…सुधीर अग्रवाल… दरअसल दैनिक भास्कर की नौका के असली खिवैया अब वे ही हैं। उनकी टीम में एक से एक धुरंधर होंगे और हैं भी। मगर इस ग्रुप को जो एक सोच चला रही है वो सुधीर अग्रवाल ही है। यह व्यक्ति काफी गंभीर है। सोच समय से आगे की है। इनकी भाषा पर पकड़ है। वाणी में संयम हैं। इनके दिमाग में हमेशा कुछ नया कर गुजरने का स्थान खाली रहता है। एक मालिक और एक कर्मचारी के बीच का रिश्ता हमेशा कड़वाहट और सख्ती भरा रहता आया है। मगर आज यह मुलाकात बता गई कि अपने कर्मचारियों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखकर भी काम करवाया जा सकता है।…
डीके पुरोहित. जोधपुर
14 करोड़ पाठकों का इतिहास रचने वाला दैनिक भास्कर…। दरअसल दैनिक भास्कर ने इतिहास रचा ही नहीं है, बल्कि इतिहास बदला है। पत्रकारिता के मानदंडों को बदल कर रख देने और अपनी नवीन सोच और जर्नलिज्म की दुनिया को ऊंचाइयों पर ले जाने का जो जज्बा दैनिक भास्कर ने दिखाया है उसके पीछे इनके चेयरमैन स्व. रमेशचंद्र अग्रवाल की महान सोच रही है। वे महान थिंकर थे। वे महान थिंकर के साथ महान प्रबंधक और कुशल विक्रेता भी थे जो बिजनेस डेवलप करने के सारे गुण जानते थे। उनके देवलोकगमन के बाद एक रिक्तता दैनिक भास्कर की यात्रा में आई। इस यात्रा की कमी तो हमेशा रहेगी। मगर देखा जाए तो दैनिक भास्कर के एमडी सुधीर अग्रवाल ने अपने पिता के सपनों को जिया और अपने पिता की सोच को नव ऊंचाइयों पर ले जाते हुए अपनी आधुनिक सोच से इसके ग्राफ को गिरने नहीं दिया। डीबी कॉर्प आज देश की प्रतिष्ठित कंपनी है। डीबी कॉर्प के एमडी सुधीर अग्रवाल गुरुवार को जोधपुर में थे। उनसे जोधपुर प्रवास के दौरान आधे घंटे की आत्मीय मुलाकात हुई। वो आधा घंटे की यादगार मुलाकात, चेहरे पर सौम्य मुस्कान, पैर जमीं पर, सोच आसमां पर, कार्मिकों के साथ आत्मीय व्यवहार, भीड़ से अलग व्यक्तित्व…यह मुलाकात मेरे जेहन में हमेशा याद रहेगी। इसलिए भी कि उस भीड़ में आज मैं एक श्रोता के रूप में था। बड़े आदमी जब बोलते हैं तो अच्छा यही होता है हम अच्छे श्रोता बने रहें। एक मैं श्रोता था और एक कपिल भटनागर जो कि दैनिक भास्कर जोधपुर यूनिट के संपादक है, वे भी श्रोता थे। उस आधे घंटे की मुलाकात के दौरान एमडी सुधीर अग्रवाल बोलते रहे। उनके एक-एक शब्द में एक संदेश था। एक एक शब्द सारगर्भित था। बिल्कुल भी अहं उनकी भाषा में नहीं था, मगर स्वाभिमान और विजेता का भाव जरूर था जो कि दैनिक भास्कर को भीड़ से अलग बनाता है।
उन्होंने एक बात कही जो उनकी सारी बातों का सार है। और वो यह है कि अगर आपके पास ब्रेन है। यानी आपके पास दिमाग है। आइडिया है तो आपको कोई पराजित नहीं कर सकता। मशीन भी नहीं। आज एआई का जमाना है। लोगों को लगता है कि एआई से हमें खतरा है। मगर एआई को सिर्फ आदमी का ब्रेन हरा सकता है। वरना एआई आने वाले समय में बहुत ही खतरनाक रूप ले सकता है। लेकिन एआई डाटा के आधार पर काम करता है, लेकिन यह भी सच है कि वह अपने आपको इंप्रूव करता रहता है और आने वाले समय में उसकी भूमिका बढ़ जाएगी। सुधीर अग्रवाल ने एक बात कही। वो यह कि जब तक आपके पास दिमाग है, ब्रेन है, आपको एआई से डरने की जरूरत नहीं है। आइडिया ही आपको टेक्नोलॉजी से आगे ले जाएगा। मशीन से अगर कोई लड़ सकता है तो वह केवल ब्रेन है। क्योंकि ब्रेन ने ही मशीन को बनाया है और मशीन से केवल ब्रेन ही लड़ सकता है।
सुधीर अग्रवाल दरअसल दैनिक भास्कर की नौका के असली खिवैया अब वे ही हैं। उनकी टीम में एक से एक धुरंधर होंगे और हैं भी। मगर इस ग्रुप को जो एक सोच चला रही है वो सुधीर अग्रवाल ही है। यह व्यक्ति काफी गंभीर है। इनकी भाषा पर पकड़ है। वाणी में संयम हैं। इनके दिमाग में हमेशा कुछ नया कर गुजरने का स्थान खाली रहता है। एक मालिक और एक कर्मचारी के बीच का रिश्ता हमेशा कड़वाहट और सख्ती भरा रहता आया है। मगर आज यह मुलाकात बता गई कि अपने कर्मचारियों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखकर भी काम करवाया जा सकता है। बात कहने के लिए जरूरी नहीं कि चिल्लाकर ही कहा जाए। जैसा कि दैनिक भास्कर के कुछ संपादक 360 डिग्री चिल्लाकर और गाली-गलौज करने में अपनी सफलता समझते आए। पर इतनी बड़ी कंपनी और इतने बड़े अखबार के मालिक का विनम्र स्वभाव देखकर लगा ही नहीं कि यह व्यक्ति सरकारों को हिलाने वाले अखबार का मालिक है। यह वो ताकतवर शख्स है जो ठान ले तो किसी मुख्यमंत्री को या प्रधानमंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दे। जिसके ठान लेने से एक ही रात में सिस्टम बदल जाते हैं। एक व्यक्ति जो जितना ताकतवर होता है वो उतना ही विनम्र भी होता है। जैसे फलों से लदा पेड़ नीचे की ओर झुका होता है वैसे ही सुधीर अग्रवाल का स्वभाव है। यह व्यक्ति भावों से भरा और फलों से लदा पेड़ है। हमें इनसे सीखने की जरूरत है। सीखने की कोई उम्र नहीं होती। मुझे याद है जब मैं आज से 22 साल पहले दैनिक भास्कर में आया था तब सुधीर अग्रवाल भी युवा थे। वे रमेशचंद्र अग्रवाल के साथ यदा-कदा जोधपुर आते रहते थे। मगर तब मैं इतना सीरियशली नहीं रहता था। हालांकि मैं अपने प्रोफेशन में हमेशा सीरियस रहा, मगर संबंध बनाने में हमेशा कैज्युल बना रहा। मैंने किसी भी संपादक की चमचागिरि कभी नहीं की और अपने को संपादक को खास बनाने की कोशिश भी नहीं की। इसका मुझे नुकसान भी उठाना पड़ा। मगर मुझे आज भी कोई मलाल नहीं है। मुझे इस बात कि खुशी है कि मैं सुधीर अग्रवाल के एमडी रहते आज उनसे आत्मीय मुलाकात कर पाया। यह आलेख मैं उन्हें खुश करने के लिए भी नहीं लिख रहा हूं। क्योंकि मैं किसी का स्थाई रूप से प्रशंसक रहूं इसकी गारंटी मैं खुद भी नहीं देता हूं। क्योंकि खरी-खरी कहने कि मुझे बीमारी है। इसलिए मैं सुधीर अग्रवाल से पहले ही माफी मांग लेता हूं कि भविष्य में मुझे कुछ लिखना पड़े तो एक लेखक और पत्रकार की स्वतंत्रता समझकर उसके अधिकारों का हनन ना होने दें। जिस स्वतंत्र पत्रकारिता का दैनिक भास्कर पक्षधर रहा है और वैचारिक क्रांति का सूत्रपात करता आया है उसी परंपरा के पथ पर चलने के पथिक की राह को बाधित ना होने दें।
तो सुधीर अग्रवाल हमारे बीच में थे। उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात कही। वो यह थी कि जो संस्था परिवर्तन को स्वीकार करती है वही आगे बढ़ती है। इतिहास गवाह है जिस संस्था ने बदलावों को स्वीकार नहीं किया तो कभी तरक्की नहीं कर पाई। सुधीर अग्रवाल ने कई कंपनियों के उदाहरण दिए, जिसका उल्लेख करना उचित नहीं होगा। मगर वो उदाहरण एक दम सटीक थे। चाहे इलेक्ट्रॉनिक कंपनी के उदाहरण हो, चाहे मोबाइल कंपनी के उदाहरण हो। उन्होंने कहा कि मार्केट में बने रहने के लिए भविष्य की नब्ज को पहचानना होगा। जो दूरगामी सोच रखकर आगे बढ़ता है, वही मार्केट में बना रहता है। दैनिक भास्कर के एमडी के रूप में सुधीर अग्रवाल के व्यक्तित्व का वर्णन करना ही काफी नहीं होगा। क्योंकि यह वो व्यक्ति है जिसमें एडिटोरियल के सभी गुण मौजूद है। एक खबर में क्या होना चाहिए और एक खबर में क्या नहीं होना चाहिए, इसकी पूरी जानकारी यह व्यक्ति रखता है। इन्हें अखबार और डिजिटल मीडिया के साथ विभिन्न प्लेटफॉर्म का जबरदस्त नॉलेज हैं। मार्केटिंग और सेल्स के सारे गुण इन्हें पिता से विरासत में मिले हैं। मैंने पवन अग्रवाल, गिरीश अग्रवाल और अन्य रिश्तेदारों के बारे में कुछ-कुछ स्टडी की है। पर इस व्यक्तित्व ने ही मुझे प्रभावित किया। क्योंकि इस समय पूरे देश ही नहीं पूरी दुनिया की नजरें केवल और केवल सुधीर अग्रवाल पर टिकी हुई है। विदेशी अखबारों के साथ टाइअप करने का जो आइडिया दैनिक भास्कर ने अपनाया उससे इसकी वैश्विक सोच को मान्यता मिली और विदेशों में दैनिक भास्कर की साख बढ़ी है।
पर एक बात मुझे हमेशा जेहन में आती है और मैं नहीं जानता मैं कहां तक सही या गलत हूं। वो यह कि सुधीर अग्रवाल के सामने एक प्लेटफॉर्म तैयार रहा। यानी कि जबसे उन्होंने होश संभाला अपने को दैनिक भास्कर ग्रुप की विरासत का उत्तराधिकारी ही पाया। उन्हें कुछ भी नया स्थापित करने की जरूरत नहीं पड़ी। यह बात अलग है कि आप अपनी विरासत को बचाकर रखने में कितना सफल होते हो, उस दृष्टि से आप सफल रहे। लेकिन जैसा कि होता आया है एक राजा का बेटा जो अगला राजा होता है वो नया क्या करता है? हम चाहे मुगल कालीन शासकों का उदाहरण दें चाहे रघुकुल वंश परंपरा का उदाहरण दें। हर राजा और उसके उत्तराधिकार ने अपने को भीड़ से अलग साबित किया है। इस दृष्टि से देखें तो सुधीर अग्रवाल ने दैनिक भास्कर की विरासत को जरूर संभाला है, और अच्छे ढ़ंग से संभाला है। मगर अभी बहुत कुछ करना बाकी है। कुछ ऐसा करना बाकी है जो दुनिया को बताए कि सुधीर अग्रवाल भीड़ से अलग है। जो विरासत उन्हें मिली उन्हें बचाए रखने की जरूरत तो है, परंतु क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ और प्रतिमान पत्रकारिता के फील्ड में गढ़े जाएं। अगर आपके पास टाइम नहीं हो तो आप अपने उत्तराधिकारी तैयार कर सकते हो। आप अपनी टीम से कुछ नया करने का सिलसिला शुरू कर सकते हो। यह बात सही है कि आपको इतना कुछ मिल गया है कि नया करने की जरूरत नहीं है। मगर मैं आपके अपने शब्द ही दौहराता हूं कि जो विरासत के फलों का रस पीते रहते हैं तो एक दिन वो फल भी खत्म हो जाते हैं। क्यों न नए पेड़ लगाए जाए। अलग अलग फलों के पौधे लगाकर उन्हें पेड़ बनाया जाए ताकि नया प्राकृतिक वातावरण सृजित हो। हो सकता है कि सुधीर अग्रवाल इन बातों को महत्व न दें। पर यह बात अपनी जगह सही है। जर्नलिज्म के क्षेत्र में नई पौध लगाने की जरूरत है। जो है उसे बचाए रखने के साथ-साथ नए प्लेटफॉर्म और नए प्रतिमान गढ़ने की भी जरूरत है। हर बात साफ-साफ नहीं कही जाती। कुछ बातें इशारों इशारों में कही जाती है और उन्हें इशारों इशारों में समझना भी पड़ता है।
