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Sunday, August 23, 2026, 9:29 am

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Lifestyle

गजल : ये कलम यूं ही नहीं चली होगी

एडवोकेट एनडी निंबावत ‘सागर’

ये कलम यूं ही नहीं चली होगी

ये कलम यूं ही नहीं चली होगी।
दिल पर चोट कभी तो लगी होगी ।।

निगाहों में बसी है वो तस्वीर ।
उम्मीदें जहां खूब पली होगी ।।

हसरतें आरजू तमनाएं सभी ।
मुहब्बत की आग में जली होगी ।।

राहे वफ़ा में वस्लों के वादे ।
अकेले शामें कई ढली होगी ।।

धड़कता था दिल सदा ही जहां पर ।
आज सूनी सी वो ही गली होगी ।।

निकले जो इन आंखों से आंसू ।
एक नदी “सागर” को चली होगी ।।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor