जस्टिस वर्मा के केस के बहाने हिन्दुस्तान की न्यायिक प्रणाली के विभिन्न पहलुओं पर यह विचारोत्तेजक आलेख प्रकाशित किया जा रहा है, हमारा उद्देश्य किसी वर्ग विशेष की भावनाओं का आहत करना नहीं है ना ही किसी को नीचा दिखाना। हम तो केवल एक बहस और विचार देश के सामने रख रहे हैं…पाठकों की प्रतिक्रिया का हम स्वागत करेंगे। आप हमें 9340931517 पर वॉट्सएप कर अपने विचार भेज सकते हैं। कोशिश रहेगी कि उन्हें पोर्टल में स्थान मिलें-संपादक
डीके पुरोहित की विशेष रिपोर्ट. नई दिल्ली
दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने और वहां भारी मात्रा में कैश मिलने की खबरें मीडिया में छाई हुई हैं। यह साजिश है, अफवाह है या इसमें सच्चाई है? दिल्ली फायर डिपार्टमेंट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने कैश मिलने की खबर को पूरी तरह खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे “गलत सूचना और अफवाह” बताया, जबकि फायर डिपार्टमेंट ने कहा कि घटनास्थल पर ऐसा कुछ भी नहीं मिला था। इस मामले में कुछ सुलगते सवाल है जिस पर अब मंथन करने का वक्त आ गया है।
बात आगे बढ़ाने से पहले एक वाक्या बताना चाहता हूं। एक प्रकरण जोधपुर के एक न्यायालय में चल रहा था। प्रार्थी सामान्य आदमी था पर अच्छी खासी नौकरी पर था और पति-पत्नी दोनों कमाते थे। उसकी पत्नी की कैंसर से मौत हो गई थी और पत्नी के पीहर वालों ने उस पत्नी के पति पर उसकी मौत की जिम्मेदारी डालते हुए सारी संपत्ति हड़प ली और नन्हीं बच्ची से भी नहीं मिलने दिया जा रहा था। वह पति यानी बच्ची का बाप जब भी अपनी बेटी से मिलने की कोशिश करता तो पीहर वाले पुलिस को बुला लेते और बाप को मानसिक प्रताड़ना देकर अपनी ही बच्ची से मिलने नहीं दिया जाता। नन्हीं बच्ची के मन में पिता के प्रति नफरत घोली गई कि उसकी मां की मौत तेरे पिता के कारण हुई। यही नहीं मानवाधिकार आयोग के लोग भी उस पति के साथ ज्यादती करते रहे। पूरे प्रकरण में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर प्रार्थी ने आरोप लगाए थे। इस पूरे प्रकरण की राइजिंग भास्कर ने स्टोरी प्रकाशित की थी। केस लंबा खिंच रहा था और प्रार्थी पेशी दर पेशी पर आ रहा था। मगर जो महत्वपूर्ण बात है वह यह कि जज ने एक दिन गुस्से में आकर प्रार्थी की फाइल उस प्रार्थी के मुंह पर दे मारी और कहा कि तुम्हारे कहने से जल्दी जजमेंट नहीं होगा, टाइम तो लगेगा।…आदमी जब परेशान होता है तभी कोर्ट की शरण लेता है। मगर नकचढ़े जज ने उस प्रार्थी की पीड़ा को नहीं समझा और अपनी भड़ास उस प्रार्थी पर निकाल दी। यह अराजक हो रहे जजों की मनोस्थिति पर एक छोटा सा लिखने का प्रयास है। अब आते हैं मूल बात पर।
मूल बात यह है कि हिन्दुस्तान में यह साफ हो चुका है कि यहां पर चार कानून चलते हैं- 1-राजनीति 2-नौकरशाही 3-पूंजीवादी ताकतें और 4- न्यायपालिका…। इस बीच पांचवां कानून कहें तो यूनियनें या दबाव समूह। और छठा कानून पेशेवर लोग हैं जिनमें डॉक्टर, वकील, सीए, सीएस और अन्य पेशेवर वर्ग शामिल हैं। तो ये ताकतें ही लोकतंत्र को बर्बाद कर रहे हैं। यहां लोकतंत्र के नाम पर इन सारी ताकतों ने अराजगता फैला रखी है। इस बात को मैं पुख्ता करते हुए प्रसिद्ध पत्रकार सुधीर चौधरी की एक रिपोर्ट का हवाला देना चाहूंगा। चौधरी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत में 145 करोड़ जनता में 10 लाख की आबादी ऐसी है जो वीआईपी कल्चर की है। यही वीआईपी लोग इस देश को चला रहे हैं। इन 10 लाख वीआईपी लोगों के मुताबिक देश की व्यवस्थाएं चल रही हैं। इन्हीं 10 लाख लोगों में राजनीति, नौकरीशाही, पूंजीवादी ताकतें, न्यायपालिका और दबाव समूह व पेशेवर लोग आते हैं। यह तो हुई सुधीर चौधरी की बात। अब हम यह कहना चाहते हैं कि ये 10 लाख लोग पूरे देश को नचा रहे हैं। अब आज के उस मुद्दे पर आते हैं जिस पर मूल आलेख लिखा जा रहा है। वो यह कि दिल्ली हाईकोर्ट के जज के बंगले से करोड़ों की राशि मिलना जब तक साबित नहीं हो जाता तब तक जज को इस्तीफा देना चाहिए या उनका स्थानांतरण करना उचित है?
सबसे पहले आते हैं मूल बातों पर । हाईकोर्ट में जज की नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है? इस पर भी गौर कर लें। भारत में उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) के न्यायाधीश की नियुक्ति की प्रक्रिया संविधान द्वारा निर्धारित की गई है और यह प्रक्रिया पारदर्शी और सम्यक होती है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया निम्नलिखित है-
1. न्यायाधीश की योग्यता
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217(2) के अनुसार, एक व्यक्ति को उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त करने के लिए कुछ प्रमुख योग्यताएं होती हैं-
उसे भारतीय का नागरिक होना चाहिए।
वह उस राज्य के अधिवक्ता (वकील) के रूप में कम से कम 10 साल तक कार्य कर चुका हो या फिर वह उच्च न्यायालय के किसी अधीनस्थ न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य कर चुका हो।
वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए।
2. न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए चयन प्रक्रिया
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए मुख्य प्रक्रिया “कोलेजियम सिस्टम” के तहत होती है। यह प्रणाली न्यायपालिका के भीतर न्यायाधीशों द्वारा ही नियुक्तियों के फैसले लेने पर आधारित है।
कोलेजियम प्रणाली
कोलेजियम: उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का एक समूह है, जो नियुक्ति और स्थानांतरण से संबंधित निर्णयों को लेते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय का कोलेजियम: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सर्वोच्च न्यायालय का कोलेजियम जिम्मेदार होता है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होते हैं।
उच्च न्यायालय का कोलेजियम: एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए उस उच्च न्यायालय का कोलेजियम जिम्मेदार होता है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होते हैं।
प्रक्रिया
1. सुझाव: उच्च न्यायालय के कोलेजियम द्वारा उस राज्य के न्यायालय में एक न्यायाधीश के लिए नियुक्ति का प्रस्ताव सर्वोच्च न्यायालय के कोलेजियम को भेजा जाता है। इस प्रस्ताव में उस न्यायाधीश के चयन के लिए सिफारिश की जाती है।
2. सर्वोच्च न्यायालय का कोलेजियम: सर्वोच्च न्यायालय का कोलेजियम इस प्रस्ताव पर विचार करता है, जिसमें न्यायाधीशों की योग्यता, अनुभव, और उनके द्वारा किए गए कार्यों की समीक्षा की जाती है।
3. सिफारिश: सर्वोच्च न्यायालय का कोलेजियम यदि उपयुक्त समझे तो प्रस्ताव को स्वीकार कर एक सिफारिश राष्ट्रपति को भेजता है।
4. राष्ट्रपति की मंजूरी: राष्ट्रपति उस सिफारिश को स्वीकार करते हुए न्यायाधीश की नियुक्ति की अधिसूचना जारी करते हैं। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही उस न्यायाधीश की नियुक्ति को अंतिम रूप मिलता है।
3. न्यायाधीशों का स्थानांतरण
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का स्थानांतरण भी कोलेजियम प्रणाली के तहत किया जाता है। यदि किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को दूसरे राज्य के उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करना हो, तो यह निर्णय कोलेजियम द्वारा लिया जाता है।
4. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा प्रस्तावित नामों की सहमति
1993 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले (कांस्टीट्यूशनल बेंच द्वारा) में यह निर्णय लिया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के कोलेजियम के निर्णय को अंतिम माना जाएगा। इसे “कोलेजियम प्रणाली” के रूप में जाना जाता है, जिसके तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति का फैसला न्यायपालिका ही करती है और इसे सरकार के हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाता है।
और अब यह भी जानिए…
अगर हाईकोर्ट के जज पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो हटाने की प्रक्रिया क्या है?
अगर किसी उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) के न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो उसे हटाने की प्रक्रिया भारतीय संविधान और भारतीय न्यायपालिका के नियमों के तहत कड़ी होती है। भारत में न्यायाधीशों को उनके कार्यकाल के दौरान केवल बहुत ही गंभीर कारणों से ही हटाया जा सकता है और यह प्रक्रिया पारदर्शी और संरक्षित होती है।
न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया
1. महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को केवल “अनुशासनात्मक कारणों” (जैसे भ्रष्टाचार या अनुशासनहीनता) पर हटाया जा सकता है। इस प्रक्रिया को एक विशेष जांच और अनुमोदन से गुजरना होता है।
2. जांच और प्रस्ताव:
जब किसी न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, तो यह सबसे पहले न्यायपालिका के आंतरिक तंत्र द्वारा जांचा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश और कुछ वरिष्ठ न्यायाधीशों द्वारा इस आरोप की जांच की जा सकती है।
अगर आरोपों की गंभीरता सामने आती है, तो उसके बाद संसद में एक नियुक्ति कमीशन (Impeachment Motion) का प्रस्ताव लाया जा सकता है।
3. संसद में बहुमत से प्रस्ताव:
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए संसद में एक विशेष प्रक्रिया का पालन किया जाता है।
लोकसभा या राज्यसभा में प्रस्ताव: संसद के किसी भी सदस्य द्वारा प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकता है कि उक्त न्यायाधीश को भ्रष्टाचार या गंभीर अपराध के कारण पद से हटा दिया जाए।
बहुमत से पारित प्रस्ताव: इस प्रस्ताव को दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में दो तिहाई बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक है।
4. राष्ट्रपति की मंजूरी
यदि संसद दोनों सदनों में यह प्रस्ताव पारित करती है, तो राष्ट्रपति को उसे लागू करने की मंजूरी देनी होती है। इसके बाद ही उस न्यायाधीश को पद से हटा दिया जाता है।
हाईकोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया जटिल…बाप रे बाप इतना झमेला, उम्र बीत जाए हटाने में…
हमारे सामने हाईकोर्ट जज की नियुक्ति, स्थानांतरण और हटाने की प्रक्रिया अब सामने हैं। देखा जाए तो हाईकोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि उम्र बीत जाए उन्हें हटाने में। सबसे पहले इस बात पर गौर करना होगा कि क्या भारत के हाईकोर्ट में जजों की स्वतंत्र रूप से नियुक्ति होती है? कहने को कोलेजियम सिस्टम है, मगर ऐसा होता नहीं। एक हाईकोर्ट के जज में राजनीतिक ताकतों की ही चलती है। राजनीति से ही हाईकोर्ट के जज की नियुक्ति और स्थानांतरण तय होता है। यही नहीं कई प्रकरणों में नियुक्ति के पीछे कई कारण होते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत की संपूर्ण न्याय प्रक्रिया पारदर्शी है? आम आदमी को न्याय मिलता है? इस पर कुछ लिखें इससे पहले विचार करते हैं सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश का कथन- सुप्रीम कोर्ट के उस पूर्व न्यायाधीश का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट से आपको न्याय पाना हो तो आपकी जेब में 100 करोड़ रुपए होने चाहिए…यह वक्तव्य कुछ साल पहले अखबारों में प्रकाशित हो चुका है। इस रिटायर्ड जज की बात में दम है। क्योंकि आम आदमी तो अपने केस में न हाईकोर्ट तक पहुंच पाता है न सुप्रीम कोर्ट तक। जिला न्यायालयों तक भी उनकी सुन ली जाए तो काफी है।
दो विचार : 1- अराजक हो रही न्यायपालिका पर किसका नियंत्रण हो? 2-जजों की स्वतंत्रता भी जरूरी
हमारे जेहन में दो विचार आ रहे हैं। सबसे पहला यह कि अगर न्यायपालिका अराजक हो रही है तो उस पर किसका नियंत्रण हो? दूसरा यह कि जजों की स्वतंत्रता भी जरूरी है। यह दो विचार अपनी अपनी जगह पर लंबी बहस का विषय है। सबसे पहले विचार करना चाहिए कि अगर न्यायपालिका अराजक हो जाए तो उस पर किसका नियंत्रण हो? जैसा कि इन दिनों हो रहा है। इस पूरे प्रकरणों में आम आदमी तो कहीं है ही नहीं क्योंकि वह न्यायपालिका के लिए आम आदमी ही रहा। दूसरा हाईप्रोफाइल मामलों में कभी तो पक्षकार को जल्द जमानत मिल जाती है। कई बार अपराधी आसानी से छूट जाते हैं। कई प्रकरणों में 30-30 साल फैसले नहीं आते। जैसे कि आतंकवादी हमलों और सीरियल बम ब्लास्ट के मामलों में आए। ऐसे में परिस्थितियां पूरी तरह बदल जाती है। गवाह मुकर जाते हैं। कुछ मर जाते हैं। खुद अपराधी और पक्षकार भी या तो जेल में सड़ते रहते हैं या फिर मर मरा जाते हैं। या फिर बाद में छूट जाते हैं। कई पहलू है। कई आपराधिक मामलों में हाईकोर्ट के जजों की टिप्पणियां ही घातक होती है। कई बार ऐसे फैसले आते हैं जो समाज के लिए गलत संदेश दे जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट तक आते-आते फैसले फिर बदल जाते हैं। दरअसल जिला न्यायालय यानी छोटी अदालत से जो मुकदमा चलता है वह सुप्रीम कोर्ट तक आते-आते पूरी तरह बदल जाता है। अंततोगत्वा अपराधी को सजा तो मिलती ही नहीं है। मिलती है तो तब तक वह पूरी सजा ही काट चुका होता है या मर मरा जाता है। यह कुछ संकेत है। इन सबके बीच महत्वपूर्ण सवाल है कि जजों की स्वतंत्रता पर आंच न आए इसके लिए क्या किया जाए? जज भी आखिर इंसान ही होता है। एक जज जब न्याय की कुर्सी पर बैठ कर फैसला लिखता है तो वह भगवान के बराबर होता है। उसके फैसले पर भगवान भी सवाल ना उठाए इसलिए जरूरी है कि जज को पूरी तरह स्वतंत्र रहने दिया जाए। ऐसा क्या किया जाए कि जज की स्वतंत्रता बनी रहे।
अंग्रेजों की बनाई न्याय प्रणाली ही दोषपूर्ण है…आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत…
बहुत पहले एक कहानी सुनी थी कि एक लड़का एक टीले पर बैठ कर सटीक न्याय कर लेता था। यह टीला जहां बना था वहां कभी राजा विक्रमादित्य का सिंहासन हुआ करता था। विक्रमादित्य न्याय के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। हम उस हिन्दुस्तान की बात कर रहे हैं जहां राजा विक्रमादित्य जैसे न्यायप्रिय हुए हैं। यही नहीं हम उस देश में रहते हैं जहां महर्षि गौतम जैसे ऋषि हुए हैं जो न्याय के लिए प्रसिद्ध हैं। दरअसल दोष अंग्रेजों की उस न्याय प्रणाली में है जिसे हिन्दुस्तान ने आजाद होते ही गुलाम मानसिकता के साथ अपना तो ली मगर उसमें आमूलचूल परिवर्तन नहीं किया। यही कारण है कि हिन्दुस्तान की अदालतें केस और मुकदमों से दबी हुई है। फैसले लंबित पर लंबित है। मकान खाली कराने जैसे प्रकरण और संपत्ति निपटारे जैसे प्रकरण अदालतों में 20-20 साल तक खींच लिए जाते हैं। पूरी न्याय प्रणाली लूट प्रणाली में तब्दिल हो गई है। न्याय प्रणाली में वकील, डॉक्टर, सीए, सीएस, अस्पताल और झूठे गवाह और संस्थान महत्पूर्ण भूमिका निभाते हैं और यह सब मिलाकर एक झूठ तंत्र में तब्दील हो गए हैं। अब कोर्ट न्याय से ज्यादा दंगल का अखाड़ा बन गए हैं। यहां न्याय पाया नहीं न्याय के लिए जंग होती है। जिसके हाथ में जितनी पॉवर, जितने पैसे, उसके लिए न्याय पाना उतना ही आसान हो जाता है। इस बीच एक नई दिशा तय हुई है एसटी-एससी के मुकदमे। एसटी एससी की आड़ में आम आदमी का जीना हराम हो गया है। बाबा अंबेडकर कानून बनकर मसीहा बन गए मगर पीछे छोड़ गए एक अराजगता जिसे अभी ठीक नहीं किया तो कई पीढ़ियां बर्बाद हो जाएंगी। आरक्षण के मामलों में भी इसे ठीक नहीं किया तो हिन्दुस्तान में प्रतिभाएं कुंठित होकर आत्मदाह करने को विवश होगी। हमारे राजनेताओं से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। बुद्धिजीवी जुबानों पर