा बैटरी और युद्ध सामग्री

90,000 अन्य कवच-रोधी प्रणालियाँ और युद्ध सामग्री

12 NASAM सिस्टम

2,000 स्टिंगर विमान भेदी प्रणालियाँ

बदला लेने वाली वायु रक्षा प्रणाली

9,000 TOW मिसाइलें

HAWK वायु रक्षा प्रणालियाँ और युद्ध सामग्री

35,000 ग्रेनेड लांचर और छोटे हथियार,

गोला बारूद के साथ

लेजर-निर्देशित रॉकेट सिस्टम

AIM-7 मिसाइलें

बॉडी कवच ​​और हेलमेट के 100,000 सेट

RIM-7 मिसाइलें

रात्रि दृष्टि उपकरण, निगरानी प्रणाली,

थर्मल इमेजरी सिस्टम, ऑप्टिक्स, और

लेजर रेंजफाइंडर

AIM-9M मिसाइलें

विमान भेदी बंदूकें और गोला-बारूद

एकीकृत करने और बनाए रखने के लिए उपकरण

यूक्रेन की प्रणालियों और महत्वपूर्ण की रक्षा के लिए

आधारभूत संरचना

सी-4 और अन्य विस्फोटक

विस्फोटक-आयुध-निपटान उपकरण

वैम्पायर एंटी-ड्रोन सिस्टम और युद्ध सामग्री

M18A1 क्लेमोर खदानें

ड्रोन रोधी बंदूक ट्रक और गोला-बारूद

टैंक रोधी खदानें

एंटी-ड्रोन लेजर-निर्देशित रॉकेट सिस्टम

खदान साफ़ करने वाले उपकरण

वायु रक्षा प्रणाली घटक

बाधा-स्थापन उपकरण

अन्य ड्रोन रोधी उपकरण

चिकित्सा की आपूर्ति

फ़ील्ड उपकरण, ठंड के मौसम में गियर, जनरेटर,

और स्पेयर पार्ट्स

हवा से ज़मीन पर मार करने वाली मिसाइलें

रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल, और

परमाणु सुरक्षा उपकरण

उच्च गति विकिरणरोधी मिसाइलें (HARMs)

परिशुद्ध हवाई युद्ध सामग्री

18 बख्तरबंद ब्रिजिंग सिस्टम

रॉकेट लांचर और गोला बारूद

6,000 ज़ूनी विमान रॉकेट (कार्य कर सकते थे

वायु रक्षा के रूप में)

25 मिमी गोला बारूद

जवाबी वायु रक्षा क्षमता

20,000 हाइड्रा-70 विमान रॉकेट

तोपें

मानवयुक्त विमान

198 155 मिमी हॉवित्ज़र और गोला-बारूद

20 एमआई-17 हेलीकॉप्टर

72 105 मिमी हॉवित्जर और गोला-बारूद

47 120 मिमी मोर्टार सिस्टम

विस्फोटक और लड़ाकू ड्रोन

10 82 मिमी मोर्टार सिस्टम

112 81 मिमी मोर्टार सिस्टम

स्विचब्लेड ड्रोन

58 60 मिमी मोर्टार सिस्टम

फीनिक्स घोस्ट ड्रोन

203 मिमी, 152 मिमी, 130 मिमी, 122 मिमी

ALTIUS-600 ड्रोन (के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है

निगरानी)

39 HIMAR सिस्टम

लड़ाई के सामान

60,000 122 मिमी ग्रैड रॉकेट

परिशुद्धता-निर्देशित रॉकेट

जमीन से प्रक्षेपित छोटे व्यास का बम

लांचर और गोला बारूद

निगरानी ड्रोन

स्कैनईगल ड्रोन

प्यूमा ड्रोन

टैंक और बख्तरबंद वाहक

20 ड्रोन कूदें

186 ब्रैडली पैदल सेना से लड़ने वाले वाहन

साइबरलक्स K8 ड्रोन

4 ब्रैडली फायर सपोर्ट टीम वाहन

पेंगुइन ड्रोन (के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है)

लड़ाकू ड्रोन)

31 अब्राम टैंक

ब्लैक हॉर्नेट ड्रोन

45 टी-72बी टैंक (चेक गणराज्य के माध्यम से)

189 स्ट्राइकर बख्तरबंद कार्मिक वाहक

300 M113 बख्तरबंद कार्मिक वाहक

तटीय रक्षा

250 M1117 बख्तरबंद सुरक्षा वाहन

2 हार्पून तटीय रक्षा प्रणालियाँ

300 बख्तरबंद चिकित्सा-उपचार वाहन

62 तटीय और नदी गश्ती नौकाएँ

500 एमआरएपी वाहन

मानवरहित तटीय रक्षा जहाज़

125 मिमी, 120 मिमी और 105 मिमी टैंक गोला बारूद

बंदरगाह और बंदरगाह सुरक्षा उपकरण

ग्राउंड सपोर्ट वाहन

रडार और संचार

2,000 हमवीज़

931 सामरिक वाहन

4 उपग्रह संचार एंटेना

200 हल्के सामरिक वाहन

ड्रोन के लिए 2 रडार

80 ट्रक

21 हवाई निगरानी रडार

124 ट्रेलर

70 जवाबी तोपखाने और जवाबी-

मोर्टार रडार

10 कमांड पोस्ट वाहन

30 गोला-बारूद समर्थन वाहन

20 मल्टी-मिशन रडार

6 बख्तरबंद उपयोगिता ट्रक

सामरिक सुरक्षित संचार प्रणालियाँ

इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और जवाबी-इलेक्ट्रॉनिक

युद्ध उपकरण

8 रसद सहायता वाहन

239 ईंधन टैंकर और 105 ईंधन ट्रेलर

4 सैटकॉम एंटेना

58 जल ट्रेलर

SATCOM टर्मिनल और सेवाएँ

उपग्रह सेवाएँ

वाणिज्यिक उपग्रह इमेजरी सेवाएँ

नोट: कुछ संख्याएं अनुमानित हैं।

अब एक नजर अमेरिका-इजराइली संबंधों पर जो विश्व युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा

एक्सियोस के अनुसार अमेरिका इजराइल को 2022 के बीच 70,000 से अधिक हथियार भेज चुका है। एमनेस्टी ने वाशिंगटन और अन्य देशों से इजराइल को हथियारों की आपूर्ति बंद करने का आग्रह किया था और चेतावनी दी थी कि वे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर सकते हैं। इजरायली रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि गाजा पट्टी पर क्रूर हमले के बाद से अमेरिका ने  अपने दीर्घकालिक सहयोगी इजरायल को 10,000 टन मूल्य के हथियार और हथियार की आपूर्ति की है। अमेरिका से सैन्य उपकरण लेकर 200वां मालवाहक विमान देश में आ गया था, क्योंकि गाजा में इजरायल का हमला लगातार जारी था। वाशिंगटन ने इजरायली सेना को बख्तरबंद वाहन, हथियार, गोला-बारूद और चिकित्सा आपूर्ति सहित हथियार प्रदान किए थे। मंत्रालय ने एक्स, पूर्व में ट्विटर पर लिखा था कि सुरक्षात्मक व्यक्तिगत उपकरण भी प्रदान किए गए थे। इसका मतलब है कि संघर्ष के दौरान हर दिन इज़राइल को 159 टन हथियार दिए गए। रक्षा मंत्रालय ने बयान के साथ सैन्य गियर की तस्वीरें भी पोस्ट की थी, जिनमें बख्तरबंद वाहन भी शामिल थे। गाजा में क्रूर युद्ध शुरू होने के कुछ दिनों बाद गोला-बारूद से भरा एक विमान देश में उतरने के बाद 11 अक्टूबर को इज़राइल को संयुक्त राज्य अमेरिका से सैन्य सहायता मिलनी शुरू हो गई थी। अमेरिका ने कहा था कि वह हवाई सुरक्षा और अन्य सुरक्षा सहायता के साथ-साथ इज़राइल के  आयरन डोम को फिर से भरने के लिए अतिरिक्त अवरोधक भी भेजेगा, जो आने वाले कम दूरी के रॉकेट और तोपखाने को रोकता था। गाजा में फिलिस्तीनियों की हत्या में अमेरिका निर्मित हथियारों का भी योगदान है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा था कि युद्ध प्रभावित क्षेत्र में कई घातक और गैरकानूनी इजरायली हमलों में अमेरिका निर्मित ज्वाइंट डायरेक्ट अटैक म्यूनिशन (जेडीएएम) का इस्तेमाल किया गया था। एनजीओ के महासचिव एग्नेस कैलामार्ड ने कहा था कि अमेरिका निर्मित हथियारों ने विस्तारित परिवारों की सामूहिक हत्याओं को सुविधाजनक बनाया। एक्सियोस  के अनुसार  अमेरिका ने 1950 से 2022 के बीच इज़राइल को 70,000 से अधिक हथियार भेजे। एमनेस्टी ने वाशिंगटन और अन्य देशों से इज़राइल को हथियारों की आपूर्ति बंद करने का आग्रह किया है, चेतावनी दी है कि वे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर सकते हैं। गाजा पर हमले की शुरुआत से ही अमेरिका ने इजराइल के समर्थन में आवाज उठाई थी।

इजराइल की सेना पर एक नज़र 

इज़राइल एक विशाल सैन्य तंत्र संचालित करता है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (आईआईएसएस) सैन्य संतुलन 2023 के अनुसार, इज़राइल की सेना, नौसेना और अर्धसैनिक बलों में 169,500 सक्रिय सैन्यकर्मी हैं। अतिरिक्त 465,000 इसके आरक्षित बल हैं, जबकि 8,000 इसके अर्धसैनिक बल का हिस्सा हैं।

संभावित जमीनी कार्रवाई की आशंका के बीच एक सैन्य प्रवक्ता ने कहा था कि लगभग 3 लाख इजराइली सैनिक अब गाजा पट्टी के पास तैनात हैं।

18 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है – एक बार भर्ती होने के बाद, पुरुषों से 32 महीने और महिलाओं से 24 महीने तक सेवा करने की उम्मीद की जाती है।

इज़राइल के पास उन्नत निगरानी और हथियारों के साथ मध्य पूर्व में सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक है। इसके व्यापक सैन्य शस्त्रागार में शामिल हैं:

कार्मिक

  • 169,500 सक्रिय सैन्यकर्मी
  • 465,000 आरक्षित बल

भूमि शक्ति

  • 2,200+ टैंक
  • 530 तोपखाने (एसपी, टोड, एमआरएल, एमओआर)

हवाई हमले का सामना करने की क्षमता

  • 309 फाइटर ग्राउंड अटैक जेट सहित 339 लड़ाकू सक्षम विमान
    • 196 एफ-16 जेट
    • 83 एफ-15 जेट
    • 30 एफ-35 जेट
  • 142 हेलीकॉप्टर
    • 43 अपाचे लड़ाकू हेलीकॉप्टर

नौसैनिक शक्ति

  • 5 पनडुब्बियां
  • 49 गश्ती और तटीय लड़ाके

इज़राइल की आयरन डोम प्रणाली एक मोबाइल वायु रक्षा प्रणाली है जिसे रडार तकनीक का उपयोग करके कम दूरी के रॉकेटों को रोकने और नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसे 2006 में हिज़्बुल्लाह के साथ युद्ध के बाद विकसित किया गया था, जहाँ इज़राइल में हजारों रॉकेट लॉन्च किए गए थे।

2011 में ऑपरेशन में आते हुए, आयरन डोम को अमेरिका की मदद से बनाया गया था, जो 2022 में इज़राइल के लिए मिसाइल रक्षा में $ 1.5 बिलियन से अधिक की राशि निर्धारित करने सहित सिस्टम के लिए भागों की आपूर्ति के लिए जिम्मेदार है।

आईआईएसएस के अनुसार, इज़राइल की आयरन डोम प्रणाली ने 2021 में हमास और अन्य फिलिस्तीनी समूहों द्वारा दागे गए 90 प्रतिशत से अधिक रॉकेटों को रोक दिया।

IISS के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि इज़राइल के पास परमाणु क्षमताएं हैं, जिसमें कहा गया है कि देश के पास जेरिको मिसाइलें और परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम विमान हैं।

इज़राइल अपनी सेना पर कितना खर्च करता है?

