
राइजिंग भास्कर ने आजादी की वर्षगांठ पर आजादी का महानायक कौन? प्रतियोगिता आयोजित की थी। इसी प्रतियोगिता की परिणति है ये नौ महानायक…
डीके पुरोहित. जोधपुर
आजादी के 77 साल बाद जब हम यह मूल्यांकन करते हैं कि जिस आजादी के आसमां में हम सांस ले रहे हैं, उस आजादी के आंदोलन का महानायक कौन था? आखिर वो कौन शख्स थे जिनके प्रयासों से आजादी का प्रसून खिला? हमने यह प्रतियोगिता आयोजित की थी। इसमें देश भर से कई लोगों ने भाग लिया। लोगों ने इस प्रतियोगिता में बढ़चढ़ कर भाग लिया और हमने लोगों की भावनाओं को सिर माथे पर रखते हुए नौ आजादी के महानायकों का चयन किया है जिनके बारे में संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं। राइजिंग भास्कर देश के अनगिनत नामी-गुमनामी शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों के प्रयासों से आजादी मिलना मानता है और इस आलेख से इत्तेफाक नहीं रखता है। हां, यह आलेख लोगों की भावनाओं पर आधारित आलेख है, जिसमें लोगाें ने नौ हीरो को आजादी का महानायक बताया। यहां लोगों की भावनाओं काे प्राथमिकता दी जा रही है। इसे उसी रूप में लिया जाए।
1-मंगल पांडे
मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को बलिया उत्तरप्रदेश में नगवा गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम दिवाकर पांडे तथा माता का नाम अभय रानी था। वे सन 1849 में 22 साल की उम्र में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए थे। वे बैरकपुर की सैनिक छावनी में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की पैदल सेना में एक सिपाही थे। यहीं पर गाय और सूअर की चर्बी वाले राइफल में नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ। जिससे सैनिकों में आक्रोश बढ़ गया और परिणाम स्वरुप 9 फरवरी 1857 को ‘नया कारतूस’ को मंगल पाण्डेय ने इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया। 29 मार्च सन् 1857 को अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन को उन्होंने मौत के घाट उतार दिया साथ ही अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेन्ट बॉब को भी मार डाला। इस कारण उनको 8 अप्रैल, 1857 को फांसी पर लटका दिया गया। मंगल पांडे की मौत के कुछ समय पश्चात प्रथम स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो गया था जिसे 1857 का विद्रोह भी कहा जाता है।
2- भगतसिंह
भगतसिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा गांव में पंजाब में हुआ था। शहीद भगत सिंह के पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। वे सिर्फ 23 वर्ष के थे जब उन्होंने अपने देश के लिए फांसी को गले लगाया था। भगत सिंह पर क्रांतिकारी और मार्क्सवादी विचारधाराओं का काफी प्रभाव पड़ा था। लाला लाजपत राय की मौत ने उनको अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए उत्तेजित किया था। उन्होंने इसका बदला ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉंन्डर्स की हत्या करके लिया। भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय विधान सभा या असेंबली में बम फेंकते हुए क्रांतिकारी नारे लगाए थे। उनपर ‘लाहौर षड़यंत्र’ का मुकदमा चला और 23 मार्च, 1931 की रात भगत सिंह को फांसी पर लटका दिया गया।
3- महात्मा गांधी

महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर काठियावाड एजेंसी गुजरात में हुआ था। महात्मा गांधी को राष्ट्रीय पिता और बापू कह कर भी बुलाया जाता है। उनके पिता का नाम करमचंद्र गांधी और माता का नाम पुतलीबाई था। महात्मा गांधी को भारत के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ कुछ लोगों में से एक माना जाता है जिन्होंने दुनिया को बदल दिया। उन्होंने सरल जीवन और उच्च सोच जैसे मूल्यों का प्रचार किया। उनके सिद्धांत थे सच्चाई, अहिंसा और राष्ट्रवाद। गांधी ने सत्याग्रह का नेतृत्व किया, हिंसा के खिलाफ आंदोलन, जिसने अंततः भारत की आजादी की नींव रखी। उनके जीवनभर की गतिविधियों में किसानों, मजदूरों के खिलाफ भूमि कर और भेदभाव का विरोध करना शामिल हैं। वे अपने जीवन के अंत तक अस्पृश्यता के खिलाफ लड़ते रहे। 