ताला लगाकर बैठे हैं, क्योंकि उनकी दुकानदारी वैसे ही चल रही है। पत्रकार खामोश है क्योंकि उनके पास अब मुद्दे सनातन और हिंदुत्व ही रह गए हैं। देश को किस दिशा में ले जाना है यह अब किसी भी मीडिया के लिए महत्वपूर्ण नहीं रहा। कोई भी मीडिया आरक्षण मुद्दे पर नहीं लिखता। एसटी एससी के केस में जो निर्दोष लोगों के साथ अन्याय होता है, उस पर कोई नहीं लिखता। दहेज हत्या मामलों में जो निर्दोष फंसाए जाते हैं उन पर कोई नहीं बोलता। दुष्कर्म के मामलों में झूठे आरोपों पर कोई नहीं बोलता। हमारे बाबा साहेब ने कुछ लोगों को असीमित अधिकार देकर एक वर्ग विशेष की वैसे ही हत्या कर दी है और रही सही कसर कानूनों में संशोधन करने के बाद हो गई। कानून के पंडित कहीं दिखाई नहीं दे रहे। आज योग्य डॉक्टर देश में टिकते नहीं है और वे विदेश चले जाते हैं क्योंकि अंबेडकर जैसे मनीषियों ने प्रतिभाओं का वैसे ही चीरहरण कर दिया है। तो पनपे दो 40 प्रतिशत के अंक लाने वाले अयोग्य डॉक्टरों को। अब मुन्नाभाई एमबीबीएस का ही जमाना है। यह फिल्म का हम विज्ञापन नहीं कर रहे हैं, हम तो समझाने के लिए कह रहे हैं कि अब ऐसे ऐसे डॉक्टर हमारे देश में आएंगे जो आरक्षण की आंच पर रोटियां सेक रहे हैं। योग्य सिविल सेवकों के अफसर इसीलिए सामने नहीं आ रहे क्योंकि आरक्षण ने सारा तंत्र ही बिगाड़ दिया है। नौकरियों में आरक्षण, पदोन्नति में आरक्षण…। सारा देश आरक्षण तंत्र में तब्दिल हो गया है। हम हमारे आलेख के विषय से कुछ इतर बातें कर रहे हैं। मगर यह आलेख के इतर होते हुए भी आलेख का ही एक भाग है। क्याेंकि इसकी जड़ें हमारे संविधान से ही जुड़ी हुई हैं।
सबसे पहले बाबा साहेब पर मनमाना संविधान बनाने पर मुकदमा चलना चाहिए…
इस बात पर कुछ लोग मुझे सिरफिरा कह सकते हैं मगर हकीकत यही है कि सबसे पहले इस देश में बाबा साहेब अंबेडकर पर मनमाना संविधान बनाने पर मुकदमा चलना चाहिए। क्योंकि उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को देश की अधिसंख्या जनता पर थोपा और कई पीढियों की परवाह न करते हुए उन्हें बर्बाद करने पर छोड़ दिया। बाबा साहेब यह बात भूल गए कि उन्हें विदेश पढ़ाने किसने भेजा। उनके साथ जो भेदभाव हुए तो उनकी प्रतिभा को किसने तराशा? मगर जब देश आजाद हुआ तो उन्होंने आरक्षण और एसटी एसटी के कठोर कानून बनाकर इस देश की बड़ी आबादी को जीवन भर कुंठा-पीड़ा और हताशा के साथ जीने की स्थितियां दे दी। माना कि आज भी देश में परिस्थितियां एसटी एससी और दलित जातियों के लिए हो सकता है अनुकूल नहीं है। लेकिन इसके लिए दोषी कौन? बाबा साहेब जिंदा होते तो पूछते क्या प्रतिभाएं केवल आत्मदाह के लिए पैदा होती है? कुंठित प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने इस देश को मंडल कमिशन की सौगात देकर इस देश की प्रतिभाओं का चीरहरण कर दिया। इसके लिए देश की प्रतिभाएं वीपी सिंह को कभी माफ नहीं करेगी। वीपी सिंह तो मर गए पर अब युवा पीढ़ी उस आग में अभी तक मर रही है। मीडिया खामोश है क्योंकि सच लिखने के लिए जिगर चाहिए। आजा बाबा साहेब के खिलाफ कुछ भी लिखने का अर्थ है देश में बवाल खड़ा करना। मगर हकीकत यही है कि एक कुंठित आदमी ने संविधान को मनमाने ढंग से बनाया और तब देश की स्थितियां हो सकती थी, पर ऐसा नहीं है। पर आज भी देश के कर्णधार कानून को बदलने के लिए तैयार नहीं है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो एक दिन देश में नई क्रांति होगी और उसके लिए देश का युवा अब तैयार हो रहा है। प्रतिभाएं अब आत्मदाह नहीं करेगी। प्रतिभाएं हताशा में फांसी का फंदा नहीं लगाएंगी। वे विद्रोह करेंगी। बाबा साहेब के कानूनों को बदलने की जरूरत है। अब बात फिर से मूल आलेख पर…
क्या जस्टिस वर्मा के खिलाफ कोई साजिश हो रही है?
