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Thursday, April 30, 2026, 11:49 am

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भारत के पांच शीर्ष एम्स मिलकर ”कृत्रिम मस्तिष्क” प्रोजेक्ट पर कर रहे काम, आने वाले 10 साल में मृत्यु पर विजय संभव

भारत के उत्तरोत्तर बढ़ते हुए जीवविज्ञान, न्यूरोसाइंस और कृत्रिम-बुद्धिमत्ता क्षेत्रों में एक ऐसी परियोजना ने दुनिया की निगाहें खींच ली हैं, जिसे कई लोग “मृत्यु के बाद पुनरुत्थान” का प्रथम कदम कहते हैं।

डीके पुरोहित. नई दिल्ली

सबकुछ ठीक रहा तो आने वाले दस सालों में भारत के वैज्ञानिक कृत्रिम मस्तिष्क बना लेंगे। इसके लिए एम्स दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और बेंगुलुरु के विशेषज्ञ मिलकर काम कर रहे हैं। भारत के उत्तरोत्तर बढ़ते हुए जीवविज्ञान, न्यूरोसाइंस और कृत्रिम-बुद्धिमत्ता क्षेत्रों में एक ऐसी परियोजना ने दुनिया की निगाहें खींच ली हैं, जिसे कई लोग “मृत्यु के बाद पुनरुत्थान” का प्रथम कदम कहते हैं।

पांच प्रतिष्ठित All India Institutes of Medical Sciences (AIIMS) — दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और बेंगलुरु — ने मिलकर “आत्मा-संगम” नामक एक गुप्त कृत्रिम मस्तिष्क (Artificial Brain / Neuro-Reanimation) परियोजना शुरू की है। इस परियोजना का लक्ष्य है:

एक व्यक्ति की जीवित अवस्था में मस्तिष्क की पूरी कोशिकीय संरचना स्कैन करना, और मृत्यु के बाद उसी संरचना की कृत्रिम कोशिकाएं तार / माइक्रो-न्यूरॉन तंत्र द्वारा मृत मस्तिष्क में स्थापित करना, तथा चुंबकीय / विद्युत ऊर्जा द्वारा मस्तिष्क को पुनः सक्रिय करना।

परियोजना टीम का दावा है कि यदि सब कुछ ठीक तरह से हो गया, तो आने वाले दस वर्षों में यह संभव हो सकता है कि “चेतना (consciousness)” को किसी हद तक पुनर्स्थापित किया जा सके — यानी मृत को फिर से “सचेत अवस्था” में लाया जाए।

पृष्ठभूमि: क्यों यह परियोजना इतनी महत्वाकांक्षी है

मस्तिष्क-विज्ञान, तंत्रिका नेटवर्क और कंप्यूटेशनल न्यूरोसाइंस के क्षेत्रों ने पिछले दो दशकों में अभूतपूर्व प्रगति की है। आज अनेक शोध दल whole-brain emulation (पूरे मस्तिष्क का डिजिटल मॉडलिंग) की दिशा में काम कर रहे हैं।

भारत में भी, IISc, CeNSE जैसे संस्थानों ने “ब्रेन-ऑन-चिप” तकनीक और न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग पर काम शुरू किया है, जिसमें सिलीकोन-आधारित घटकों द्वारा न्यूरोन जैसे व्यवहार का अनुकरण किया जाता है। इसके अलावा, भारत और यूके के वैज्ञानिकों ने मिलकर मस्तिष्क स्वास्थ्य, डिमेंशिया और तंत्रिका रोगों पर अनुसंधान को तेज करने के लिए साझेदारी भी बनाई है।

पर इन सब अनुसंधानों की तुलना में “मृत्यु के बाद पुनरुत्थान” का विचार उन सीमाओं को चुनौती देता है जिन्हें आज विज्ञान ने स्थापित किया है — जीवन-रसायन, कोशिकीय मरम्मत, तर्क-प्रक्रिया और चेतना स्वयं।

