बिना सूचना मोबाइल सेवा बंद करने को बताया साजिश, कहा—संचार बाधित कर पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन को पहुंचाया नुकसान
विशेष संवाददाता. जोधपुर
वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक भास्कर के सीनियर सब एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित ने अपने ही संस्थान के प्रबंधन के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए बड़ा कानूनी कदम उठाया है। उन्होंने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC), नई दिल्ली में एक विस्तृत प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत कर दैनिक भास्कर समूह के शीर्ष अधिकारियों पर सुनियोजित साजिश के तहत उनकी मोबाइल सेवा बंद करने का आरोप लगाया है। साथ ही उन्होंने 1000 करोड़ रुपए की भारी भरकम क्षतिपूर्ति की मांग भी की है।
यह मामला अब केवल एक उपभोक्ता विवाद नहीं रहकर मीडिया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पेशेवर अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रकरण बन गया है।
20 साल से अधिक का कार्यकाल, फिर भी विवाद गहराया
दिलीप कुमार पुरोहित ने अपने प्रार्थना-पत्र में उल्लेख किया है कि वे 5 फरवरी 2003 से दैनिक भास्कर समूह से जुड़े हुए हैं और वर्तमान में जोधपुर में सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से अधिक समय तक संस्था में सेवाएं देने के बावजूद अब उनके और प्रबंधन के बीच विवाद गहराता जा रहा है।
उन्होंने बताया कि संस्थान के साथ चल रहे विवाद को लेकर वे पहले ही लीगल नोटिस भेज चुके हैं और इस संबंध में राजस्थान उच्च न्यायालय में भी प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत कर चुके हैं। लेकिन अब तक न तो प्रबंधन की ओर से कोई संतोषजनक जवाब मिला और न ही न्यायिक स्तर पर कोई स्पष्ट कार्रवाई सामने आई है।
मोबाइल सिम बंद करने का मामला बना विवाद का केंद्र
इस पूरे विवाद का मुख्य आधार एक मोबाइल सिम कार्ड है, जो प्रार्थी के नाम से कॉर्पोरेट यूज (CUG) प्लान के तहत जारी किया गया था। यह सिम उनके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था। प्रार्थी का आरोप है कि जून माह से बिना किसी पूर्व सूचना या कारण बताए उनके नंबर का रिचार्ज बंद कर दिया गया। इससे उनका संचार पूरी तरह बाधित हो गया। उन्होंने इस संबंध में भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) में भी शिकायत दर्ज करवाई थी, जिसमें उन्होंने प्रारंभिक तौर पर 1000 रुपए के हर्जाने की मांग की थी। लेकिन बाद में मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने इसे एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बताते हुए 1000 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति की मांग कर दी।
“यह सामान्य तकनीकी समस्या नहीं, सुनियोजित साजिश”
दिलीप कुमार पुरोहित का दावा है कि यह कोई साधारण तकनीकी या प्रशासनिक त्रुटि नहीं है, बल्कि उनके खिलाफ सुनियोजित तरीके से रचा गया षड्यंत्र है। उनका कहना है कि वे एक सक्रिय पत्रकार हैं और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं। उनके अनुसार, उनकी लेखनी से प्रबंधन असहज रहता है और इसी कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके संचार के प्रमुख माध्यम को बाधित कर उन्हें पेशेवर रूप से “पंगु” बनाने की कोशिश की गई है।
जान का खतरा होने का भी आरोप
प्रार्थी ने अपने आवेदन में यह भी कहा है कि उन्हें दैनिक भास्कर समूह के कुछ कर्मचारियों से जान का खतरा है। उन्होंने दावा किया कि वे कई बार इस विषय को उठा चुके हैं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जोधपुर में इस मुद्दे को उठाने के बाद प्रशासनिक स्तर पर कुछ अप्रत्याशित घटनाएं हुईं, जिससे उनकी आशंकाएं और बढ़ गई हैं।
पेशेवर जीवन पर पड़ा गहरा असर
पत्रकारिता के क्षेत्र में संचार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। प्रार्थी का कहना है कि मोबाइल सेवा बंद होने से वे अपने स्रोतों, सहयोगियों और अधिकारियों से संपर्क नहीं कर सके।
इसके कारण—
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कई महत्वपूर्ण समाचार अवसर छूट गए
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पेशेवर विश्वसनीयता प्रभावित हुई
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कार्य निष्पादन में बाधा आई
उन्होंने यह भी कहा कि लगातार संपर्क में न रहने के कारण उनके बारे में गलत धारणा भी बन सकती है, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
मानसिक और सामाजिक प्रभाव भी गंभीर
इस घटना का प्रभाव केवल पेशेवर जीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका मानसिक और सामाजिक असर भी पड़ा है।
प्रार्थी के अनुसार—
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उन्हें लगातार तनाव और चिंता का सामना करना पड़ा
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असुरक्षा की भावना बढ़ी
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सामाजिक और पेशेवर दायरे में अलगाव महसूस हुआ
उन्होंने इसे मानसिक उत्पीड़न का मामला बताते हुए इसे गंभीर मानवाधिकार मुद्दा भी बताया है।
1000 करोड़ के हर्जाने की मांग क्यों?
सबसे अधिक चर्चा का विषय 1000 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति की मांग है।
प्रार्थी का तर्क है कि—
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यह मामला केवल मोबाइल सेवा का नहीं, बल्कि उनके मौलिक अधिकारों से जुड़ा है
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उनकी पेशेवर पहचान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रियता को देखते हुए नुकसान बड़ा है
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संचार बाधित होने से उनके करियर और सुरक्षा दोनों पर खतरा उत्पन्न हुआ
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यह एक सुनियोजित साजिश है, जिसका प्रभाव दीर्घकालिक हो सकता है
इन सभी आधारों पर उन्होंने भारी भरकम क्षतिपूर्ति की मांग को उचित ठहराया है।
मीडिया जगत में चर्चा का विषय बना मामला
यह मामला अब मीडिया जगत में चर्चा का विषय बनता जा रहा है। एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा अपने ही संस्थान के खिलाफ इस तरह का आरोप लगाना असामान्य माना जा रहा है।
यह प्रकरण कई बड़े सवाल भी खड़े करता है—
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क्या कॉर्पोरेट संस्थान अपने कर्मचारियों के संचार अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं?
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क्या पत्रकारों की स्वतंत्रता पर इस प्रकार का अप्रत्यक्ष दबाव डाला जा सकता है?
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क्या यह मामला अन्य मीडिया संस्थानों के लिए भी एक उदाहरण बनेगा?
आगे क्या होगा?
अब सभी की नजरें राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) पर टिकी हैं, जहां इस मामले की सुनवाई होगी। यदि आयोग इस मामले को गंभीर मानते हुए नोटिस जारी करता है, तो प्रतिवादीगण को जवाब देना पड़ेगा और मामले की सच्चाई सामने आ सकती है। दिलीप कुमार पुरोहित द्वारा दायर यह प्रकरण केवल एक व्यक्ति का विवाद नहीं, बल्कि यह संस्थागत शक्ति, पत्रकारिता की स्वतंत्रता और उपभोक्ता अधिकारों के बीच टकराव का प्रतीक बन गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि न्यायिक प्रक्रिया इस मामले को किस दिशा में ले जाती है और क्या यह मामला भविष्य में ऐसे विवादों के लिए कोई नई मिसाल कायम करेगा।








