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Thursday, April 30, 2026, 3:44 pm

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गौतमराज नवल ‘काकू’ को मिला हाजी जफर खां सिंधी राजस्थानी पुरस्कार, साहित्यप्रेमियों में खुशी की लहर

मातृभाषा से ही संस्कृति जीवित रहती है: हेमलता राजे

महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश शोध केन्द्र में मातृभाषा उत्सव आयोजित, राजस्थानी भाषा के संरक्षण और संवर्धन पर दिया गया जोर

शिव वर्मा. दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर 

9783414079 diliprakhai@gmail.com

मातृभाषा किसी भी समाज और संस्कृति की आत्मा होती है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि वह संस्कृति, परंपरा, इतिहास और जीवन मूल्यों की वाहक भी होती है। यदि मातृभाषा समाप्त हो जाए तो उस समाज की सांस्कृतिक पहचान भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। इसी विचार को केंद्र में रखते हुए महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश शोध केन्द्र, मेहरानगढ़ दुर्ग, जोधपुर की ओर से मातृभाषा उत्सव का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम राजस्थानी विभाग तथा अन्य संस्थाओं के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ, जिसमें साहित्यकारों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों और भाषा प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। समारोह में मुख्य वक्ताओं ने कहा कि मातृभाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा। कार्यक्रम में राजस्थानी भाषा और साहित्य के महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई तथा भाषा के संरक्षण के लिए ठोस प्रयास करने का आह्वान किया गया।

मातृभाषा हमारी पहचान है

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित महारानी श्रीमती हेमलता राजे ने अपने उद्बोधन में कहा कि मातृभाषा किसी भी समाज की पहचान होती है। राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है और हमें इस पर गर्व होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई भी संस्कृति अपनी मातृभाषा के बिना जीवित नहीं रह सकती। यदि मातृभाषा समाप्त हो जाती है तो उस क्षेत्र की संस्कृति भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।

हेमलता राजे ने कहा कि राजस्थानी भाषा केवल बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि यह प्रदेश की आत्मा है। इस भाषा में लोक जीवन की संवेदनाएं, परंपराएं और जीवन दर्शन समाहित है। इसलिए इसे बचाने और आगे बढ़ाने के लिए सभी को सकारात्मक प्रयास करने चाहिए। उन्होंने कहा कि भाषा और संस्कृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी होती हैं। जब हम अपनी मातृभाषा का सम्मान करते हैं तो हम अपनी संस्कृति का भी सम्मान करते हैं। इसलिए नई पीढ़ी को अपनी भाषा से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

मातृभाषा प्रदेशवासियों की आत्मा की आवाज

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित प्रोफेसर (डॉ.) पवन कुमार शर्मा ने कहा कि मातृभाषा प्रदेशवासियों की आत्मा की आवाज होती है। कला और संस्कृति का विकास मातृभाषा के माध्यम से ही संभव है। यदि मातृभाषा का अस्तित्व कमजोर पड़ता है तो संस्कृति का स्वरूप भी प्रभावित होता है।

उन्होंने कहा कि राजस्थानी एक समृद्ध और स्वतंत्र भाषा है। इसके बावजूद अभी तक इसे संविधान में पूर्ण मान्यता नहीं मिल पाई है, लेकिन यह प्रदेश की जनता के दिलों में बसी हुई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राजस्थानी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।

मातृभाषा सदैव लोक में विद्यमान रहती है

समारोह में प्रसिद्ध साहित्यकार और चिंतक प्रोफेसर (डॉ.) अर्जुनदेव चारण ने अपने विचार रखते हुए कहा कि सृष्टि में शब्द की सत्ता सदैव बनी रहती है। भाषा और संस्कृति जीवन का व्यवहार हैं और इनका संबंध सीधे मानव के चित्त से होता है। उन्होंने कहा कि मातृभाषा लोक के मंगल की कामना करती है और इसलिए वह हमेशा लोक जीवन में विद्यमान रहती है। राजस्थानी भाषा में लोक परंपराओं, लोकगीतों और लोककथाओं का विशाल भंडार है, जो समाज की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखता है। प्रोफेसर चारण ने भारतीय ज्ञान परंपरा में मातृभाषा के महत्व को विस्तार से उजागर करते हुए कहा कि हमारी परंपराएं, संस्कार और जीवन मूल्य भाषा के माध्यम से ही पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हैं।

समारोह में राजस्थानी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में योगदान देने वाले प्रतिष्ठित राजस्थानी उदघोषक श्री गौतम राज नवल ‘काकू’ को “हाजी जफर खान सिंधी राजस्थानी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पुरस्कार के अंतर्गत उन्हें 11 हजार रुपये नकद, साफा और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि राजस्थानी भाषा के विकास में साहित्यकारों, कलाकारों और समाजसेवियों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे सम्मान भाषा के प्रति समाज में नई ऊर्जा और प्रेरणा पैदा करते हैं।

मायड़ भाषा सेवा सम्मान से विभूतियां सम्मानित

मातृभाषा उत्सव के अवसर पर कई साहित्यकारों और भाषा सेवियों को “मायड़ भाषा सेवा सम्मान” से सम्मानित किया गया। सम्मान प्राप्त करने वालों में प्रमुख रूप से शामिल हैं—

  • डॉ. प्रकाशदान चारण

  • डॉ. रेवंतदान चारण

  • डॉ. रणजीतसिंह चौहान

  • श्रीमती निर्मला राठौड़

  • डॉ. कंवरसिंह राव

  • डॉ. स्वरूपसिंह भाटी

  • डॉ. अनूप पुरोहित

  • श्री भागीरथ वैष्णव

  • श्री विष्णु शंकर

इन सभी साहित्यकारों और विद्वानों को राजस्थानी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

राजस्थानी पुस्तकों का लोकार्पण

कार्यक्रम में राजस्थानी साहित्य को समृद्ध बनाने के उद्देश्य से दो महत्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया। पहली पुस्तक “नारायणसिंह भाटी – जीवन और सृजन” का संपादन प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित ने किया है। यह पुस्तक राजस्थानी साहित्य के प्रमुख व्यक्तित्व नारायणसिंह भाटी के जीवन और उनके साहित्यिक योगदान को समर्पित है। दूसरी पुस्तक राजस्थानी के युवा कवि दिलीप राव दलपत द्वारा लिखित कविता संग्रह “छंदा री छटा” है। इन दोनों पुस्तकों का लोकार्पण समारोह में उपस्थित अतिथियों द्वारा किया गया। महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश शोध केन्द्र के सहायक निदेशक डॉ. महेन्द्रसिंह तंवर ने सभी अतिथियों और उपस्थित जनों का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर अनेक शिक्षाविद, साहित्यकार, शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से उपस्थित लोगों में प्रोफेसर सोहनदान चारण, प्रोफेसर रामचंद्र सिंह राजपुरोहित, प्रोफेसर कल्पना पुरोहित, प्रोफेसर गेमराराम परिहार, प्रोफेसर अरविंद परिहार, दिनेश सिंदल, राजेन्द्रसिंह लीलिया, डॉ. विक्रमसिंह गुंदोज, चांदकौर जोशी, बसंती पंवार, सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। इसके अलावा शहर और प्रदेश के कई प्रतिष्ठित रचनाकार, मायड़ भाषा प्रेमी, गणमान्य नागरिक, शोधार्थी और विद्यार्थी भी कार्यक्रम में शामिल हुए।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor