राइजिंग भास्कर का राष्ट्रीय प्रस्ताव : लोकतंत्र को और अधिक जवाबदेह, पारदर्शी और जनकेंद्रित बनाने पर राष्ट्रीय बहस शुरू हो, राइजिंग भास्कर की प्रधानमंत्री से अपील- एक ऐसा प्लेटफार्म बनाकर इस संबंध में जनता की राय मांगी जाए… राइजिंग भास्कर भी पाठकों से अपनी राय देने की अपील करता है। अपनी राय diliprakhai@gmail.com पर दे सकते हैं।
नई दिल्ली से दिलीप कुमार पुरोहित | जोधपुर से आनंद एम. वासु
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। करोड़ों मतदाता हर पांच वर्ष में अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी चर्चा का विषय बना हुआ है—क्या देश का प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री सीधे जनता द्वारा चुने जाने चाहिए?
राइजिंग भास्कर का मानना है कि अब इस विषय पर पूरे देश में गंभीर और व्यापक जनचर्चा शुरू होनी चाहिए। यह केवल किसी राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा राष्ट्रीय विमर्श है।
भारत में वर्तमान व्यवस्था संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है। जनता सांसद और विधायक चुनती है। इसके बाद बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन अपने नेता का चयन करता है, जो प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनता है। यह व्यवस्था संविधान द्वारा स्थापित है और स्वतंत्र भारत में लंबे समय से सफलतापूर्वक लागू है। इसके अनेक सकारात्मक पक्ष हैं, लेकिन समय के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं।
राइजिंग भास्कर का प्रस्ताव है कि भविष्य में इस बात पर राष्ट्रीय स्तर पर विचार किया जाए कि क्या प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री तथा नगर निकायों के प्रमुखों का चुनाव सीधे जनता द्वारा कराया जाना चाहिए, ताकि सर्वोच्च कार्यपालिका को प्रत्यक्ष जनादेश प्राप्त हो सके।
वर्तमान व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं
भारतीय संसदीय प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सरकार सदन के प्रति उत्तरदायी रहती है। यदि सरकार बहुमत खो देती है तो उसे पद छोड़ना पड़ता है। इससे कार्यपालिका और विधायिका के बीच निरंतर संवाद बना रहता है। गठबंधन राजनीति ने भी अनेक राज्यों और केंद्र में विविध विचारों को प्रतिनिधित्व दिया है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह व्यवस्था संघीय लोकतंत्र के लिए उपयुक्त है क्योंकि इसमें सामूहिक नेतृत्व को महत्व मिलता है।
लेकिन क्या चुनौतियां भी हैं?
पिछले कई दशकों में अनेक बार ऐसे राजनीतिक घटनाक्रम सामने आए हैं जिनमें चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए दलों के बीच जोड़-तोड़, दल-बदल, समर्थन वापसी, विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप तथा लंबे राजनीतिक गतिरोध देखने को मिले। कई बार मतदाता जिस नेता को मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है, चुनाव के बाद परिस्थितियां बदल जाती हैं और कोई दूसरा व्यक्ति पद पर पहुंच जाता है। यहीं से यह प्रश्न उठता है कि क्या सर्वोच्च कार्यपालिका को सीधे जनता का जनादेश मिलना चाहिए?
राइजिंग भास्कर का प्रस्ताव
राइजिंग भास्कर का सुझाव है कि देश में व्यापक संवैधानिक और लोकतांत्रिक विमर्श के बाद ऐसी व्यवस्था पर विचार किया जाए जिसमें—
- प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे देश की जनता करे।
- मुख्यमंत्री का चुनाव संबंधित राज्य की जनता सीधे करे।
- नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं के प्रमुखों का चुनाव भी प्रत्यक्ष मतदान से हो।
- निर्वाचित प्रमुख निश्चित कार्यकाल तक जनता के प्रति सीधे जवाबदेह रहे।
- चुनाव बाद होने वाली राजनीतिक जोड़-तोड़ की संभावनाओं में कमी आए।
यह केवल एक वैचारिक प्रस्ताव है, जिसके पक्ष और विपक्ष दोनों पर गंभीर बहस आवश्यक है।
प्रत्यक्ष चुनाव से संभावित लाभ
यदि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री सीधे चुने जाएं तो जनता को स्पष्ट रूप से पता होगा कि वह किस व्यक्ति को सर्वोच्च जिम्मेदारी सौंप रही है। सीधे जनादेश से निर्वाचित नेता की वैधता अधिक मजबूत मानी जा सकती है। चुनाव के बाद नेतृत्व बदलने की संभावना कम होगी और राजनीतिक अस्थिरता में भी कमी आ सकती है।
1. जोड़-तोड़ की राजनीति पर रोक
चुनाव परिणाम आने के बाद सरकार बनाने के लिए होने वाले राजनीतिक समीकरण, समर्थन जुटाने और कथित खरीद-फरोख्त जैसी घटनाओं में कमी आ सकती है।
2. जनता के प्रति सीधी जवाबदेही
यदि जनता सीधे किसी व्यक्ति को चुनती है तो अगले चुनाव में उसका मूल्यांकन भी सीधे उसी आधार पर होगा।
3. योग्य नेतृत्व को अवसर
राजनीतिक दलों के आंतरिक समीकरणों से अलग, यदि कोई लोकप्रिय और सक्षम नेता जनता का विश्वास जीतता है तो उसे सीधे सर्वोच्च पद तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है।
4. राजनीतिक स्थिरता
निश्चित कार्यकाल वाली मजबूत कार्यपालिका से प्रशासनिक निर्णयों में निरंतरता आ सकती है।
5. स्पष्ट जनादेश
देश और राज्य को यह स्पष्ट संदेश मिलेगा कि जनता किस नेतृत्व को चाहती है।
निकाय चुनावों का अनुभव
देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर नगर निकायों में प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अपनाई गई। कई स्थानों पर महापौर अथवा अध्यक्ष का चुनाव जनता ने सीधे किया। इस व्यवस्था के समर्थकों का तर्क है कि इससे निर्वाचित प्रमुख को मजबूत जनादेश मिला और वह सीधे नागरिकों के प्रति जवाबदेह रहा। हालांकि बाद में अनेक राज्यों ने अपनी नीतियों और राजनीतिक निर्णयों के आधार पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रणाली में बदलाव किए। विभिन्न राज्यों में आज भी अलग-अलग व्यवस्थाएं लागू हैं। राइजिंग भास्कर का मानना है कि निकायों में प्रत्यक्ष चुनाव के अनुभवों का निष्पक्ष अध्ययन होना चाहिए और उनसे सीख लेकर भविष्य की नीति तय की जा सकती है।
क्या संविधान में संशोधन आवश्यक होगा?
यदि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का प्रत्यक्ष चुनाव लागू करना हो तो इसके लिए व्यापक संवैधानिक संशोधन और चुनावी ढांचे में बड़े बदलाव आवश्यक होंगे। यह संसद, राज्यों, संवैधानिक विशेषज्ञों, निर्वाचन आयोग, विधि आयोग तथा नागरिक समाज की व्यापक सहमति से ही संभव हो सकता है।
विरोध में दिए जाने वाले प्रमुख तर्क
इस प्रस्ताव के विरोध में भी कई महत्वपूर्ण तर्क हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने जानबूझकर संसदीय लोकतंत्र अपनाया है। प्रत्यक्ष चुनाव की व्यवस्था राष्ट्रपति प्रणाली जैसी चुनौतियां पैदा कर सकती है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री और सदन में अलग-अलग राजनीतिक बहुमत हो तो टकराव की स्थिति बन सकती है। इसलिए किसी भी परिवर्तन से पहले व्यापक राष्ट्रीय सहमति आवश्यक होगी।
फिर भी बहस क्यों जरूरी है?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह समय-समय पर स्वयं का मूल्यांकन करता है। चुनाव सुधार, मतदाता सूची, ईवीएम, सूचना का अधिकार, पंचायतों में महिलाओं का आरक्षण, नगर निकायों में प्रत्यक्ष चुनाव जैसे अनेक सुधार भी सार्वजनिक विमर्श से ही आगे बढ़े हैं। इसी प्रकार प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली पर भी खुली और स्वस्थ चर्चा लोकतंत्र को और मजबूत बना सकती है।
जनता का विश्वास सर्वोपरि
आखिर लोकतंत्र का मूल आधार जनता ही है। यदि सर्वोच्च कार्यपालिका सीधे जनता से जनादेश प्राप्त करे तो लोकतंत्र की भावना और अधिक मजबूत हो सकती है—ऐसा इस प्रस्ताव के समर्थकों का मत है। वहीं विरोधी पक्ष मानता है कि वर्तमान संसदीय व्यवस्था भी लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करती है। इसीलिए राइजिंग भास्कर किसी निष्कर्ष को थोपने के बजाय राष्ट्रीय बहस शुरू करना चाहता है।
वर्तमान व्यवस्था कैसे काम करती है?
- जनता सांसद और विधायक चुनती है।
- बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन सरकार बनाता है।
- दल अपने नेता का चयन करता है।
- वही प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनता है।
- सरकार सदन के प्रति उत्तरदायी रहती है।
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में क्या होगा? (प्रस्ताव)
- जनता सीधे प्रधानमंत्री चुने।
- जनता सीधे मुख्यमंत्री चुने।
- चुनाव बाद नेतृत्व बदलने की संभावना कम हो।
- जोड़-तोड़ की राजनीति घटे।
- जनता के प्रति सीधी जवाबदेही बढ़े।
संभावित लाभ
- स्पष्ट जनादेश
- मजबूत नेतृत्व
- राजनीतिक स्थिरता
- खरीद-फरोख्त में कमी
- जनता की सीधी भागीदारी
- जवाबदेही बढ़ेगी
संभावित चुनौतियां
- संविधान संशोधन की आवश्यकता।
- संसदीय व्यवस्था से बड़े बदलाव।
- विधायिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन का नया मॉडल।
- चुनावी खर्च और प्रक्रिया का पुनर्गठन।
- व्यापक राजनीतिक सहमति की जरूरत।
राइजिंग भास्कर की अपील
राइजिंग भास्कर मानता है कि यह विषय किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि लोकतंत्र के भविष्य का प्रश्न है।हम देश के संवैधानिक विशेषज्ञों, पूर्व न्यायाधीशों, शिक्षाविदों, प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों, युवाओं और आम नागरिकों से आग्रह करते हैं कि वे इस विषय पर अपनी निष्पक्ष राय दें। क्या भारत में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का चुनाव सीधे जनता द्वारा होना चाहिए? क्या निकाय चुनावों में निकाय मुखियाओं का चयन भी प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से होना चाहिए? क्या इससे लोकतंत्र मजबूत होगा? क्या इससे जोड़-तोड़ और राजनीतिक अस्थिरता कम होगी? या वर्तमान संसदीय व्यवस्था ही भारत के लिए सर्वश्रेष्ठ है?
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राइजिंग भास्कर प्राप्त सुझावों, विशेषज्ञों की राय और पाठकों के विचारों के आधार पर इस विषय पर एक राष्ट्रीय जनमत अभियान चलाएगा तथा विभिन्न पक्षों को समान महत्व देते हुए आगामी अंकों में प्रकाशित करेगा।लोकतंत्र बहस से मजबूत होता है। आइए, इस राष्ट्रीय विमर्श में अपनी भागीदारी निभाएं।


