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Thursday, April 30, 2026, 9:02 am

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श्री जवाहिर चिकित्सालय : मरुस्थल में हांफता स्वास्थ्य तंत्र

छोटे शहरों में पीएमओ पद पर आरएएस या एमबीए इन हॉस्पिटल मैनेजमेंट पर्सन लगाने की उठी मांग, सीएमएचओ के स्थान पर आईएएस की नियुक्ति हो

अब आईएएस के विजन से ही जिला स्तर पर चिकित्सा सेवाएं सुदृढ़ हो सकती हैं, स्वास्थ्य बड़ा मुद्दा है-इसलिए चिकित्सा आयुक्त का नया पद सृजित किया जाए और बड़े जिलों में इसकी नियुक्ति कर योजनाबद्ध रूप से स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास की रूपरेखा तय हों

दिलीप कुमार पुरोहित. जैसलमेर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

मरुस्थल की तपती रेत के बीच बसे पर्यटन और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण शहर जैसलमेर का सबसे बड़ा और एकमात्र राजकीय अस्पताल—श्री जवाहिर चिकित्सालय—इन दिनों खुद ही “आईसीयू” में नजर आ रहा है। गर्मी की आहट के साथ ही बिजली गुल होने की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। अस्पताल में वैकल्पिक बिजली व्यवस्था लगभग नदारद है। कई बार हालात इतने गंभीर हो जाते हैं कि नर्सिंग स्टाफ को टार्च की रोशनी में काम करना पड़ता है। साफ-सफाई से लेकर डॉक्टरों की अनुपस्थिति और आपातकालीन सेवाओं की कमी तक, समस्याओं की लंबी फेहरिस्त ने मरीजों और परिजनों की चिंता बढ़ा दी है। सवाल यह है कि आखिर कब सुधरेगी जैसलमेर के इस जीवनदायी केंद्र की सूरत?

कई बार बिजली गुल: अस्पताल में अंधेरे का राज

(बिजली गुल कभी भी हो सकती है। देखिए ऐसे हाल भी हो जाते हैं।)

गर्मी की शुरुआत होते ही जैसलमेर में बिजली कटौती का सिलसिला शुरू हो चुका है। लेकिन जब यही समस्या अस्पताल में सामने आती है, तो हालात गंभीर हो जाते हैं। अस्पताल में बिजली गुल होना अब आम बात बन चुकी है। कई मौकों पर रात के समय बिजली चली गई और घंटों तक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो पाई। न कूलर चलते हैं, न पंखे। वार्डों में भर्ती मरीज गर्मी से कराहते रहते हैं और परिजन हाथ से पंखा झलने को मजबूर हो जाते हैं।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई बार नर्सिंग स्टाफ को टार्च की रोशनी में इंजेक्शन लगाने और दवाइयां देने का कार्य करना पड़ा। ऐसे वीडियो भी पूर्व में सामने आ चुके हैं, जो अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही की गवाही देते हैं। सवाल उठता है कि क्या इतने बड़े जिले के मुख्य अस्पताल में जनरेटर या सोलर बैकअप जैसी स्थायी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?

पूर्व में जांच केंद्र का ‘तुगलकी फरमान’

अस्पताल की अव्यवस्थाओं का एक और उदाहरण रक्त जांच केंद्र से जुड़ा है। पूर्व में दोपहर 12:30 बजे के बाद जांच नहीं करने का आदेश जारी किया गया था। मरीजों को कहा गया कि वे अगले दिन आएं। इस निर्णय का वीडियो भी सामने आया था, जिसने आमजन में आक्रोश पैदा किया।

गंभीर मरीजों के लिए समय की पाबंदी जानलेवा साबित हो सकती है। अस्पताल जैसे स्थान पर जांच सेवाएं पूरे कार्य समय तक उपलब्ध रहनी चाहिए। यदि स्टाफ की कमी है, तो उसकी पूर्ति करना प्रशासन की जिम्मेदारी है, न कि मरीजों को लौटा देना।

साफ-सफाई की बदतर स्थिति

अस्पताल परिसर में नियमित साफ-सफाई का अभाव भी बड़ी समस्या बन चुका है। टॉयलेट और बाथरूम गंदगी से भरे पड़े हैं। वार्डों में स्वच्छता की कमी साफ दिखाई देती है। संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है, विशेषकर तब जब गर्मी का मौसम शुरू हो चुका है और बीमारियां तेजी से फैलती हैं।

अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजन बताते हैं कि रात के समय सफाईकर्मी नजर नहीं आते। गंदगी की शिकायत करने पर भी तुरंत समाधान नहीं होता। स्वास्थ्य केंद्रों में स्वच्छता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन यहां यह बुनियादी आवश्यकता भी पूरी नहीं हो पा रही है।

डॉक्टरों की अनुपस्थिति और मरीजों की पीड़ा

(मरीजों की पीड़ा का पिछले दिनों का एक वीडियो।)

मरीजों और परिजनों की सबसे बड़ी शिकायत डॉक्टरों की अनुपस्थिति को लेकर है। आरोप है कि डॉक्टर समय पर राउंड पर नहीं आते। रात के समय यदि किसी मरीज की तबीयत बिगड़ जाए तो डॉक्टरों का इंतजार करना पड़ता है। नर्सिंग स्टाफ भी कई बार पर्याप्त ध्यान नहीं देता।

जैसलमेर जैसे दूरस्थ जिले में, जहां निजी अस्पतालों की संख्या सीमित है, सरकारी अस्पताल ही अंतिम उम्मीद होता है। ऐसे में यदि वही केंद्र भरोसेमंद न रहे, तो आमजन के सामने विकल्प सीमित हो जाते हैं।

राजनीतिक शून्यता और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी

जैसलमेर के विधायक छोटू सिंह भाटी तीसरी बार विधायक बने हैं, लेकिन स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि उन्होंने कभी भी अस्पताल की समस्याओं को प्राथमिकता से नहीं उठाया। विधानसभा में भी इस अस्पताल की अव्यवस्थाओं को लेकर ठोस चर्चा नहीं हो पाई। बजट की कमी और योजनाओं के अभाव के कारण अस्पताल वर्षों से पिछड़ता जा रहा है।

राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना किसी भी व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है। जब तक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक हालात जस के तस बने रहेंगे।

कैज्युलिटी में हांफता सिस्टम

हाल ही में एक बस में आग लगने की घटना के बाद जब बड़ी संख्या में घायलों को अस्पताल लाया गया, तो व्यवस्थाएं चरमरा गईं। अस्पताल में जलने के गंभीर मामलों के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। गंभीर मरीजों को तत्काल जोधपुर रेफर करना पड़ता है। इससे न केवल समय की हानि होती है, बल्कि मरीज की जान भी जोखिम में पड़ जाती है।

जैसलमेर जैसे सामरिक और पर्यटन महत्व के जिले में आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं का मजबूत होना अनिवार्य है। यहां हर वर्ष लाखों पर्यटक आते हैं। किसी बड़ी दुर्घटना की स्थिति में मौजूदा संसाधन पर्याप्त नहीं हैं।

राजस्थान के सरकारी अस्पतालों की साझा समस्या

यह समस्या केवल जैसलमेर तक सीमित नहीं है। गर्मी के मौसम में राजस्थान के कई जिलों में सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाएं डगमगा जाती हैं। कहीं ब्लड की कमी हो जाती है तो कहीं बिजली की आंख-मिचौली शुरू हो जाती है। कई स्थानों पर भामाशाहों द्वारा कूलर, पंखे और जनरेटर की व्यवस्था की गई है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।

राज्य सरकार को गर्मी के मौसम से पहले सभी अस्पतालों की समीक्षा कर ठोस कार्ययोजना बनानी चाहिए। विशेषकर मरुस्थलीय जिलों में अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।

गर्मी की आहट : मलेरिया-डेंगू और लू का खतरा

आने वाले महीनों में तापमान 45 से 48 डिग्री तक पहुंच सकता है। ऐसे में लू, ताप-पक्षाघात, मलेरिया और डेंगू के मामलों में वृद्धि होना तय है। यदि अभी से व्यवस्थाएं नहीं की गईं, तो हालात और बिगड़ सकते हैं।

अस्पताल प्रबंधन को विशेष वार्ड, अतिरिक्त स्टाफ, दवाइयों का पर्याप्त भंडारण और जागरूकता अभियान शुरू करने चाहिए। लेकिन फिलहाल तैयारी के कोई ठोस संकेत नजर नहीं आ रहे हैं।

प्रशासनिक सुधार की मांग

जैसलमेर के जागरूक नागरिक पंकज भाटिया ने सुझाव दिया है कि छोटे शहरों में पीएमओ (प्रिंसिपल मेडिकल ऑफिसर) के पद पर आरएएस अधिकारी या एमबीए इन हॉस्पिटल मैनेजमेंट की नियुक्ति की जाए। उनका तर्क है कि वरिष्ठ डॉक्टर को प्रशासनिक जिम्मेदारी देने से चिकित्सा और प्रबंधन दोनों प्रभावित होते हैं। यदि प्रशासनिक कार्य किसी प्रशिक्षित प्रबंधक को सौंपे जाएं, तो अस्पताल की व्यवस्था बेहतर हो सकती है।

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पीएमओ का पदनाम बदलकर “अस्पताल प्रबंधन अधिकारी” किया जाए, ताकि जवाबदेही स्पष्ट हो और आंकड़ों का आदान-प्रदान व्यवस्थित रूप से हो सके।

राइजिंग भास्कर का सुझाव: बड़े जिलों में चिकित्सा आयुक्त की हो नियुक्ति

राइजिंग भास्कर का मानना है कि जैसलमेर जैसे महत्वपूर्ण जिले में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) के स्थान पर आईएएस अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए, जिसका पदनाम “चिकित्सा आयुक्त” हो। यदि ऐसा अधिकारी चिकित्सा पृष्ठभूमि का हो, तो वह नीतिगत और प्रशासनिक दोनों स्तर पर सुधार ला सकता है।

इससे जिला स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी मजबूत होगी, नई योजनाओं का निर्माण होगा और बजट का बेहतर उपयोग संभव हो सकेगा।

समाधान की दिशा में ठोस कदम जरूरी

  1. स्थायी बिजली बैकअप – उच्च क्षमता के जनरेटर और सोलर पावर सिस्टम की स्थापना।

  2. 24 घंटे जांच सुविधा – लैब सेवाओं का समय बढ़ाना।

  3. स्वच्छता अभियान – नियमित मॉनिटरिंग और जिम्मेदारी तय करना।

  4. आपातकालीन वार्ड सुदृढ़ीकरण – बर्न यूनिट और आईसीयू सुविधाओं का विस्तार।

  5. प्रशासनिक पुनर्गठन – पेशेवर अस्पताल प्रबंधन की व्यवस्था।

  6. गर्मी विशेष कार्ययोजना – मलेरिया, डेंगू और लू से निपटने की तैयारी।

अस्पताल के सामने डिवाइडर पर कट रखने की मांग 

जैसलमेर का श्री जवाहिर चिकित्सालय केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि पूरे जिले की जीवनरेखा है। यदि यहां की व्यवस्थाएं पटरी पर नहीं आतीं, तो इसका खामियाजा आमजन को भुगतना पड़ेगा। गर्मी का मौसम दस्तक दे चुका है। अब समय है कि प्रशासन, जनप्रतिनिधि और सरकार मिलकर ठोस कदम उठाएं। हाल ही में एक नई समस्या सामने आई है। यहां असप्ताल क्षेत्र में डिवाइडर बनाया जा रहा है, मगर अस्पताल के गेट के सामने कट नहीं रखा जा रहा है। इससे इमरजेंसी में मरीजों को 500-700 मीटर घुमाकर अस्पताल ले जाना पड़ रहा है। इमरजेंसी में जबकि एक-एक सेकंड मरीज के लिए कीमती होता है कट नहीं रखना बड़ी खामी है। हालांकि मीडिया में मुद्दा उठने के बाद प्रशासन गंभीर हो गया है, मगर अभी भी ऐसी कई समस्याएं हैं, जिनका जिला कलेक्टर के स्तर पर ही समाधान हो सकता है, क्योंकि पीएमओ और सीएमएचओ प्रशासन अस्पताल की समस्याओं का समाधान करने में फेल रहे हैं।

जैसलमेर कलेक्टर को समय-समय पर अस्पताल का दौरा करना चाहिए

जैसलमेर के जिला कलेक्टर को श्री जवाहिर अस्पताल का समय-समय पर दौरा करना चाहिए। मगर ऐसा हो नहीं रहा। इससे अस्पताल की अव्यवस्थाओं की कोई सुध लेने वाला नहीं है। अस्पताल में जंगलराज है। कर्मचारी अपनी मनमानी करते हैं और जिसको जैसा मौका मिलता है अपनी तानाशाही दिखाता है। जबकि जैसलमेर की राजनीतिक शून्यता के चलते कोई कहने वाला नहीं है और जागरूक लोगों की कोई सुनने वाला नहीं है। मरुस्थल की तपिश से लड़ने के लिए मजबूत स्वास्थ्य तंत्र जरूरी है। सवाल यह है—क्या जिम्मेदार लोग समय रहते जागेंगे, या फिर हर साल की तरह इस बार भी हालात भगवान भरोसे ही छोड़ दिए जाएंगे?

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor