– सेवा-सादगी और संस्कारों की अनुकरणीय परंपरा का प्रेरक उदाहरण।
– मृत्यु भोज नहीं किया गंगा प्रसादी में केवल एक मिठाई
शिव वर्मा. जोधपुर
समाजसेवा, शिक्षा और मानव कल्याण के क्षेत्र में जोधपुर सारस्वत समाज से एक अत्यंत प्रेरणादायी और विचारोत्तेजक पहल सामने आई है, जिसने सामाजिक परंपराओं को नई दिशा देने का कार्य किया है। पूर्व महापौर घनश्याम ओझा द्वारा अपनी दिवंगत धर्मपत्नी स्वर्गीय शांति देवी ओझा की स्मृति में विभिन्न सामाजिक, शैक्षणिक एवं सेवा संस्थाओं को कुल 51 लाख रुपये का समर्पण किया गया।
यह पहल केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि सेवा, सादगी, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व की एक नई परंपरा का सशक्त संदेश भी देती है। स्वर्गीय शांति देवी ओझा अत्यंत उच्च संस्कारों वाली, सरल, करुणामयी और स्नेहमयी महिला थीं। उनका संपूर्ण जीवन मानव सेवा, शिक्षा और परोपकार को समर्पित रहा। वे सदा आडंबर से दूर रहकर सादगीपूर्ण जीवन जीने में विश्वास रखती थीं। उनके जीवन मूल्यों और विचारों को आगे बढ़ाते हुए, ओझा परिवार द्वारा मरणोपरांत किया गया यह व्यापक सामाजिक समर्पण, उनके लौकिक एवं पारलौकिक जीवन दोनों को ही सार्थक बनाता है।
इस अवसर पर समाजहित में कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गईं। जोधपुर के मथुरादास माथुर अस्पताल के एक वार्ड को जोधपुर मानव सेवा ट्रस्ट के माध्यम से गोद लेकर उसका संपूर्ण रिनोवेशन करवाया जाएगा, जिसके लिए 25 लाख रुपये की राशि समर्पित की गई है। इससे अस्पताल में उपचार हेतु आने वाले जरूरतमंद मरीजों को बेहतर, स्वच्छ और आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हो सकेंगी। यह निर्णय मानवीय संवेदनाओं और सेवा भावना का सशक्त प्रतीक है।
इसी क्रम में जोधपुर स्थित सारस्वत समाज भवन के विकास हेतु 15 लाख रुपये की घोषणा की गई। इस राशि से 25 टन एसी, इको सिस्टम सेटअप, वॉल पेंटिंग, माइक व्यवस्था सहित विभिन्न विकास कार्य किए जाएंगे, जिससे समाज भवन और अधिक सुविधाजनक, आधुनिक और उपयोगी बन सकेगा।
शिक्षा के क्षेत्र में भी इस अवसर पर उल्लेखनीय योगदान दिया गया। समाज के योग्य एवं होनहार विद्यार्थियों की उच्च शिक्षा हेतु सारस्वत शिक्षा विकास संस्थान ट्रस्ट को एक लाख 51 हजार रुपये की सहायता राशि प्रदान की गई। इसके अतिरिक्त लव कुश संस्थान एवं दिव्य लोक संस्थान को एक-एक लाख रुपये, बाल बसेरा संस्थान को 51 हजार रुपये, लायंस क्लब को 21 हजार रुपये तथा आई बैंक सोसाइटी को 11 हजार रुपये की सहायता राशि के चेक सौंपे गए। यह सहयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में समाज को आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इस संपूर्ण कार्यक्रम की सबसे प्रेरक और अनुकरणीय विशेषता यह रही कि ओझा परिवार ने सामाजिक आडंबरों से पूर्णतः दूरी बनाए रखी। स्वर्गीय शांति देवी ओझा की स्मृति में मृत्यु भोज का आयोजन नहीं किया गया। गंगा प्रसादी के अवसर पर केवल एक मिठाई बनाकर प्रसादी ग्रहण करवाई गई
पैरावनी के तौर पर भी केवल पगड़ी और सौ रुपये स्वीकार किए गए। ओढ़ावनी पैरावनी जैसी रूढ़ी परंपराओं को त्यागकर समाज को स्पष्ट संदेश दिया गया कि सच्ची श्रद्धांजलि दिखावे में नहीं, बल्कि सेवा और संवेदना में होती है।
यह पहल समाज में सादगी, स्वच्छता, संयम और संस्कारों से जुड़ी एक नई एवं सकारात्मक परंपरा की शुरुआत मानी जा रही है। स्वर्गीय शांति देवी ओझा की स्मृति में किया गया यह 51 लाख रुपये का सामाजिक समर्पण वास्तव में समाज के लिए एक मार्गदर्शक और प्रेरणादायी उदाहरण है, जो आने वाली पीढ़ियों को सेवा और त्याग के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देगा।
इस अनुकरणीय सामाजिक पहल के लिए समाज के विभिन्न वर्गों ने पूरे ओझा परिवार का हृदय से आभार एवं अभिनंदन किया है तथा विशेष रूप से श्री घनश्याम ओझा जी के इस निर्णय को समाज के लिए प्रेरक, आदर्श और अनुकरणीय बताते हुए सराहना की है।