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में नाथूरम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी थी। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि जिस प्रकार सत्याग्रह, शांति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुए महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था और इसका कोई ऐसा दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में कही भी देखने को नहीं मिलता है।
4-चंद्रशेखर आजाद

चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को भाबरा अलीराजपुर मध्यप्रदेश में हुआ था। उनका पूरा नाम पंडित चंद्रशेखर तिवारी था और उन्हें आजाद कहकर भी बुलाया जाता था। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी और माता का नाम जाग्रानी देवी था। वे 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। वहीं पर उन्होंने कानून भंग आंदोलन में योगदान भी दिया था। वे एक महान भारतीय क्रन्तिकारी थे। उनकी उग्र देशभक्ति और साहस ने उनकी पीढ़ी के लोगों को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। हम आपको बता दें कि चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह के सलाहकार थे और उन्हें भारत के सबसे महान क्रांतिकारियों में से एक माना जाता है। 1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े, भारतीय क्रन्तिकारी, काकोरी ट्रेन डकैती (1926), वाइसराय की ट्रैन को उड़ाने का प्रयास (1926), लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए सॉन्डर्स पर गोलीबारी की (1928), भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सभा का गठन भी किया था। जब वे जेल गए थे वहां पर उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को उनका निवास बताया था। उनकी मृत्यु 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में हुई थी।
5-खुदीराम बोस
खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम त्रैलोक्यनाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। उनके मन में देश की आजादी को लेकर इतना जुनून था कि उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई को छोड़कर मुक्ति आंदोलन में गए थे। इस बहादुर नौजवान को 11 अगस्त 1908 को फांसी दे दी गई थी उस समय उनकी उम्र 18 साल कुछ महीने थी। अंग्रेज सरकार उनकी निडरता और वीरता से इस कदर आतंकित थी कि उनकी कम उम्र के बावजूद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। इस फैसले के बाद क्रांतिकारी खुदीराम बोस हाथ में गीता लेकर खुशी-खुशी फांसी पर चढ़ गए। खुदीराम की लोकप्रियता का यह आलम था कि उनको फांसी दिए जाने के बाद बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे, जिसकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था और बंगाल के नौजवान बड़े गर्व से वह धोती पहनकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे।
6-सुभाषचंद्र बोस
सुभाषचंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक ओडिसा में हुआ था। सुभाष चंद्र बोस जिन्हें नेताजी के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय राष्ट्रवादी थे जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती था। वे 1920 के अंत तक राष्ट्रीय युवा कांग्रेस के बड़े नेता माने गए और सन् 1938 और 1939 को वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक (1939- 1940) नामक पार्टी की स्थापना की। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ जापान की सहायता से भारतीय राष्ट्रीय सेना “आजाद हिन्द फ़ौज़” का निर्माण किया। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने “सुप्रीम कमांडर” बन कर सेना को संबोधित करते हुए “दिल्ली चलो” का नारा लागने वाले सुभाष चन्द्र बोस ही थे। 18 अगस्त 1945 को टोक्यो (जापान) जाते समय ताइवान के पास नेताजी का एक हवाई दुर्घटना में निधन हुआ बताया जाता है, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया था इसलिए आज भी उनकी मृत्यु एक रहस्य है।
7-बाल गंगाधर तिलक
बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को रत्नागिरी महाराष्ट्र में हुआ था। उनका पूरा नाम लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक था। उनके पिता का नाम गंगाधर रामचंद्र तिलक और माता का नाम पार्वतीबाई था। वे भारत के एक प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतन्त्रता सेनानी थे। भारत में पूर्ण स्वराज की मांग उठाने वाले यह पहले नेता थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनके नारे ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे ले कर रहूंगा’ ने लाखों भारतीयों को प्रेरित किया। ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें ‘अशांति का जनक’ कहा। उन्हें ‘लोकमान्य’ शीर्षक दिया गया, जिसका साहित्यिक अर्थ है ‘लोगों द्वारा सम्मानित’। केसरी में प्रकाशित उनके आलेखों से पता चलता है कि वह कई बार जेल गए थे। लोकमान्य तिलक ने जनजागृति का कार्यक्रम पूरा करने के लिए महाराष्ट्र में गणेश उत्सव तथा शिवाजी उत्सव सप्ताह भर मनाना प्रारंभ किया था। इन त्योहारों के माध्यम से जनता में देशप्रेम और अंगरेजों के अन्यायों के विरुद्ध संघर्ष का साहस भरा गया। 1 अगस्त,1920 को मुम्बई में उनका निधन हो गया था।
8-पंडित जवाहरलाल नेहरू
पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद उत्तरप्रदेश में हुआ था। पंडित जवाहरलाल नेहरू को चाचा नेहरू और पंडितजी के नाम से भी बुलाया जाता है। उनके पिता का नाम पं. मोतीलाल नेहरू और माता का नाम श्रीमती स्वरूप रानी था। वह भारतीय स्वतंत्रता के लिए महात्मा गांधी के साथ सम्पूर्ण ताकत से लड़े, असहयोग आंदोलन का हिस्सा रहे। असल में वह एक बैरिस्टर और भारतीय राजनीति में एक केन्द्रित व्यक्ति थे। आगे चलकर वे राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। बाद में वह उसी दृढ़ विश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन में गांधीजी के साथ जुड़ गए। भारतीय स्वतंत्रता के लिए 35 साल तक लड़ाई लड़ी और तकरीबन 9 साल जेल भी गए। 15 अगस्त, 1947 से 27 मई, 1964 तक पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधान मंत्री बने थे। उन्हें आधुनिक भारत के वास्तुकार के नाम से भी जाना जाता है।
9. भीकाजी कामा

भीकाजी रूस्तम कामा (मेडम कामा) भारतीय मूल की पारसी नागरिक थीं, जिन्होने लन्दन, जर्मनी तथा अमेरिका का भ्रमण कर भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया। वो जर्मनी के स्टटगार्ट नगर में 22 अगस्त 1907 में हुई सातवीं अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में भारत का प्रथम तिरंगा राष्ट्रध्वज फहराने के लिए प्रसिध्द हैं। उस समय तिरंगा वैसा नहीं था जैसा आज है। उनके द्वारा पेरिस से प्रकाशित ‘वन्देमातरम्’ पत्र प्रवासी भारतीयों में काफी लोकप्रिय हुआ। 1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में हुई अन्तर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मेडम भीकाजी कामा ने कहा, ‘भारत में ब्रिटिश शासन जारी रहना मानवता के नाम पर कलंक है। एक महान देश भारत के हितों को इससे भारी क्षति पहुंच रही है।’ उन्होंने लोगों से भारत को दासता से मुक्ति दिलाने में सहयोग की अपील की और भारतवासियों का आह्वान किया, ‘आगे बढ़ो, हम हिन्दुस्तानी हैं और हिन्दुस्तान हिन्दुस्तानियों का है।’ यही नहीं मेडम भीकाजी कामा ने इस कांफ्रेंस में ‘वन्देमातरम्’ अंकित भारत का प्रथम तिरंगा राष्ट्रध्वज फहरा कर अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी। मेडम भीकाजी कामा लन्दन में दादा भाई नौरोजी की प्राइवेट सेक्रेटरी भी रही थी।