ब्लैक जस्टिस…यानी अंधा कानून…सच से साक्षात्कार
-डॉ. कपिल ककड़ ने ऐसे मुद्दे पर वेब सीरीज बनाने का साहस किया जो वाकई आज आम आदमी के जीवन को कहीं गहरे तक छूता है…अदालतों से जनमानस के हो रहे मोह भंग को उजागर कर विश्वास लौटाने की दिशा में एक सार्थक बहस को जन्म देती है-ब्लैक जस्टिस
-हिन्दुस्तान के हर व्यक्ति को यह वेब सीरीज देखनी चाहिए। खासकर बुद्धिजीवी जगत से जुड़े लोग, न्यायिक प्रणाली से जुड़े वकील, जज या ऐसे लोग जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हमारी न्यायिक प्रणाली और संविधान से जुड़े हैं उन्हें भी ब्लैक जस्टिस अवश्य देखनी चाहिए। यह सीरीज यह भी बताती है कि 50 की उम्र के बाद शरीर रोग से घिरने लगता है, ऐसे में जज भी अछूते नहीं रह सकते…देखिए पूरी रिपोर्ट-
ये हैं रिफॉर्म्स : मुख्य छह बिंदुओं पर पॉर्लियामेंट को रिकमंड
1-जजेज को मॉय लॉर्ड, योर ऑनर और योर लॉर्डशिप जैसे शब्दों से संबोधित करना बंद हो और सर या मेडम ही कहना पर्याप्त होगा।
2-प्रेयर की जगह डिमांड फॉर जस्टिस शब्दावली का उपयोग किया जाएगा।
3-लॉ कॉलेज में क्लाइंट की जगह कंस्ट्यूशन को अफॉर्ड करने का प्रशिक्षण देना चाहिए।
4-वकील अगर एविडेंस के साथ मैन्युपैलेट करते हैंं तो उन्हें संस्पेंड किया जाए और दुबारा गलती होने पर टर्मिनेट किया जाए। लॉयर के लिए Dual डिग्री जरूरी हो। सीनियर और जूनियर लॉयर बराबर हों।
5-कोर्ट 24×7 की शिफ्ट में काम करें और सरकार अतिरिक्त इन्फ्रास्ट्रक्टर की व्यवस्था करें। जजेज को एरिया स्पेशलाइजेशन के हिसाब से केस मिले। साइकोलॉजिस्ट भी जजेज को कंपनी करेंगे। इंजीनियर और विशेषज्ञ के साथ मिलकर जज फैसला करेंगे।
6-कॉलेजियम सिस्टम बंद होना चाहिए। लॉवर कोर्ट की तरह हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज को भी एग्जाम देना चाहिए। जजेज की एकाउंटेबिलिटी फिक्स हो। अगर कोई जजेज समान फैसलों में 5 बार से ज्यादा दोषी हो तो उसे पद से हटा देना चाहिए। क्लाइंट को भी वकील के साथ सुना जाना अनिवार्य किया जाए। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्ति की उम्र 45-50 और लॉवर कोर्ट में 35 वर्ष होनी चाहिए। ये सभी रिफॉर्म सरकार छह महीने में लेकर आए और 135 करोड़ भारतीयों को इसका लाभ मिले।
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
वेब सीरीज- ब्लैक जस्टिस के माध्यम से डॉ. कपिल ककड़ ने ज्यूडिशरी के स्याह पक्ष को उजागर किया है। इसके लिए एक शब्द इस्तेमाल किया गया है- लीगल टेरेरिज्म..। डॉ. कपिल ककड़ सोशल एक्टिविस्ट हैं और ज्यूडिशयरी से आम जनता के हो रहे मोह भंग और रिफॉर्म्स (REFORMS) की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसी बात को वे अपनी कविता के माध्यम से इस प्रकार कहते हैं-
गजब की अदालत है ये
अब सच को मसलने की ताकत है ये
और रौंदी हुई जिंदगियों को रौंदने की वजह है ये
कहां का सत्यमेव जयते, कहां का सत्यमेव जयते।
अदालतों में सच की चीख नहीं, गुहार नहीं पहुंचती
बस झूठ की पुकार सुनी जाती है
अब जज सबूत नहीं देखते या
कहिए देखते हैं सबूत अपने हिसाब से
कहां का सत्यमेव जयते, कहां का सत्यमेव जयते।
जो शैतान खड़े हैं तेरे दरवाजे पर बनके जमानत के खरीदार
पाकर जेल से आजादी ये क्या नहीं करेंगे मासूमों पर अत्याचार
जमानत देने से पहले साहेब कर लेना तुम विचार
नहीं तो कहां का सत्यमेव जयते, कहां का सत्यमेव जयते।
इन पंक्तियों से ब्लैक जस्टिस की शुरुआत होती है और अंत में ये ही पंक्तियां सुनाई देती हैं। सीरीज में प्रमुख पात्र जयंत पांड़े उर्फ जेपी ज्यूडिशरी में रिफॉर्म्स के लिए सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर करते हैं। जेपी की पत्नी मधु उन्हें समझाती हैं कि पीआईएल के चक्कर में नहीं पड़ें और ऐसे केस हाथ में लें जिससे इनकम हों और उनके सपने पूरे हों। मगर जेपी को आम पब्लिक की पीड़ा का भान है और देश की बिगड़ती न्याय प्रणाली के प्रति गुस्सा है। ब्लैक जस्टिस एक ऐसी वेब सीरीज है जो बताती है कि ”न्याय बाजार” बन चुका है। इस बाजार में क्लाइंट को जस्टिस मिलने की बजाय मिलती है- तारीख पर तारीख और तारीख पर तारीख। अस्पतालों में पैसे देकर इलाज तो हो जाता है मगर, जीवन भर की कमाई खोकर भी व्यक्ति को अदालतों से न्याय नहीं मिलता। वो जजों से प्रताड़ित होता है, वकीलों की धौंस सुनता है, संवेदनहीन ज्यूडिशरी से हारकर व्यक्ति आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाता है। अरुण नाम का किरदार इसका उदाहरण है, जिसके छोटे से आशियाने के सामने कोई सांसद बड़ा फार्म हाउस बनाना चाहता है और अरुण का आशियाना इसलिए गिरा देता है क्योंकि वह उसका व्यू खराब कर रहा होता है। अदालत में जज की प्रताड़ना और बार-बार तारीख मिलने से वह कंगाल हो जाता है और आखिर लॉवर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट के लिए प्रमोट हुए जज राजीव तिवारी के पुराने बंगले के सामने आत्महत्या करने का प्रयास करता है। वेब सीरीज के प्रमुख पात्र जयंत पाड़े उर्फ जेपी एक बारगी लगता है इस प्रकरण में फंस जाएंगे मगर कहानी मोड़ लेती है और जब पूरे प्रकरण में जजों की असंवेदनशीलता उजागर होती है तो वेब सीरीज का सुखद अंत होता है और सुप्रीम कोर्ट की बैंच में बैठे तीनों जज राजीव तिवारी, केपी वर्मा और सुमन नाथन इस्तीफा दे देते हैं और आदेश पारित करते हैं कि सरकार छह महीने में संसद में रिफॉर्म्स को लेकर बिल लेकर आएं।
ब्लैक जस्टिस के प्रमुख मुद्दे और तथ्य :
1-20 करोड़ लोग जेलों में सजा काट रहे हैं और अभी उन पर जुर्म अभी साबित भी नहीं हुआ।
2-देश में 20 लाख लॉयर हैं। चंद लॉयर हर 15 दिन में एक नया घर खरीदते हैं।
3-15 हजार करोड़ रुपए केंद्र व राज्य सरकारें ज्यूडिशरी पर खर्च करती हैं, जिसका पैसा आम जनता से टैक्स के रूप में वसूला जाता है।
4-60,200 केस 10 साल से, 27,800 केस 20 साल से और 5 लाख केस तीन दशक से अदालतों में पेंडिंग हैं।
5-170 देशों में न्यायिक रैंकिंग के हिसाब से भारत का 108वां नंबर है। केस सुनवाई में 18 पॉइंट में से 7.5 पाॅइंट मिले हैं। कैस मैनेजमेंट में 6 में से आधा पॉइंट मिला है। अल्टरनेट विवादास्पद फैसलों के निस्तारण में 3 में से 2 अंक मिले हैं, जिसकी आलोचना की गई है। न्यायिक प्रणाली में अफ्रीकन देशों से भी कम रैंकिंग है।
6-टाइम बाउंड जजमेंट हो। 2 साल में फैसला करना अनिवार्य किया जाए। भूमि विवाद के मामलों में 12 साल की समय सीमा खत्म की जाए और गरीबों को तकनीक की बजाय मानवीय आधार पर न्याय दिया जाए।
7-जज अगर कोई फैसला देते हैं और वकील की वजह से एविडेंस गलत दिया जाता है या एविडेंस छूट जाता है तो उसका फैसले में उल्लेख किया जाए।
8-फैमिली कोर्ट जैसे मामलों में माता-पिता के झगड़ों में 18 साल के बच्चों को उनकी मर्जी पर माता-पिता के साथ रहने के फैसले नहीं लेने दें। क्योंकि जब 18 साल के बच्चों को वोट का अधिकार नहीं है तो वे इतने परिपक्व नहीं होते कि माता-पिता के झगड़ों में सशक्त फैसले ले सकें।
9-50 साल की उम्र में व्यक्ति आमतौर पर बीमार होना शुरू हो जाता है। जज भी इससे अछूते नहीं होते। ऐसे में 58 साल की उम्र में जजों को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी रिटायर किया जाए।
10-फैमिली झगड़ों के मामलों में साइकोलॉजिस्ट की मदद ली जाए। जब एक काउंसलर को 4-5 घंटे मामला समझने में लगता है तो जज 30-45 मिनट की हियरिंग में बच्चों की कस्टडी कैसे दे सकते हैं?
रिफॉर्म्स पर फैसला, तीनों जजों का का इस्तीफा और भावपूर्ण डायलॉग्स :
जस्टिस सुमन रंगनाथ : हम क्षमाप्रार्थी हैं उन सबके जिन्होंने हमारी वजह से सफर किया
”इस देश के संविधान ने हम ज्यूडिशरी के ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी डाली थी, जिसे शायद कुछ जजेज अनफार्चुनेटली निभा नहीं पाए। अगर हमने इसे ठीक से निभाया होता तो इस देश में इतना इनजस्टिस, इतने पेंडिंग केसेज नहीं होते। हुआ यह कि कुछ जजेज अपने ईगो ट्रिप्स पर चले गए। जब हमें किसी ने कुछ नहीं कहा तो आहिस्ता आहिस्ता 75 सालों में जजेज के ईगो का दायरा बढ़ने लगा। कई बार हमने पॉवर की सीमाएं लांघी। जिन विषयों में हमें नहीं जाना था, हम उनमें भी गए और जिन विषयों में हमें जाना था उनमें हम गंभीरता से नहीं गए। या कहें कि शायद उसके बारे में हमारी नॉलेज नहीं थी या कहिए कि काबिलियत नहीं थी या मेहनत करने आदत नहीं थी। हमने इन सभी चीजों को इग्नोर किया, क्योंकि कहीं न कहीं हमने अपने आपको छोटा खुदा मानना शुरू कर दिया। हम चलते गए। रास्ते बनते गए। अनफार्चुनेटली गलत रास्ते बनते गए। हमारे आगे के जनरेशन वाले जजेज भी इन्हीं रास्तों पर चलते रहे और पॉलिटिकल पार्टी और पर्सनली रिश्तों को तवज्जो देते गए। कुछ ने तो अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए बहुत काम किया। लेकिन हम भूल गए कि हमारा लक्ष्य संविधान के अनुसार सोशल जस्टिस था। उनको हम पीछे छोड़ते आए और हमने खुद को ज्यूडिशरी मानना शुरू कर दिया जबकि हम उसके मात्र अंग थे। हमारा काम कानून के न्याय को इम्पीमेंट करना था। जिस तरह ब्यूरोक्रसी और पॉलिटिक्स दलदल में फंसते गए हम भी कहीं न कहीं भटक गए। हम क्षमाप्रार्थी हैं। हम क्षमाप्रार्थी हैं उनसे जिन्होंने हमारी वजह से सफर किया। हम क्षमाप्रार्थी हैं उनसे जिन्होंने हमारे ईगो की वजह से सफर किया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में रिटायरमेंट की उम्र 65 साल है और मेरा 1 साल बाकी है। लेकिन इस पीआईएल को सुननते के बाद मुझे यह अहसास होने लगा है कि मैंने अपने हेल्थ ईश्यू के बावजूद ज्यूडिशरी का इस्तेमाल करते हुए अपना फायदा देखते हुए इस कुर्सी पर बैठी रही। आज मेरी आंखें खुल गई है और मेरी सोच बदल गई है। मैं अपने पद से इस्तीफा देती हूं।” इतना कहते हुए जस्टिस सुमन रंगनाथ भावुक हो जाती है।
जस्टिस तिवारी : अपनी अंतरआत्मा की आवाज सुनता हूं और जजशिप छोड़ता हूं
” मिस्टर जेपी। तुमने अरुण की बात ऑफ दी रिकॉर्ड जरूर कही थी, लेकिन इस केस को लेकर मैं अरुण की बात ऑन रिकॉर्ड कहता हूं। मेरी अंतरआत्मा यहां बैठने का अधिकार नहीं देती। जिस तरह एक व्यक्ति के साथ उसके इत्र की खुशबू साथ चलती है। अरुण का केस इकलौता केस नहीं होगा, कई लोग मेरी वजह से सफर कर रहे होंगे या सफर किया है। इसका कोई प्रायश्चित तो नहीं है। पर मैं अपनी अंतरआत्मा की आवाज सुनता हूं और जजशिप की कुर्सी छोड़ रहा हूं।” पूरी वेब सीरीज में अक्खड़ स्वभाव और विपरीत दिशा में चलने वाले जज में यह बदलाव भावपूर्ण दृश्य होता है।
जस्टिस वर्मा : तीनों इस्तीफा देते हैं, पॉर्लियामेंट को रिफॉर्म्स के लिए रिकमंड करते हैं
”पिछले 75 सालों से मेरी फैमिली के कई जजेज यहां आए। यहां आना हर किसी का सपना होता है। लेकिन मैं फार्चुनेट था। मेरी फैमिली के लोग यहां जजमेंट देते रहे थे। लेकिन क्या उस कॉन्ट्रेक्ट के चलते मेरा यहां बैठना जायज है? पता नहीं? लेकिन अगर रिफॉर्म्स लाना ही तो मुझे इस कुर्सी से उठकर सबसे पहले रिफॉर्म्स की शुरुआत करनी चाहिए। इसीलिए हम तीनों जज इस्तीफा दे रहे हैं। साथ ही हम पॉर्लियामेंट को रिकमंड करते हैं कि ये सारे रिफॉर्म्स जल्दी से जल्दी लेकर आएं और 135 करोड़ जनता को इसका लाभ मिले।
काश! ये वेब सीरीज ही होती, पर भारत की हकीकत भी कुछ ऐसी ही है, क्या रिफॉर्म्स आएगा? सवाल…? कौन करेगा पहल?…
ब्लैक जस्टिस कहने को एक वेब सीरीज है…। काश! ये वेब सीरीज ही होती। लोग इसे फिल्म की तरह देखते। मगर कहीं न कहीं यह भारतीय ज्यूडिशरी की दुखती रग पर हाथ रखने का प्रयास है। आज हर आदमी न्याय प्रणाली या कहें लीगल टेरेरिज्म से पीड़ित हैं…। इस दूषित न्याय प्रणाली के मूल में जाने की जरूरत है। वेब सीरीज में जो सवाल उठाए गए हैं उससे इतर भी कई सवाल हैं, जिस पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। यह वेब सीरीज तो एक पहल भर है…असल समस्या इससे भी गंभीर है…। आने वाला समय बडा विकट है, चुनौतियों से भरा है…प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस दिशा में सोचना होगा और इस वेब सीरीज को एक फिल्म की तरह एंटरटेनमेंट का माध्यम ना मानकर ब्लैक जस्टिस के बिंदुओं के साथ जस्टिस करने की जरूरत है…।









