यहाँ कौन है पिता के समान
जो रहता पिता के पास, वो ही है धनवान
माँ है धरती तो पिता है सबके लिए आसमान
जग में माँ तो है ममता की जीती जागती मूरत
पिता तो साक्षात हैं पालन हार विष्णु भगवान
यहाँ कौन है पिता के समान
नित प्रातः करें माँ के साथ पिता को प्रणाम
पिता की आज्ञा का पालन करें आठों याम
अपने लिए तो वो ही माता के साथ चारों धाम
देते है जो हमें जीवन में खुशियां तमाम
पिता से होती है जग में हमारी पहचान
यहां कौन है पिता के समान
अंगुली पकड़ कर जिसने हमें चलना सिखाया
पुत्र के लिए घोड़ा बनकर अपनी पीठ पर बिठाया
हर ख्वाईश पूरी की, हर नाज भी उठाया
कभी भी नहीं अपनी मजबूरियों को दिखाया
चेहरे पर झलकी रही उनके सदा मुस्कान
यहाँ कौन है पिता के समान
दिन-रात करते रहते है वो कड़ी मेहनत
जिसकी नहीं है इस जमाने में कोई कीमत
उठा लेते हैं वो अकेले ही सारी मुसीबत
देते है वो घर परिवार में सभी को इज्ज़त
नहीं रहता उन्हें किसी बात का अभिमान
यहाँ कौन है पिता के समान
शिक्षा देते हैं और देते हैं हमें संस्कार
पिता की वजह से ही सुरक्षित है परिवार
पिता के रहते, रहता घर अपना गुलज़ार
आँखों में देखी नहीं उनके आँसुओं की धार
सच में कमाल का होता ऐसा इंसान
यहाँ कौन है पिता के समान
बाहर से कड़क और अंदर से एकदम नरम
यूँ तो रहते सदा ठंडे, कभी कभी हो जाते गरम
वो निभाते है अपने पिता होने का पूरा धरम
करते हैं वो अपने बच्चों के लिए सारे करम
उनके जीवन में सब कुछ है उनकी संतान
यहाँ कौन है पिता के समान
दोस्त भी है और गुरु भी है हमारा पिता
सच में ब्रह्मा, विष्णु और महेश है पिता
सारी जिम्मेदारियां कैसे-कैसे उठाते हैं पिता
सभी भूमिकाओं में संतान के लिए अवधेश हैं पिता
घर परिवार में सभी का कितना रखते ध्यान
यहाँ कौन है पिता के समान
रचयिता
एड एन डी निम्बावत “सागर”
जोधपुर (राज.)