अब सवाल उठ रहा है कि अगर जस्टिस वर्मा के सरकारी बंगले पर कोई कैश नहीं मिला तो क्या उनके साथ साजिश हो रही है? जस्टिस वर्मा 11 अक्टूबर 2021 को दिल्ली हाईकोर्ट में जज बने। 13 अक्टूबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट में एडिशनल जज और 1 फरवरी 2016 को स्थाई जज बने। 6 जनवरी 1969 को जन्म वर्मा ने दिल्ली में बीकॉम आनर्स और मध्य प्रदेश के रीवा विवि से एलएलबी की डिग्री ली। मीडिया में जब जस्टिस वर्मा के सरकारी बंगले से कैश मिलने और आग लगने के समाचार उछले तो सबसे पहले क्या होना चाहिए था? क्या जस्टिस वर्मा से इस्तीफा लेना चाहिए था या उनका स्थानांतरण करना उचित है? किसी क्रिया की प्रतिक्रिया अवश्य होती है। प्रतिक्रिया में ही क्रिया का समाधान छिपा होता है। अब अगर जस्टिस वर्मा का स्थानांतरण किया जाता है तो यह उचित ही जान पड़ता है। क्योंकि इस्तीफा तक तक नहीं लिया जा सकता जब तक जस्टिस वर्मा दोषी साबित नहीं हो जाते। अभी तक सुप्रीम कोर्ट खुद इसे अफवाह बता रहा है। फायर डिपार्टमेंट ने कहा कि घटनास्थल पर ऐसा कुछ भी नहीं मिला था। फिर सवाल उठता है कि जस्टिस वर्मा के मामले में क्या किया जाए? किसी की नौकरी तब तक नहीं ली जा सकती जब तक उसका दोष सिद्ध ना हो जाए। इस मामले में पहले जांच करवाई जाए। जांच में जब साबित हो जाए कि जस्टिस वर्मा के बंगले में रुपए मिले थे या नहीं? अगर मिले थे तो ये रुपए कहां से आए? रुपयों के आने की वजह क्या थी? दूसरा जस्टिस वर्मा की संपत्ति की गोपनीय ढंग से जांच करवाई जाए। क्या उनका कोई ऐसा रिकॉर्ड रहा है? क्या उन पर कभी पहले भी कोई आरोप लगे हैं? क्या उन पर संदेह की कोई वजह है? अब तक का उनका रिकॉर्ड क्या रहा है? इन दिनों वे किस महत्वपूर्ण प्रकरणों पर फैसला देने वाले थे? ऐसे कई सवाल है जिन की तह में नहीं जाने तक उनसे इस्तीफा मांगना उचित नहीं होगा। यह भी हाे सकता है कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ कोई साजिश हो रही हो? क्योंकि यह जज की स्वतंत्रता का मामला है। जज को फैसलों से रोकने के लिए और फैसला बदलने के लिए भी पैसे दिए जा सकते हैं। कुछ भी हो इस मामले में मीडिया रिपोर्ट में सावधानी बरतने की जरूरत है। यह एक ऐसे जज के भविष्य का ही सवाल नहीं है बल्कि हिन्दुस्तान की न्याय प्रणाली पर सवाल उठाती है।
हिन्दुस्तान के संविधान की समीक्षा की जरूरत…क्योंकि 75 साल पहले लिखा वो पत्थर की लकीर नहीं..कुछ धाराहें बदलना पर्याप्त नहीं…
अब हिन्दुस्तान के संविधान की समीक्षा की जरूरत है। कांग्रेस चिल्लाती रहेगी। चिल्लाती रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चाहिए कि देश भर में युवाओं, महिलाओं, बुद्धिजीवियों और एक प्रक्रिया के तहत सुझाव मंगवाने चाहिए। यही नहीं मीडिया इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है अगर वह वाकई कुछ करना चाहे। क्योंकि हमारे संविधान में कई दोष है। यह वही संविधान है जो मुट्ठी भर लोगों को 145 करोड़ देशवासियों पर शासन का अधिकार दे रहा है। कहने को लोकतंत्र है पर हकीकत में 10 लाख लोग ही 145 करोड़ देशवासियों को बैल कर तरह खेतों में जोत रहे हैं। अब वक्त आ गया है कि संविधान की पुनर्समीक्षा की जाए। हालांकि संविधान की धाराहों पर बदलाव किया गया है, पर वो पर्याप्त नहीं है। पूरे संविधान के ढांचे को बदलने की जरूरत है।
खाप पंचायतों द्वारा सामाजिक बहिष्कार व जुर्माना लगाने पर कोर्ट सख्त; 5 सदस्यीय आयोग गठित करने के निर्देश
एक खबर आज ही मीडिया में छाई हुई है। खाप पंचायतों द्वारा सामाजिक बहिष्कार और जुर्माना लगाने की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए राजस्थान हाईकोर्ट सख्त हो गया है। राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस फरजंद अली की बैंच ने विशेषकर पश्चिम राजस्थान में फैल रही सामाजिक बुराइयों पर अंकुश लगाने के लिए पांच सदस्यीय आयोग गठित कर जमीनी हकीकत जानने के लिए विभिन्न गावों का दौरा कर रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इस खबर के बाद यह भी साबित हो गया है कि अभी भी हमारे समाज में बुराइयां कायम है। यह भी सच है कि दलित जातियों के साथ आज भी अन्याय हो रहा है। ऐसे प्रकरण आज भी सामने आ रहे हैं। लेकिन कानून अपना काम कर रहा है। जस्टिस फरजंद अली की बैंच ने बहुत ही अच्छा फैसला दिया है। इससे खाप पंचायतों द्वारा सामाजिक बहिष्कार और जुर्माना लगाने के मामलों की सही रिपोर्ट सामने आने पर कोर्ट बहुत कुछ कर सकेगा। इस बीच यह भी महत्वपूर्ण है कि अदालतों के इतर ऐसा क्या हो कि आम आदमी को त्वरित न्याय मिले?…
उपभोक्ता संरक्षण मंच की तरह भी ऐसे मंच हो जहां एक पोस्टकार्ड और अंतरदेशी पत्र पर या एक ई-मेल पर शिकायत करने से न्याय मिले…
अब समय आ गया है कि अदालतों की महंगी न्याय प्रक्रिया पर लगाम लगाई जाए। अब ऐसे कोर्ट या मंच गठित करने का समय आ गया है जो एक ईमेल, एक पोस्टकार्ड या एक अंतरदेशी पत्र पर शिकायत करने पर न्याय करे। ना ही वकीलों की लंबी चौड़ी फौज हो और ना ही जिरह और अंतहीन बहस। क्यों मामले सुप्रीम कोर्ट तक जाए। पर ऐसा कैसे हो? हमारे देश के कर्णधारों ने कभी विचार ही नहीं किया। अब समय आ गया है कि देश में न्याय प्रणाली पर फिर से मंथन हो। कई परिस्थितियों पर सरकारों ने मानवधिकार आयोग आदि गठित किए हैं, मगर वे भी अपनी उपयोगिता सिद्ध नहीं कर पाए हैं क्योंकि उनकी नियुक्तियां राजनीतिक होती है जो विभिन्न कारणों से प्रभावित होते हैं। हालांकि परस्पर सहमति के आधार पर समय-समय पर अदालतें शिविर लगाती है जिसे लोक अदालत कहते हैं, उसमें पक्षकारों को आमने-सामने बिठाकर फैसलों का निपटारा किया जाता है। यह कुछ समाधान की दिशा में उठाया कदम है। पर असली समस्या को ही जड़ से खत्म करना है तो ऐसे कोर्ट मंचाें की स्थापना करनी होगी जहां केवल एक छोटे से ईमेल और मामूली से पोस्टकार्ड या अंतररदेशी पत्र पर समस्या बताने पर न्याय मिले। अब आम आदमी के पास न तो इतना समय है कि वो 20-20 साल तक मुकदमों में पेशियों के चक्कर काटता रहे और ना ही अदालतों के पास इतना समय और न ही सरकार के पास जज नियुक्त करने का समय। परिस्थितियां दिनों दिन सुधरने की बजाय और जटिल हो होती जा रही है। क्राइम बढ़ता ही जा रहा है। साइबर क्राइम, ऑनलाइन ठगी और डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों से बढ़कर क्राइम चरम पर पहुंच गया है। ऐसे में जजों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। पुलिस और एजेंसियों पर भारी जिम्मेदारी और दबाव है। कुल मिलाकर पूरा ढांचे की पुनसर्मीक्षा की जरूरत है। इसलिए जरूरी है कि ऐसे ऐसे छोटे छोटे न्यायिक मंच गठित कर दिए जाए तो विभिन्न प्रकरणों को समय रहते कुछ ही समय में निपटारा कर दे। इसके लिए हमारो कर्णधारों को अभी से मंथन करना चाहिए।
जस्टिस वर्मा आप अगर निर्दोष हैं तो चिंता ना करें देश आपके साथ है…
जस्टिस वर्मा का मुद्दा अभी काफी गरमा रहा है। लेकिन किसी भी मुद्दे को शांत भाव से देखने की जरूरत है। आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट में जो जज होते हैं वे हर पहलू को देखते हैं। अभी तो जस्टिस वर्मा का केवल स्थानांतरण करने पर बहस छिड़ी हुई है। लेकिन देश की जनता को यह आश्वस्त होना चाहिए कि अगर जस्टिस वर्मा निर्दोष हैं तो उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि पूरा देश उनके साथ है। लेकिन यदि जांच में वे दोषी पाए जाते हैं तो इस देश की जनता की आशाओं पर पानी फिर जाएगा। इसलिए इस देश के कानून में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत महसूस की जा रही है। केवल आरोप से ही दोष सिद्ध नहीं हो जाता। रुपए मिले हैं या नहीं अभी तो यह भी साबित नहीं हो पाया है।
जस्टिस वर्मा के घर से मिले नोटों की आग हवा के रुख पर निर्भर करती है : वरिष्ठ अधिवक्ता एनडी निंबावत की तवरित टिप्पणी
दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से मिले नोटों की आग कहां तक पहुंचेगी ये तो हवा के रुख पर निर्भर करती है और हम सभी जानते हैं कि हवा का रुख तो बदलता रहता है पता नहीं चलता। हां वर्तमान समय में तकनीकी विकास के चलते मौसम विभाग हवा के रुख की भविष्यवाणी सही-सही करने में सफल हो रहा है, लेकिन यहां विभाग दूसरे हैं । दो-चार दिन और अखबारों में यह मुद्दा छाया रहेगा । हम जानते हैं हमारे देश में हर दूसरे-तीसरे दिन एक नया मुद्दा आ जाता है और समाचार पत्र वाले उस नए मुद्दे को जनता तक पहुंचाने में लग जाते हैं और पुराने मुद्दों पर समय की धूल जमने लग जाती है और फिर लोग भूल जाते हैं उस मुद्दे को । इस बात पर मेरा एक शे’र याद आ रहा है-
“हर एक नया ज़ख्म दवा बन जाता है “सागर”
पुराने हर ज़ख्म की, अब कहाँ याद रहेगें पुराने ज़ख्म”
विषय ये कितना गंभीर है ये सोचने वाली बात है कि यदि न्यायपालिका में भी ऐसी घटनाएं होने लगी तो आम आदमी का न्यायपालिका से विश्वास उठ जायेगा। वैसे भी पेचीदे कानून और न्यायालय में लगने वाले समय से आम आदमी त्रस्त है । समय-समय पर न्यायपालिका पर लग रहे आक्षेप लोगों के न्यायपालिका पर के विश्वास पर चोट का कार्य करते हैं । जस्टिस वर्मा के घर नोटों का मिलना भले ही जांच का विषय हो, लेकिन जांच करने वाले एवं निर्णय लेने वाले भी तो उसी श्रेणी के हैं। इसी संदर्भ में मेरी कविता की कुछ पंक्तियां याद आ रही है-
“दामन तो यहां सभी का दागदार है,
गोया कि इन सबका चेहरा शानदार है ।
जो पकड़ा गया वो ही तो चोर है यहां,
बाकी तो “सागर” यहां सभी ईमानदार हैं ।।”