संघर्ष और हथियारों पर केंद्रित एक शोध संस्थान, स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) के अनुसार, 2022 में, इज़राइल ने अपनी सेना पर 23.4 बिलियन डॉलर खर्च किए।

2018-2022 की अवधि में यह राशि प्रति व्यक्ति 2,535 डॉलर है, जो कतर के बाद प्रति व्यक्ति सेना पर खर्च करने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश बन गया है।

2022 में, इज़राइल ने अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 4.5 प्रतिशत सेना को समर्पित किया, जो दुनिया में 10वां सबसे बड़ा प्रतिशत है।

कौन से देश सबसे ज्यादा इजरायली हथियार खरीदते हैं?

ऐतिहासिक रूप से, इज़राइल के हथियारों का आयात उसके निर्यात से कहीं अधिक है। हालांकि, पिछले दशक के दौरान, निर्यात ने लगातार आयात को पीछे छोड़ना शुरू कर दिया है, जैसा कि एसआईपीआरआई डेटा से पता चलता है।

2018 और 2022 के बीच, कम से कम 35 देशों ने इज़राइल से कुल 3.2 बिलियन डॉलर के हथियार आयात किए।

उसमें से, इज़राइल के सैन्य निर्यात का लगभग एक तिहाई ($1.2 बिलियन) भारत को था। 2014 में भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से इज़राइल और भारत के बीच संबंध खिले हैं।

इज़राइली हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार अज़रबैजान ($295 मिलियन) था, उसके बाद फिलीपींस ($275 मिलियन), अमेरिका ($217 मिलियन) और वियतनाम ($180 मिलियन) थे।

2018-2022 के बीच की अवधि में, इज़राइल ने केवल दो देशों, अमेरिका और जर्मनी से कुल 2.7 बिलियन डॉलर के हथियार आयात किए।

इज़राइल के 2.1 बिलियन डॉलर के सैन्य आयात का तीन-चौथाई से अधिक हिस्सा अमेरिका से आया, जबकि शेष 546 मिलियन डॉलर जर्मनी से आया।

अमेरिका और इजरायली सेनाएं संयुक्त अभ्यास, प्रौद्योगिकी विकास कार्यक्रमों और रक्षा परियोजनाओं में निकटता से सहयोग करती हैं, इजरायल अमेरिकी सैन्य सहायता का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता है।

इज़राइल को अमेरिका से कितनी सैन्य सहायता मिली है?

-इज़राइल अमेरिकी विदेशी सहायता का सबसे महत्वपूर्ण प्राप्तकर्ता है, जिसने 1946 और 2023 के बीच लगभग 263 बिलियन डॉलर प्राप्त किए हैं।

-यह अमेरिकी विदेशी सहायता के दूसरे सबसे बड़े प्राप्तकर्ता मिस्र से लगभग दोगुना (1.7 गुना अधिक) है, जिसे पिछले 77 वर्षों में 151.9 बिलियन डॉलर प्राप्त हुए थे।

-इज़राइल को लंबे समय से अमेरिकी विधायक मध्य पूर्व में अमेरिकी रणनीतिक हितों की रक्षा में मदद करने वाले सहयोगी के रूप में देखते रहे हैं।

-अमेरिकी कांग्रेस अनुसंधान सेवा के अनुसार, इज़राइल को निरंतर सैन्य समर्थन के कारकों में साझा रणनीतिक हित, “इज़राइल के लिए घरेलू अमेरिकी समर्थन” और “लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति पारस्परिक प्रतिबद्धता” शामिल हैं।

-2016 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के तहत हस्ताक्षरित 10 वर्षों में रिकॉर्ड 38 बिलियन डॉलर के सौदे के हिस्से के रूप में, इज़राइल को अमेरिकी सैन्य फंडिंग 2023 में $ 3.8 बिलियन से अधिक हो गई।

-1946 से 2023 के बीच, अमेरिका ने सैन्य और रक्षा सहायता के रूप में इज़राइल को कुल 124 बिलियन डॉलर का समर्थन दिया है।

-इस वर्ष इज़राइल को प्रदान की गई 3.8 बिलियन डॉलर की सैन्य सहायता में से आधा बिलियन इज़राइल की मिसाइल रक्षा के लिए दिया गया है। वाशिंगटन ने कहा है कि वह नवीनतम युद्ध में हमास के खिलाफ इस्तेमाल किए गए इजरायली हथियारों को वापस भर देगा।

-इज़राइल के अंदर हमास के घातक हमले के कुछ घंटों बाद, उसने अमेरिका से आयरन डोम इंटरसेप्टर का अनुरोध किया, राष्ट्रपति जो बिडेन ने कहा कि वाशिंगटन “इजरायल रक्षा बलों को तेजी से अतिरिक्त उपकरण और संसाधन प्रदान करेगा, जिसमें युद्ध सामग्री भी शामिल है”, जो आने वाले हैं। दिन

-उम्मीद है कि बिडेन प्रशासन कांग्रेस से फंडिंग अनुरोध के माध्यम से तेल अवीव के लिए और अधिक धनराशि अलग रखेगा। हालाँकि, हाउस स्पीकर की अनुपस्थिति के कारण ऐसी सहायता के लिए कांग्रेस के प्राधिकरण में देरी हो सकती है।

-सहायता, विशेष रूप से सैन्य सहायता, का उपयोग कैसे किया जा सकता है, इस पर अमेरिका शर्तें लगाता है। लीही कानून मानवाधिकारों के हनन में शामिल सैन्य इकाइयों को अमेरिकी रक्षा वस्तुओं के निर्यात पर रोक लगाता है।

-हालांकि, इस कानून के तहत किसी भी इजरायली इकाई को दंडित नहीं किया गया है।

-1967 के युद्ध के बाद इज़राइल को सैन्य सहायता बहुत बढ़ गई जब इज़राइल ने पड़ोसी अरब सेनाओं को हरा दिया और वेस्ट बैंक, पूर्वी येरुशलम और गाजा पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया। इधर इजराइल और फिलिस्तीन के बीच जारी संघर्ष के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इजरायल को करीब 5.4 हजार करोड़ रुपए के हथियार बेचने को मंजूरी दी थी। उधर, अमेरिका के इस रवैये पर तुर्की भड़क गया था और वहां के राष्ट्रपति एर्दोगन ने बाइडेन का नाम लेते हुए कहा था कि  ‘आपने मुझे यह कहने के लिए बाध्य किया है कि आप अपने खूनी हाथों से इतिहास लिख रहे हैं।’ इजरायल-फिलिस्तीन को लेकर पहली बार अरब देशों में फूट देखने को मिली है। इजरायल को चेतावनी भी मिली। इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी की बैठक में इजरायल को चेतावनी दी गई थी कि अल अक्सा मस्जिद पर कब्जे की कोशिश की तो नतीजे भयानक होंगे। बैठक सऊदी ने बुलाई थी। पर उसने खुद अमेरिकी जेट फाइटर्स को जमीन दी थी। अमेरिका इसका इस्तेमाल इजरायल की मदद में कर सकता था। इधर पता चला है कि गाजा पट्टी के 11 लाख लोगों के पास बिजली और पीने का पानी नहीं, 6 लाख बच्चे शिक्षा से दूर हो गए हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इस जंग का खामियाजा दोनों पक्षों को भुगतना पड़ रहा है। लेकिन हमास के कब्जे वाले गाजा पट्टी इलाके में हालात बदतर हो चुके हैं। यहां की 21 लाख की आबादी में से 11 लाख के पास पीने का पानी, टॉयलेट और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। गाजा सिटी में 7 साल पहले बिजली, पानी, सीवेज के इंतजाम थे। एक वॉटर फिल्टर प्लांट तो 2.5 लाख लोगों की प्यास बुझाता था। आज सब तबाह हो चुका है। स्कूल या तो ध्वस्त हो चुके हैं या बमबारी की वजह से बंद। लिहाजा, 6 लाख बच्चे घरों में कैद हैं। 50 हजार लोग रिफ्यूजी कैम्पों में हैं।

अमेरिका-चीन के बीच युद्ध हुआ तो भारत-पाक भी खतरे की जद में  

भारत और चीन की आबादी मिला दें तो ढाई अरब से ज़्यादा हो जाती है. इसमें पाकिस्तान की 20 करोड़ आबादी भी जोड़ दें तो दुनिया की कुल आबादी की 40 फ़ीसदी से ज़्यादा आबादी इन तीन देशों में है। ये तीनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं और तीनों के बीच युद्ध की स्थिति बनी रहती है तो दुनिया की करीब 40 फ़ीसदी आबादी ख़तरे में पड़ सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत-चीन के बीच युद्ध की स्थिति में शायद पाकिस्तान तटस्थ न रहे. ऐसे में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत और चीन अपने परमाणु सिद्धांत के तहत परमाणु हथियार पहले इस्तेमाल नहीं करने की नीति का पालन करते हैं या नहीं सब इस पर निर्भर करेगा।

अमेरिका के सामने कितनी देर तक टिकेगा उत्तर कोरिया?

अगर अमेरिका और चीन के बीच युद्ध होता है तो उत्तर कोरिया को भी मैदान में उतरना होगा। उत्तर कोरिया ने कुछ समय पहले प्रशांत महासागर में अमेरिकी द्वीप गुआम पर हमले की धमकी दी थी। पिछले दिनों दोनों देशों के बीच तनाव काफ़ी बढ़ गया था। दोनों देशों की तरफ़ से उकसाने वाले बयान सामने आए थे। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि अगर उत्तर कोरिया ने आक्रामक व्यवहार नहीं छोड़ा तो उसे ऐसे हमले का सामना करना पड़ेगा जिसे दुनिया ने कभी नहीं देखा होगा। ट्रंप का उत्तर कोरिया पर ग़ुस्सा थमा नहीं और उन्होंने भी अमेरिका को परमाणु हथियारों को लेकर कई ट्वीट किए। तब ट्रंप को कहना पड़ा था कि  ”राष्ट्रपति के रूप में मेरा पहला आदेश है कि परमाणु हथियारों को दुरुस्त किया जाए। ये अब पहले से कहीं ज़्यादा ताक़तवर हैं। उम्मीद करते हैं कि हम लोगों को कभी इन हथियारों का इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा, लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा कि हम दुनिया के सबसे ताक़तवर राष्ट्र नहीं रहेंगे।

भारत-चीन के विवाद फिर हरे हुए 

इधर, हाल के अमेरिका-चीन तनाव को देखते हुए भारत चीन तनाव के दिनों को भी याद किया जा रहा है जब 1962 में हुए युद्ध को भी याद किया जा रहा है। इस युद्ध में भारत को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था। चीन के सरकारी मीडिया की तरफ से भारत को इस युद्ध की याद लगातार दिलवाई जा रही है। दूसरी तरफ भारत का कहना था कि 1962 से भारत बहुत आगे निकल चुका है। ऐतिहासिक तथ्य है कि 1962 के युद्ध में अमेरिका ने भारत की मदद की थी, अमेरिका के सामने 1962 में चीन की ताक़त कुछ भी नहीं थी, ऐसे में सवाल उठता है कि एक महाशक्ति की मदद पाकर भी चीन से युद्ध में भारत को हार क्यों मिली? इस सवाल पर जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में अमेरिकी, कनाडाई और लातिन अमेरिकी स्टडी सेंटर में प्रोफ़ेसर चिंतामणी महापात्रा कह चुके हैं कि  ”जब चीन ने भारत पर हमला किया उसी वक़्त अमेरिका क्यूबा मिसाइल संकट का सामना कर रहा था। सोवियत संघ ने क्यूबा में मिसाइल तैनात कर दी थी और एक बार फिर से परमाणु युद्ध की आशंका गहरा गई थी। उस वक़्त दुनिया पूरी तरह से संकटग्रस्त थी। इधर भूटान में डोकलाम सीमा पर भारत और चीन के बीच तनातनी जारी है। दोनों देशों की तरफ़ से कोई संकेत नहीं मिल रहा है कि यह तनाव कब ख़त्म होगा।

इस पूरे परिदृश्य में चीन और भारत तो दिख रहे हैं, लेकिन भूटान कहां है? क्या भूटान पूरे मामले पर खामोश है? डोकलाम सीमा पर सड़क निर्माण को लेकर भूटान ने अपनी आपत्ति जता दी है। सरहद पर चीन और भारत में तनाव के बीच भूटान भी चर्चा में है। जिस डोकलाम सीमा पर विवाद है वह भूटान और चीन के बीच है। चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने आरोप लगाया था कि भारत अपने हितों को साधने के लिए भूटान का इस्तेमाल कर रहा है। इधर ग्लोबल टाइम्स का कहना था कि भूटान की सीमा चौकी पर भारत ने बेवजह आकर टांग अड़ाई है। चीन के इस सरकारी अख़बार ने लिखा था कि  ”अतीत में चीन और भूटान सीमा पर कई घटनाएं हुई हैं. सभी का समाधान रॉयल भूटान आर्मी और चीनी आर्मी के बीच होता रहा है। इसमें कभी भारतीय सैनिकों की ज़रूरत नहीं पड़ी है। अख़बार ने आगे लिखा था कि ‘इसमें कोई शक नहीं है कि भूटान में भारतीय सैनिकों की मौजूदगी है और भूटानी आर्मी को भारत ट्रेनिंग और फंड मुहैया कराता है। भारत ऐसा भूटान की सुरक्षा के लिए नहीं करता है बल्कि ऐसा वह अपनी सुरक्षा के लिए करता है। यह भारत का चीन के ख़िलाफ़ सामरिक योजना के तहत है। भारत और चीन के बीच डोकलाम सीमा पर जारी गतिरोध को लेकर एशिया के कई देशों की मीडिया में यह मुद्दा छाया हुआ रहा था। जापानी मीडिया की नज़र भी इस गतिरोध पर बनी हुई थी। जापान के निक्केई एशियन रिव्यू ने भारत-चीन तनाव पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। निक्केई ने लिखा था कि कि दोनों देशों में सैन्य तनाव के बीच अंधराष्ट्रवाद जैसा माहौल है। निक्केई के अनुसार इस तनाव का असर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उस कोशिश पर भी पड़ेगा जो फिर से सत्ता पर काबिज होने की कोशिश कर रहे हैं। इधर

भूटान और नेपाल भारत के दो ख़ास पड़ोसी देश हैं। नेपाल से भारत के संबंधों में उतार-चढ़ाव कई बार देखने को मिले हैं। नेपाल और चीन के बीच संबंधों को लेकर भारतीय मीडिया में अक्सर ऐसी ख़बरें आती हैं कि वह भारत के मुक़ाबले चीन के ज़्यादा क़रीब जा रहा है। पिछले दिनों नेपाल चीन के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट वन बेल्ट वन रोड में भी शामिल हुआ, दूसरी तरफ़ भारत ने इसका बहिष्कार किया था। भूटान और चीन के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं, वहीं भारत और भूटान के बीच काफ़ी गहरे संबंध हैं। दोनों देशों के बीच 1949 में फ्रेंडशिप ट्रिटी हुई थी। इसके तहत भूटान को अपने विदेशी संबंधों के मामले में भारत को भी शामिल करना होता था। 2007 में इस समझौते में संशोधन हुआ था। पिछले दिनों तत्कालीन भारत के सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने कहा था कि भारतीय सेना ढाई मोर्चों पर युद्ध लड़ने के लिए तैयार है। बिपिन रावत के इस बयान को भारत समेत पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान की मीडिया में भी काफ़ी तवज्जो मिली थी।

चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा था कि बिपिन रावत ने चीन, पाकिस्तान और भारत में सक्रिय विद्रोही समूहों से युद्ध जीतने की बात कही थी। पाकिस्तान की मीडिया में भी बिपिन रावत की इस टिप्पणी ने काफ़ी सुर्खियां बटोरी थीं। आज की तारीख़ में चीन उसी तर्ज पर पूरी दुनिया में सड़कों, रेलवे लाइनों और समुद्री रास्तों का जाल बुनना चाहता है, जिसके ज़रिए वो पूरी दुनिया से आसानी से कारोबार कर सके। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस योजना से पूरी दुनिया की तरक़्क़ी की बात करते हैं. मगर, कई जानकार कहते हैं कि इस बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से चीन, सुपरपावर बनने का अपना ख़्वाब पूरा करना चाहता है। अगर चीन अपनी योजना के तहत, रेल-रोड का जाल बिछाने में कामयाब हुआ, तो इससे उसके लिए बाक़ी दुनिया से कारोबार करना काफ़ी आसान हो जाएगा। वहीं भारत समेत कई देशों के जानकार, इसे चीन की गहरी साज़िश बताते हैं।

 

Rising Bhaskar
Author: Rising Bhaskar


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