(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की अड़तीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
आत्मीय साधकों,
आज का विषय अत्यंत सूक्ष्म भी है और अत्यंत महत्त्वपूर्ण भी—“अभिमान आने से नया विकास रुक जाता है।”
जीवन में मनुष्य कितनी भी ऊँचाइयाँ छू ले, कितनी ही विद्या, धन, पद या शक्ति प्राप्त कर ले, यदि मन में अभिमान प्रवेश कर जाए, तो उसका विकास उसी क्षण थम जाता है। अभिमान वह अदृश्य दीमक है जो भीतर ही भीतर व्यक्ति की क्षमता, विनम्रता और आध्यात्मिक प्रगति को खा जाता है।
अभिमान क्या है?
अभिमान वह मानसिक अवस्था है जिसमें मनुष्य स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। “मैं ही बड़ा हूँ”, “मुझे सब आता है”, “मुझसे बेहतर कोई नहीं”— जब ऐसे विचार मन में आने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि विकास की राह पर एक बड़ा पत्थर आकर खड़ा हो गया है। अहंकार हमें अंधा कर देता है। संसार के अनंत ज्ञान, अनुभव और संभावनाओं को देखने की दृष्टि ही नष्ट हो जाती है।
शास्त्रों में अभिमान का परिणाम
भगवद्गीता का दृष्टिकोण
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“अहंकार विनाश का द्वार है।”
अहंकारी व्यक्ति सत्य को स्वीकार नहीं करता, मार्गदर्शन नहीं लेता, और अंततः अपने ही भ्रमों में उलझकर गिर जाता है।
उपनिषदों का संदेश
उपनिषद कहते हैं—
“विद्या विनयसहित होती है। विनय हो तो ज्ञान बढ़ता है, और अभिमान हो तो ज्ञान नष्ट होता है।”
अर्थ स्पष्ट है— जैसे मिट्टी को柔 (नरम) रखो तो बीज अंकुरित होता है, वैसे ही मन को विनम्र रखो तो ज्ञान फलता-फूलता है। अहंकार मन को कठोर बना देता है।
महापुरुषों के जीवन से उदाहरण
श्री राम का चरित्र— विनम्रता में विश्व-विजय
श्री राम जैसे सर्वश्रेष्ठ योद्धा, सर्वश्रेष्ठ राजा और सर्वश्रेष्ठ मानव होने के बाद भी उनमें अहंकार का लेश नहीं था।
उन्होंने कभी अपने गुणों का घमंड नहीं किया, इसी कारण सबके प्रिय हुए और आज भी “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहलाते हैं।
विनम्रता के कारण ही उनका विकास— आध्यात्मिक, पारिवारिक, सामाजिक— हर दिशा में होता गया।
रावण का उदाहरण— ज्ञान था, पर अभिमान ने गिराया
रावण जितना विद्वान, उतना शायद ही कोई था। उसने वैदिक विद्या, शिव-तत्व, संहिता—all mastered.
लेकिन…
अभिमान ने उसकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया।
जिस दिन अहंकार बढ़ा, उसी दिन उसका विनाश सुनिश्चित हो गया।
ज्ञान होने पर भी विनम्रता न हो तो विकास नहीं, विनाश होता है।
महाभारत का कौरव-पक्ष— अभिमान की पराकाष्ठा
दुर्योधन ने सिर्फ अभिमानवश कृष्ण के संदेश, बड़ों की सीख और मित्रों की सलाह तक ठुकराई।
अभिमान ने उसे सीखने, बदलने और सत्य देखने से रोक दिया।
और परिणाम— विनाश, हानि और संसार से अपमानित विदा।
बुद्ध का जीवन— विनम्रता ही ज्ञान का मार्ग
गौतम बुद्ध ने कहा—
“जिसे लगता है कि वह पहुंच गया, वही सबसे पीछे रह जाता है।”
जो व्यक्ति स्वयं को पूर्ण समझ लेता है, वह सीखने के द्वार बंद कर देता है।
अभिमान वहीं पैदा होता है जहाँ ज्ञान ठहर जाता है।
अभिमान क्यों रोक देता है विकास?
सीखने की क्षमता खत्म हो जाती है
अहंकारी व्यक्ति मानता है कि उसे सब पता है।
और जो सीखना बंद कर देता है, उसका विकास स्वतः रुक जाता है।
दूसरों की बात सुनना बंद कर देता है
विनम्रता सुनने की कला सिखाती है, ahankār सुनने की दीवार खड़ी कर देता है।
जो सुनता नहीं, वह समझता नहीं— और जो समझता नहीं, वह आगे नहीं बढ़ता।
गलतियां दिखाई नहीं देतीं
अभिमानी व्यक्ति अपनी त्रुटियों को देख ही नहीं पाता।
जैसे धूल लगे दर्पण में चेहरा साफ नहीं दिखता—
वैसे ही अहंकार से ढके मन में सत्य नहीं दिखता।
संबंध और सहयोग टूटने लगते हैं
अहंकार से लोग दूर हो जाते हैं।
और अकेला व्यक्ति चाहे कितना भी सक्षम हो, उसका विकास धीमा हो जाता है।
आध्यात्मिकता का द्वार बंद हो जाता है
अहंकार “मैं” को बड़ा करता है जबकि अध्यात्म “मैं” को मिटाने की साधना है।
दोनों विपरीत दिशाओं में चलते हैं।
अहंकार है तो शांति नहीं, शांति नहीं तो प्रगति नहीं।
आधुनिक जीवन के उदाहरण
Corporate world
कई लोग पद पर पहुँचते ही सोच लेते हैं कि वे अंतिम सत्य हैं।
टीम की सलाह, जूनियर के सुझाव, या किसी विशेषज्ञ की बात को तुच्छ समझते हैं।
पर इतिहास बताता है—
बड़े-बड़े CEOs अभिमान के कारण गलत निर्णयों से अपने कंपनियों को नीचे ले गए।
विज्ञान और शोध में अहंकार
अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था—
“मेरी खोजें इसलिए बढ़ीं क्योंकि मैं ‘जानता हूँ’ से ज्यादा ‘जानना चाहता हूँ’ पर ध्यान देता था।”
जो जानने की इच्छा छोड़ देता है, वह रुक जाता है।
अभिमान दूर करने के उपाय
कृतज्ञता का अभ्यास
हर रात 3 बातें लिखें—
“आज मुझे किन-किन बातों के लिए आभार महसूस हुआ?”
कृतज्ञता अहंकार को पिघला देती है।
गुरु या बड़ों से परामर्श
विनम्रता वहीं से आती है जहाँ मार्गदर्शन स्वीकार किया जाए।
अपनी गलतियों को स्वीकार करने की शक्ति बढ़ाएँ
जिसे अपनी भूलें दिखने लगें, वह कभी घमंडी नहीं हो सकता।
सेवा की भावना अपनाएँ
सच्चे महापुरुषों का विकास इसलिए होता है क्योंकि वे “सेवा” को अपने जीवन का मूल मानते हैं।
आत्मचिंतन
दिन के अंत में पूछें—
“आज किस समय मेरे भीतर अहंकार आया?”
यह प्रश्न ही आपको बदलना शुरू कर देगा।
सौ बातों की एक बात— अभिमान रोकता है, विनम्रता बढ़ाती है
साधकों…
यह संसार ज्ञान का समंदर है, अवसरों का आकाश है।
जो स्वयं को छोटा मानकर सीखता है, वह बढ़ता है।
जो स्वयं को बड़ा मानकर रुक जाता है, उसका विकास सूख जाता है।
अभिमान मनुष्य का सबसे बड़ा अवरोध है।
और विनम्रता मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति।
जो झुकता है वही आगे बढ़ता है।
जो कठोर होता है, टूट जाता है।
अतः जीवन में उन्नति, शांति और आध्यात्मिक उत्थान चाहें,
तो हमेशा याद रखें—
“अभिमान आए तो समझ लेना, विकास रुक रहा है…
और विनम्रता आए तो समझ लेना, ईश्वर आगे बढ़ा रहा है।”
शुभाशीष।
Author: Dilip Purohit
Group Editor