प्रक्रिया का प्रस्तावित चित्र
  1. पूर्व-मरणीय स्कैन (Pre-mortem Scan):
    जब व्यक्ति स्वस्थ अवस्था में हो, उसे एक अत्यंत उच्च-रिज़ॉल्यूशन मैग्नेटिक / इलेक्ट्रॉनिक स्कैन दिया जाएगा। यह स्कैन केवल मस्तिष्क की संरचना ही नहीं, बल्कि हर न्यूरॉन, हर सिनैप्स, प्रोटीन-स्थिति, आयन वोल्टेज आदि माइक्रोस्ट्रेट्स का विवरण भी एकत्र करेगा।

  2. मृत्यु और तत्काल हस्तांतरण:
    व्यक्ति की मृत्यु होते ही, एक “न्यूरो-मायक्रो-प्रोटोटाइप” वाहक (carrier) तत्काल तैयार रहेगा — जिसमें अति-बारिक तारों, कृत्रिम न्यूरॉन्स और माइक्रो-इम्प्लांट सिस्टम होंगे।
    यह वाहक मृत मस्तिष्क को खोलकर उस स्कैन डेटा के अनुरूप तारों / कृत्रिम कोशिकाओं को जोड़ देगा — लगभग “ब्रेन एक्सटेंशन/इम्प्लांट” की तरह।

  3. ऊर्जा और चुंबकीय / विद्युत सिंक्रनाइजेशन:
    इस इम्प्लांट सिस्टम को चुंबकीय ऊर्जा या अत्यंत नियंत्रित विद्युत पद्धति से सक्रिया (activation) करना होगा।
    परियोजना टीम दावा करती है कि इस चुंबकीय/विद्युत ऊर्जा को मूल न्यूरॉन तंत्रों से सिंक्रनाइज़ कर दिया जाए, ताकि पूरी संरचना जैसे मूल मस्तिष्क हो जाए।

  4. प्रारंभिक परीक्षण और “रिजर्वेशन मोड” (Suspended Animation):
    शुरुआती परीक्षण न्यूरॉन माप (electrophysiology) और बहुत सीमित संकेत-प्रतिक्रिया मापने पर होंगे — जैसे कुछ प्रारंभिक संवेदनाएं (light, touch) और न्यूरोन उत्तर (evoked potentials)।
    यदि चरण सफल रहा, तो वैज्ञानिक अगले टैस्ट में “माइंड एक्टिवेशन मोड” शुरू करेंगे — यानी मस्तिष्क को न्यूरो-सिग्नलिंग स्तर पर सक्रिय करना।

तकनीकी चुनौतियां और आलोचनाएं

इस परियोजना को पूरा करने के लिए अनेक अतुलनीय चुनौतियां हैं:

चुनौती विवरण
मृत्युतः कोशिका पतन (Post-mortem decay) मृत्यु के तुरंत उपरांत कोशिकाएं ऑटोलीसिस, झिल्ली क्षय और ऑक्सीकरण प्रक्रिया शुरू करती हैं — इन क्षति को रोकना अविलम्ब संभव नहीं।
स्टेट (State) नकल की जटिलता सिर्फ संरचना (connectome) ही नहीं, बल्कि हर न्यूरॉन की वर्तमान आयन स्थिति, प्रोटीन संशोधन, रसायन-स्थिति आदि को भी दोहराना पड़ेगा — यह विज्ञान अभी समर्थ नहीं।
ऊर्जा / सिंक्रनाइज़ेशन बिजली या चुंबकीय ऊर्जा देने से न्यूरॉन्स को “सक्रिय” करना एक बात है, उन्हें सटीक समयबद्ध विद्युत और रासायनिक संकेत देना दूसरी।
चेतना की निरंतरता (Continuity of Consciousness) यदि सफल पुनरुत्थान हुआ — क्या उस व्यक्ति की वही चेतना, वही अनुभव लौटेगी, या एक “कॉपी” ही बनेगी? यह दार्शनिक प्रश्न है।
नैतिक और कानूनी पक्ष मृतक सहमति, मानवाधिकार, प्रयोगात्मक सुरक्षा, निजी पहचान आदि मुद्दे उठेंगे।

इसी तरह, अनेक वैज्ञानिक आलोचक यह कहते हैं कि यह प्रोजेक्ट साइंस फिक्शन के दायरे में अधिक है — क्योंकि अभी उच्च स्तरीय मल्टी-स्तरीय मस्तिष्क सिमुलेशन (molecular + network + behavior) तक जाना बाकी है।

टीम का विश्वास और समयरेखा

परियोजना के पीछे काम कर रही टीम का मानना है कि आवश्यक प्रारंभिक अवधान लगभग 5–7 वर्ष में पूरा हो सकता है — अर्थात, न्यूरॉन इम्प्लांट सिस्टम व प्रोटोटाइप हार्डवेयर तैयार करना।
इसके बाद अगले 3 वर्ष तक “चेतना पुनरुत्थान” पर काम किया जाना है — यानी कुल मिलाकर 10 वर्ष की समयरेखा रखी गई है।

टीम के मुखिया (बदला हुआ नाम: डॉ. आर्यन बच्चन, AIIMS दिल्ली न्यूरोसाइंस विभाग) कहते हैं:

“हम अभी विज्ञान की सीमाओं को टटोल रहे हैं। हमारी योजना है कि नाम मात्र की संवेदी प्रतिक्रियाएं सफल होने पर सार्वजनिक मॉड्यूल निर्माण किया जाए — लेकिन ‘पूर्ण चेतना’ को पुनर्स्थापित करना एक अंतिम लक्ष्य है।”

उनका कहना है कि यदि यह सफल हुआ, तो यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति होगी — मृत्यु, बीमारी और मस्तिष्क विकारों पर मानव को नियंत्रण देने वाला कदम।

प्रतिक्रिया, विवाद और सामाजिक असर

इस परियोजना के बारे में विभिन्न वर्गों की प्रतिक्रियाएं मिली जुली हैं:

  • वैज्ञानिक जगत:
    कुछ न्यूरोसाइंटिस्ट्स और कम्प्यूटेशनल न्यूरोलॉजिस्ट इसे “बहुत अधिक दावों वाला” परियोजना मानते हैं — क्योंकि वर्तमान न्यूरोसाइंस मूलभूत प्रश्न (चेतना कैसे उत्पन्न होती है) का उत्तर नहीं दे सका है।
    वहीं, कुछ शोधकर्ता इसे “ड्रेग ऑन द हेडलाइन” कहते हैं — अर्थात् यदि सार्वजनिक दबाव और फंडिंग आए, तो जल्दबाजी में त्रुटियां हो सकती हैं।

  • दर्शन/नैतिक जगत:
    यदि पुनरुत्थान संभव हो गया, तो “मृत्यु” की धारणा, आत्मा की अवधारणा और “जीवन-अधिकार” जैसे प्रश्न गहन होंगे। क्या पुनरुत्थान व्यक्ति की संतुष्टि देगा, या वह केवल शरीर का रिबूट होगा?
    मृतक की सहमति और परिवार की स्वीकृति, पहचान और कानूनी स्थिति — कई जटिल विवाद होंगे।

  • सार्वजनिक दृष्टि:
    मानव जीवन-काल बढ़ना, मृत्यु का “मृत्यु-पूर्व चेतना” में विनिमय, इमरजेंसी में पुनरुत्थान — ये विचार समाज, धर्म और संस्कृति को हिला सकते हैं।

विज्ञान कथा या भविष्य की वास्तविकता?

आज भारत की इस परियोजना वैज्ञानिक विचारधारा की सबसे दूर की सीमाओं में खड़ी है।
लोग इसे काल्पनिक कहेंगे; skeptics कहेंगे कि यह कभी नहीं हो सकेगा; पर इस तरह की महत्वाकांक्षाएं ही वैज्ञानिक यात्रा को आगे बढ़ाती हैं।

यदि आने वाले दशक में विज्ञान, इंजीनियरिंग, न्यूरोप्लास्टिसिटी और कंप्यूटेशनल न्यूरोसाइंस इतना प्रगति कर लें कि मृत व्यक्ति में मस्तिष्क पुनरुत्थान संभव हो जाए — तो मानवता न केवल मृत्यु को देखेगी, बल्कि इसका प्रतिरोध भी कर पाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि एक प्रश्न शेष रहेगा — क्या “जीवन” केवल संरचना, संकेत और ऊर्जा है, या कुछ अधिक है — ऐसा कुछ जिसे विज्ञान अभी नाप नहीं सकता?

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor