डॉ.एल.सी.जैदिया “जैदि”
कफ़स में क़ैद चालाकियां
खामोशियाँ देखो आज जश्न मनाने लगी है,
कल तो जैसे मातम था ऐसे बताने लगी है।
बैचेनियों ने शायद उन को सोने न दिया हो,
बेशर्म उनकी आंखें,खुशियाँ जताने लगी है।
क़फ़स में कै़द चालाकियाँ, आजाद हो गई,
हमें लगा जैसे साथ हैं हमारे, बताने लगी हैं।
हम भी मासूम निकले कहा जो मान लिया,
पता चला वो तो हमें, जिंदा जलाने लगी है।
भला हो अस्थियों का जो जलने से बच गई,
वरना राख तो दुनियाँ कब से बनाने लगी है।
उफ्फ क्या कसूर था, जो दुश्मन दुनियाँ बनी,
शुक्र है जिंदगी का ‘जैदि’ जो बचाने लगी है।
मायने:-
क़फ़स-पिंजरा
शायर:-“जैदि”
डॉ.एल.सी.जैदिया “जैदि”
