-करौली, जोधपुर और भीलवाड़ा में दंगों की जांच के लिए पूर्व डीजीपी एमएल लाठर ने अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस बीजू जॉर्ज जोसेफ के नेतृत्व में 6 सदस्यी विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया था। इस दल को एक महीने में दंगों का सच सामने लाकर अपनी रिपोर्ट देनी थी, मगर एक साल से ज्यादा समय हो गया। सच सामने नहीं आया। आरोप है कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार इस फाइल को दबा बैठी है। बताया जाता है कि गहलोत सरकार अब इस मामले को फिर से जनता के सामने नहीं लाना चाहती और समझा तो यही जा रहा है कि विधानसभा चुनाव तक कोई हलचल नहीं होने वाली।
डीके पुरोहित. जयपुर
अशोक गहलोत सरकार की नीयत में खोट रही है या वे नहीं चाहते कि विधानसभा चुनाव से पहले दंगों की बात हो। कारण कुछ भी हो करौली, जोधपुर और भीलवाड़ा के दंगों की जांच रिपोर्ट एक माह में आने वाली थी, मगर एक साल से अधिक समय हो गया, जांच रिपोर्ट तो क्या कोई हलचल तक नहीं हुई। पुलिस अधिकारी भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है। पूर्व डीजीपी एमएल लाठर ने अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस बीजू जॉर्ज जोसेफ के नेतृत्व में 6 सदस्यी विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया था, मगर यह दल भी खानापूर्ति में लगा गया और एक माह तो दूर एक साल बीत जाने के बाद भी दंगों का सच सामने नहीं आ पाया।
राजस्थान में एक के बाद एक हुए दंगों और आगजनी की घटना को लेकर पुलिस मुख्यालय ने स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का गठन किया था। इस टीम के जिम्मे करौली, जोधपुर और भीलवाड़ा में हुए दंगों की रिपोर्ट बनानी थी। टीम को जिम्मेदारी दी गई थी कि एक महीने में दूध का दूध और पानी का पानी करे मगर एक साल से अधिक समय बीत गया सच सामने आना तो दूर पुलिस की रिपोर्ट भी मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंची। दंगों में कौन दोषी थे? किसके उकसावे पर दंगे हुए? क्या कोई बड़ी साजिश थी? क्या राजनीतिक लोग इसमें शामिल थे? कुल मिलाकर इन दंगों के पीछे क्या वजह रही, यह सब कुछ जांच का विषय रहा। इसी की जांच के लिए यह विशेष जांच दल का गठन किया गया था। मगर जांच दल गठन के बाद पुलिस अफसरों की जिम्मेदारियां भी बदल गई। अतिरिक्त महानिदेशक बीजू जॉर्ज जोसेफ के नेतृत्व में 6 सदस्यीय विशेष जांच दल का गठन तो कर लिया गया, मगर कोई नहीं जानता कि क्या जांच हुई? कितने लोगों से पूछताछ की गई? कितने लोगों को दोषी बनाया गया? आखिर दंगे के वास्तविक कारण क्या रहे? ऐसे कई सवाल हैं जिनके उत्तर आने बाकी है। इधर भाजपा नेता बराबर आरोप लगाते रहे हैं कि अशोक गहलोत सरकार ने एक तरफा कार्रवाई की और हिंदुओं के साथ अन्याय हुआ और एक समुदाय विशेष के लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। भाजपा नेता तो यह आरोप भी लगाते रहे हैं कि दंगों के मामले में अशोक गहलोत सरकार फेल साबित हुई। जोधपुर में दंगा होने के बाद काफी समय तक तो सीएम गहलोत जोधपुर तक नहीं आए। यही नहीं उन्होंने पीड़ित लोगों को ना तो दिलाशा दिया और ना ही दंगों पर अफसोस जताया। जबकि भाजपा के नेताओं के आरोप थे कि गहलोत सरकार तुष्टिकरण कर रही है और हिंदुओं पर ही मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं और उन्हीं पर एकतरफा कार्रवाई हो रही है? करौली-जोधपुर-भीलवाड़ा जिले में हुए दंगों के षड्यंत्र का आपस में संबंध होने की आशंका को लेकर तत्कालीन पुलिस महानिदेशक एमएल लाठर ने एडीजी बीजू जॉर्ज जोसफ के नेतृत्व में गठित 6 सदस्यीय टीम डीजीपी के निर्देशों के बाबजूद एक माह में अपनी जांच डीजीपी को नहीं सौंप पाई। जबकि अब लाठर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। जबकि राजस्थान सरकार के साथ ही तीनों जिलों की जनता जांच कमेटी की रिपोर्ट का इंतजार कर रही है।
पहले करौली व बाद में जोधपुर व भीलवाड़ा में भी हुआ उपद्रव
गौरतलब है कि राजस्थान में 2 अप्रैल को करौली जिले से शुरू हुआ उपद्रव पहले जोधपुर और फिर भीलवाड़ा में हुआ था। इसने प्रदेशभर की शांति व कानून व्यवस्था को प्रभावित किया। राजस्थान के करौली, भीलवाड़ा, जोधपुर में हुई घटना को लेकर माना जा रहा है कि यह एक सोची समझी साजिश का परिणाम है। लगातार तीन जिलों में अलग-अलग समय पर हुए उपद्रव को पुलिस भी संभावित रूप से एक षड्यंत्र मान रही है और इसकी पुष्टि को लेकर पूर्व पुलिस महानिदेशक एमएल लाठर के निर्देश पर अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस बिजिलेंस बीजू जॉर्ज जोसेफ के नेतृत्व में वरिष्ठ आईपीएस राजेंद्र सिंह, आईपीएस गौरव यादव, किशोर बुटोलिया, चक्रवर्ती सिंह और रामचंद्र की 6 सदस्यीय स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का गठन कर जांच के निर्देश दिए थे।
तीनों घटनाओं में उपद्रवियों के लिंक पता लगाना था
एसआईटी का गठन करने का मुख्य कारण यह था कि तीनों जिलों की घटनाओं की समीक्षा की जाए। इसमें पता लगाया जा सके कि तीनों घटनाओं में क्या समानता है, उपद्रवियों की कोई आपस में लिंक, या कोई ऐसी बाते जो तीनों घटना में समान हो। यहां तक की तीनों घटनाओं में उपद्रवियों के रिश्तेदारों तक का आपस में कोई लिंक होने की संभावना पर भी टीम को कार्य करना था। इसकी जांच रिपोर्ट टीम को एक माह में डीजीपी को सौंपनी थी। अब डीजीपी रिटासर हो चुके हैं और एक साल से अधिक समय हो गया रिपोर्ट सामने नहीं आ पाई। टीम ने जोधपुर से इसकी जांच तो शुरू कर दी लेकिन एक साल से अधिक समय हो गया टीम तीनों जिलों में जांच पूरी नहीं कर पाई।
तीन साल में साम्प्रदायिक हिंसा की पांच प्रमुख बड़ी घटनाएं, सभी मामलों में जांच ठंडे बस्ते में :
8 अक्टूबर 2019 को टोंक जिले में दशहरा का जुलूस निकाला जा रहा था। कुछ उपद्रवियों ने मालपुरा कस्बे में जुलूस में शामिल लोगों पर पथराव शुरू कर दिया। इसके बाद हिंसा भड़क गई। हालात काबू में करने के लिए प्रशासन ने इंटरनेट सेवा बंद कर कर्फ्यू लगाया। साथ ही कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए टोंक और जयपुर से अतिरिक्त पुलिस बल बुलाकर शहर में तैनात किया गया। बारां में 11 अप्रैल 2021 को दो युवकों की हत्या हुई। इसका आरोप दूसरे समुदाय के लोगों पर लगा। इसके बाद हिंसा भड़क गई। हालात काबू में करने के लिए पुलिस ने इंटरनेट बंद कर कर्फ्यू लगा दिया। हिंसक भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले दागने पड़े। 19 जुलाई 2021 को झालावाड़ में दो समुदाय के युवाओं के बीच किसी बात पर विवाद हो गया। इसके कुछ देर बाद यहां हिंसा भड़क गई। घरों, दुकानों और बाइकों में आगजनी और तोड़फोड़ की जाने लगी। बल प्रयोग कर पुलिस ने लोगों को काबू किया। अफवाहों को रोकने के लिए प्रशासन ने कुछ इलाकों में तीन दिन के लिए इंटरनेट सेवा बंद कर दी। इस दौरान हिंसा भड़काने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में पुलिस ने 200 से ज्यादा लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया था।
गत साल करौली में दो अप्रेल को हिंदू नव वर्ष पर युवकों ने बाइक रैली निकाली। रैली पर पथराव के बाद हिंसा भड़क गई। उपद्रवियों ने 35 से ज्यादा दुकानों, मकानों और बाइकों को आग के हवाले कर दिया। हालात काबू में करने के लिए प्रशासन ने जिले में कर्फ्यू लगाया और फिर इंटरनेट सेवा भी बंद कर दी। हिंसा में पुलिसकर्मियों सहित 43 से ज्यादा लोग घायल हुए। इस हिंसा के बाद लगे कर्फ्यू के कारण शहर के लोग करीब 15 दिन तक घरों में कैद रहे थे। इसी साल दो मई 2022 को जोधपुर में परशुराम जयंती पर भी भारी भरकम बवाल हुआ। इस दौरान जालोरी गेट चौराहे पर झंडे लगाए गए। देर रात ईद को लेकर समाज के लोगों ने इसी चौराहे पर झंडे लगाने की कोशिश की। इस दौरान दोनों पक्षों में मारपीट हो गई। दोनों समुदाय के लोग आमने-सामने आ गए और पत्थरबाजी शुरू हो गई। पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले दागकर कर हालात काबू में किए।
2013 से 2020 के बीच राज्य में हुए 3300 से ज्यादा दंगे, उपद्रव, जिम्मेदार कौन आज तक पता नहीं :
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2013 से 2020 के दौरान सूबे में 3 हजार 342 दंगे-उपद्रव हुए। इस दौरान 2013 में सबसे ज्यादा 542 दंगे हुए। 2014 में 536 तो 2015 में 424 दंगे हुए। सबसे कम 269 दंगे 2016 में हुए। 2017 में 435, 2018 में 392, 2019 में 349 और 2020 342 दंगे उपद्रव राजस्थान में हुए हैं। 2021 के सांप्रदायिक दंगों के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
कांग्रेस हो या भाजपा सरकार, दंगे होते रहे, कारण पता ही नहीं चलता
राजस्थान में चाहे कांग्रेस सरकार हो या भाजपा की। दंगे होते रहे हैं। मजे कि बात है कि सरकारें बदलती रहती है। दंगे होते रहते हैं और कारण का पता नहीं चलता। अब गत साल के दंगों को ही लें अभी तक कारण पता नहीं चल पाया है। वसुंधरा सरकार के कार्यकाल में भी दंगे हुए मगर कारण आज तक सामने नहीं आ पाए। राजस्थान कहने को शांतिप्रिय प्रदेश रहा है। मगर पिछले कुछ सालों से यह भी दंगे की आग से बच नहीं पाया है। गत साल जोधपुर में जो दंगा हुआ उसके बाद जलशक्ति मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत का कहना था कि मुख्यमंत्री गहलोत गुलदस्ते लेते रहे और जोधपुर में दंगा भड़कता रहा। शेखावत ने साफ-साफ आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जोधपुर में दंगे के बाद जोधपुर लंबे समय तक नहीं आए। लोगों के जख्मों पर मरहम लगाना भी उचित नहीं समझा।
