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Friday, May 1, 2026, 2:55 pm

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देव दिवाली और गुरुनानक देव जयंती आज, दीपमालिकाएं सजेंगी, मंदिरों में रहेगा उजास, गुरुद्वारों में होगी विशेष अरदास

पूजा-आरती या दीपदान (प्रदोषकाल) का शुभ समय: लगभग शाम 5:15 वजे से शाम 7:50 वजे तक माना गया है।

राखी पुरोहित. जोधपुर

बुधवार, 5 नवंबर को दो महत्वपूर्ण धार्मिक-त्योहार एक साथ मनाए जा रहे हैं। एक ओर है हिंदू धर्म में प्रसिद्ध उत्सव “देव दिवाली” (जिसे “देव दीपावली” भी कहा जाता है) और दूसरी ओर है सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी की जयंती (गुरु पुरब) — दोनों ही अपनी-अपनी परंपराओं, महत्त्वों और सामाजिक संदेशों के कारण आज विभिन्न रूपों में मनाए जा रहे हैं। इस अवसर पर दीपमालिकाएं सजेंगी, मंदिरों में उजास रहेगा और गुरुद्वारों में विशेष अरदास की जाएगी।

देव दिवाली: देवताओं की दिवाली

हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह की पूर्णिमा तिथि पर यह त्योहार मनाया जाता है। इस वर्ष यह बुधवार, 5 नवंबर को है।

समय-मुहूर्त:
– पूर्णिमा तिथि शुरू: 4 नवंबर 2025 रात 10:36 वजे। 
– तिथि समाप्त: 5 नवंबर 2025 शाम 6:48 वजे। 
– पूजा-आरती या दीपदान (प्रदोषकाल) का शुभ समय: लगभग शाम 5:15 वजे से शाम 7:50 वजे तक माना गया है।

क्या मनाते हैं:

मान्यता है कि इस दिन देवता गंगा पुत्रों के घाटों पर उतरते हैं और पृथ्वी लोक पर दीपदान करते हैं। विशेष रूप से वाराणसी के घाटों पर लाखों-लाख दीप जगमगा उठते हैं और गंगा आरती का भव्य दृश्य देखने को मिलता है। इसके अलावा, पौराणिक कथा है कि इस दिन शिव ने राक्षस त्रिपुरासुर का वध किया था, इस विजय समारोह के प्रतीक के रूप में यह उत्सव मनाया जाता है।

सरोवरों पर होगा दीपदान :

देव दिवाली के मौके पर शहर के सरोवरों के किनारे दीपदान होगा। सरोवर मिट्टी के दीपों की रोशनी से वातावरण जगमगा उठेंगे। लोग रात के समय घाटों पर, चांदनी में, दीपों के बीच खड़े होकर आरती, भजन-कीर्तन करते हैं। इस दृश्य को देखने के लिए श्रद्धालु भी आते हैं। देव दिवाली सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं है — यह पर्यटन, घूमने-घेरने और स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी एक अहम भूमिका निभाता है।

गुरु नानक जयंती (गुरु पुरब)

सिख धर्म में अत्यंत महत्त्वपूर्ण यह पर्व गुरु नानक देव जी की जन्म-जयन्ती के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष यह भी 5 नवंबर 2025 को है। गुरु नानक देव जी का जन्म सिख परंपरा में सर्वप्रथम गुरु के रूप में माना जाता है। उनका जीवन, प्रवचन और शिक्षाएँ — जैसे ‘एक ओंकार’, ‘नाम सिमरन’, ‘सेवा’ — सिख धर्म एवं लगातार आध्यात्मिक जागरुकता के केन्द्र में हैं।

उत्सव की रूपरेखा:

– गुरुद्वारों में भजन-कीर्तन, गुरबाणी पाठ, लंगर (सामुदायिक भोजन) का आयोजन।
– नगर कीर्तन, प्रकाश पर्व, दीप जलाना और सेवा-कार्य जैसे पहलुओं पर बल। 
– इस वर्ष यह 556वीं जयंती है।

दोनों उत्सवों का संगम: अर्थ एवं संदेश

यह तथ्य कि आज दोनों-उत्सव एक ही तिथि पर हैं — देव दिवाली तथा गुरु नानक जयंती — अपने आप में बहुप्रतीक हैं:

  • उजाले-दीप, श्रद्धा-भक्ति, सहयोग-सेवा और आध्यात्मिकता का एक-साथ पुट।

  • “प्रकाश”-कान्सेप्ट: देव दिवाली में दीपों के प्रकाश से अंधकार/अज्ञान को मिटाने की प्रतीकात्मकता है; गुरु नानक जयंती में गुरु-प्रकाश से मनुष्य के भीतर जागरण, आत्म-विकास का सन्देश है।

  • विविध धर्म-परम्पराओं का साथ साथ चलना, सामाजिक विविधता का उत्सव।

  • दोनों-उत्सव हमें अनुशासित जीवन, सेवा-भाव, सद्-चिंतन और स्व-परिवर्तन की ओर प्रेरित करते हैं।

भक्ति-सेवा, परंपरा और संस्कार साकार होंगे : 

सरोवर के घाटों पर दीपों की कतार और कतारों में श्रद्धालुओं का अर्न्तमनोरथ, तथा गुरुद्वारों में लंगर, स्वयंसेवकों की तैनाती — ये दृश्य आज कई स्थानों पर देखने को मिलेंगे। सांझ होते ही सरोवर के घाटों पर दीपों और आरती की रोशनी फैलती है, हवा में घी-दीपों की खुशबू, भजन-धुन में श्रद्धा। वहीं, गुरुद्वारों के प्रांगण में न सिर्फ संगठित कार्यक्रम होते हैं, बल्कि छोटे-बड़े स्वयंसेवक लंगर में कतार में खड़े रहते हैं।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor