(क्या गजेंद्रसिंह शेखावत का मुकदमा रिओपन होगा?)
(क्या गजेंद्रसिंह शेखावत की मानहानि करने पर अशोक गहलोत को सजा होगी?)
सरकारी जांच एजेंसियां सरकार की रखेल बन गई है…कोर्ट ने अपनी विश्वसनियता खो दी है, पहले मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत को क्लीन चिट दी, क्या अब जेल में बंद आरोपी भी छूट जाएंगे…पीडितों के साथ कभी न्याय होगा? क्या निवेशकों को उनके रुपए वापस मिलेंगे, या जेल में बंद आरोपी भी छूट जाएंगे? कई सवाल अपनी जगह कायम है, कोर्ट को अगर विश्वसनियता बनाए रखनी है तो सारी कार्रवाई का लाइव प्रसारण किया जाए…
25 मार्च 2025 को मीडिया में रिपोर्ट छपी- ‘संजीवनी सोसायटी घोटाले में न्यायिक देरी पर कोर्ट नाराज’ इस खबर के बाद लगने लगा है कि जेल में बंद आरोपी जल्द छूट जाएंगे, जज पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव तक को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में तलब करने की धमकी देने लगे हैं, जबकि न्यायिक मामलों में देरी में क्या कोर्ट की खुद की गलती नहीं होती? क्यों मामलों को लटकाए रखा जाता है?
विश्वनीय सूत्रों से जानकारी मिली है कि भाजपा सरकार के मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत को हाईकोर्ट ने क्लीन चिट देने में कई तथ्यों पर गौर नहीं किया और एसओजी की मनमानी रिपोर्ट पर क्लीन चिट दी गई…जानकारी मिली है कि शेखावत ने बैकडेट में सोसायटी के पदों से इस्तीफा दिया, कोर्ट ने शेखावत पर आरोप लगने के बाद शेखावत के बैंक खातों को सीज नहीं किया, उनके दस्तावेजों काे जब्त नहीं किया, तब तक तथ्यों और रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ करनेे का शेखावत को मौका मिल गया…
राइजिंग भास्कर की हजारों पीड़ितों और राजस्थान की जनता की ओर से मांग है कि शेखावत को फिर से पक्षकार बनाया जाए और पूरे मामले का लाइव प्रसारण किया जाए ताकि पूरा प्रदेश देखे की अदालतों में क्या धांधेलबाजी हो रही है, जनता को अपने मामलों को जानने का अधिकार है…
डीके पुरोहित की विशेेष रिपोर्ट. जोधपुर
900 से लेकर 1 हजार करोड़ रुपयों के संजीवनी सोसायटी घोटाले मामले में भाजपा सरकार के मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत को हाईकोर्ट ने पहले से ही क्लीचिट दे दी है और अब जेल में बंद आरोपियों के छूटने की भूमिका भी संभवतया तैयार हो रही है। इसका आधार है वो समाचार जो मीडिया में प्रकाशित हुआ है। पहले इस समाचार का उद्धरण दिया जा रहा है-
संजीवनी सोसायटी घोटाले में न्यायिक देरी पर कोर्ट नाराज
-कानूनी अस्पष्टता दुर्भाग्यपूर्ण, 7 अप्रैल तक रिपोर्ट मांगी
जोधपुर। हाईकोर्ट जस्टिस फरजंद अली की बैंच ने संजीवनी क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी से संबंधित मामलों की सुनवाई करते हुए अभियोजन पक्ष की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। इन मामलों में बैनिंग ऑफ अनरेगुलेटेड डिपोजिट स्कीम्स एक्ट और भारतीय दंड संहिता के तहत कार्रवाई की गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेंद्र सिंह दासपां और अधिवक्ता प्रियंका बोराणा ने तर्क दिया कि इन मामलों में बीयूडीएस एक्ट को गलत तरीके से लागू किया गया है। अभियोजन पक्ष की अस्पष्ट स्थिति के कारण आरोपी वर्षों से जेल में है, जबकि अब तक उनके खिलाफ ठोस कानूनी आधार तय नहीं किया गया है। इस बात को लेकर कानूनी बहस जारी है कि क्या इस मामले में बीयूडीएस अधिनियम लागू होता है या नहीं? अभियोजन पक्ष अभी तक इस पर स्पष्ट रुख नहीं अपना पाया है।
साेसायटी का पूरा लेन-देन वर्ष 2018 तक का है, जबकि बीयूडीएस अधिनियम 2019 में लागू हुआ। इसके बावजूद जांच एजेंसी आईपीसी और बीयूडीएस अधिनियम दोनों के तहत मामले दर्ज कर रही है। अभियोजन एजेंसी स्पष्ट नहीं कर पाई है कि आरोपी के खिलाफ केवल भारतीय दंड संहिता के तहत मुकदमा चलेगा या बीयूडीएस अधिनियम भी शामिल होगा। इस छल साल की हिरासत के बाद भी आरोपी को नहीं बताया गया कि उस पर कौन सा कानून लागू होगा।
टालमटोल की तो गृह सचिव को करेंगे तलब
इस स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए जांच एजेंसी को अंतिम अवसर दिया है कि वह अगली सुनवाई 7 अप्रैल 2025 से पहले विस्तृत रिपोर्ट पेश करें। इसके साथ ही निर्देश दिया है कि यदि आगे भी टालमटोल की गई तो प्रमुख गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक को व्यक्तिगत रूप से हाईकोर्ट में तलब किया जाएगा।
कोर्ट की जिम्मेदारी क्या धमकियां देना है, खुद की लापरवाही नजर नहीं आ रही?
पूरे पांच-छह साल आरोपी जेल में बंद रहे। यह तथ्य कोर्ट को अब नजर आने लगा है। रोज कोर्ट में पेशियां टलती रही। एफआईआर पर नई एफआईआर दर्ज होती रही। मामला लंबा खिंचा चला जाता रहा। कोर्ट देखता रहा। क्या कोर्ट की जिम्मेदारी पहले दिन से ही शुरू नहीं हो जाती जब से मामला कोर्ट में दर्ज हुआ। मगर जैसा कि आर्थिक घोटालों के मामलों में होता है और होता आया है। मामला जानबूझकर लंबा खींचा जाता है और अंततोगत्वा आरोपी छूट जाते हैं। पहले भाजपा सरकार के मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत छूटे और अब जेल में बंद आरोपियों को छोड़ने की भूमिका खड़ी हो रही है। इस पूरे मामले में कोर्ट और सरकारी जांच एजेंसियां बराबर की जिम्मेदार है। मीडिया रिपोर्ट काे लेकर कभी गंभीर नहीं रहता और आरोपियों को छुड़ाने में वह एक मूकदर्शक बनकर रिपोर्ट प्रकाशित करता है।
आगे बढ़ने से पहले वर्षों पूर्व एक मीडिया रिपोर्ट का उल्लेख किया जा रहा है-
शेखावत और उनकी पत्नी नोनद कंवर को जब मिला नोटिस…
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने संजीवनी क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसायटी प्रकरण में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और उनकी पत्नी नोनाद कंवर को नोटिस जारी किए हैं। हाईकोर्ट की ओर से इस मामले में 17 अन्य लोगों को भी नोटिस भेजे गए हैं। पिछले दो साल से राजस्थान की सियासत में इस प्रकरण ने खासा हड़कंप मचा रखा है। कांग्रेस सरकार को गिराने के प्रयास और विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोपों के साथ ही केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के निशाने पर रहे हैं। अब कोर्ट से मिले नोटिस ने फिर से मामला गरमा दिया हैं।
हाईकोर्ट ने इस मामले में जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत उनकी पत्नी नोनाद कंवर, होम एंड अफेयर्स सेक्रेट्री के माध्यम से केंद्र सरकार, फाइनेंस मिनिस्ट्री के सचिव, मिनिस्ट्री ऑफ एग्रीकल्चर एवं फार्मर वेलफेयर डिपार्मेंट के सचिव, कोऑपरेटिव मिनिस्ट्री के सचिव, सीबीआई, एनफोर्समेंट डायरेक्टर, ईडी के जोनल ऑफिस जयपुर, सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन (एसएफआई) डायरेक्टर, सेंट्रल रजिस्टर मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव सोसायटी, बैंक ऑफ इंडिया के रिसीवर, संजीवनी कोऑपरेटिव सोसायटी बाड़मेर, विक्रम सिंह इंद्रोई, विनोद कंवर आदि को पक्षकार बनाया है तथा सभी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
देश में एक लाख 46 हजार निवेशकों के एक हजार करोड़ से भी अधिक रुपये हड़प लेने वाली संजीवनी क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसायटी को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विजय विश्नोई की एकल पीठ ने जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, उनकी पत्नी नोनाद कंवर सहित करीब 14 पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
संजीवनी क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसायटी में काफी निवेशकों ने भारी रकम निवेश की तथा संजीवनी क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसायटी की ओर से निवेशकों को रकम को नहीं लौटाने पर निवेशकों ने संजीवनी पीड़ित संघ के नाम से संस्था बनाई थी। संस्था की याचिका में कहा गया है कि संजीवनी क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसायटी ने भारी निवेश करवाकर विक्रम सिंह और सहयोगियों ने छल कपट किया तथा फर्जी रिकॉर्ड पोस्टर दिखा कर निवेशकों को धोखे में रखा। याचिका में अनुतोष मांगा गया है कि मामले की जांच ईडी, एसएफआईओ, सीबीआई से करवाई जाए तथा सोसायटी की संपूर्ण संपत्ति पर रिसीवर नियुक्त किया जाए। साथ ही निवेशकों को भुगतान करवाया जाए।
राजस्थान में संजीवनी की 211 एवं गुजरात में 26 शाखाएं हैं। दोनों राज्यों में कुल 237 शाखाएं खोली गईं। राजस्थान से करीब 1,46,991 निवेशकों से 953 करोड़ से अधिक की ठगी की गई है। सोसायटी की लेखा पुस्तकों में 1100 करोड़ रुपये के ऋण दर्शित किए गए हैं, इनमें अधिकतर बोगस ग्राहक हैं। ऐसे बोगस ऋणों की संख्या करीब 55 हजार है एवं औसत ऋण प्रति व्यक्ति करीब दो लाख रुपये हैं।
कुल ऋण करीब 1100 करोड़ रुपये का दर्शाया गया है। एसओजी की जांच में सामने आया कि जिन व्यक्तियों के नाम ऋण स्वीकृत किया गया है, जांच में उन व्यक्तियों के कूट रचित हस्ताक्षर सामने आए। 1100 करोड़ रुपये ऋण बांटना दर्शाया गया है, जो अपने आप में संदेह के घेरे में हैं। ऐसे में एसओजी की टीम पूरे मामले में रिकॉर्ड की जांच कर रही है।
संजीवनी क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी ने अपनी शाखाओं के विस्तार के साथ ही ग्राहकों की सुविधा के लिए एटीएम तक लगा दिए थे, जबकि क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी एटीएम नहीं लगा सकती थी। इन एटीएम के उद्घाटन के लिए राजनेता और सरकारी अधिकारी भी शरीक हुए थे।
इसके पहले केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत पर अब राजस्थान के बहुचर्चित संजीवनी को-ऑपरेटिव सोसायटी घोटाले में शामिल होने के आरोप पर जयपुर की एडीजे कोर्ट ने उनके खिलाफ जांच के आदेश भी जारी कर दिए थे।
राजस्थान में कुछ को-ऑपरेटिव सोसायटी के घोटाले की बात लगातार सामने आ रही थी, जिसमें आदर्श, नवजीवन के अलावा संजीवनी को-ऑपरेटिव सोसायटी की ओर से भी घोटाले की बात सामने आई थी। सोसायटी के खिलाफ निवेशकों से उनकी जमा पूंजी पर अधिक ब्याज, मोटे मुनाफे का लालच देकर ठगी करने का आरोप लगाया गया था। बाड़मेर में पहली क्रेडिट सोसायटी के रूप में संजीवनी वर्ष 2007 में शुरू हुई थी।
दरअसल इसी दौर में बाड़मेर जिले में तेल-गैस, लिग्नाइट जैसे खनिज और ईधन क्षेत्रों में बड़ा व्यापारिक बूम आया था। यहां तेल-गैस कंपनियों के बाड़मेर में निवेश और भूमि अवाप्ति से गरीब किसानों के पास भी करोड़ों रुपये आए थे। इस दौरान सोसायटी ने लोगों को लुभावने वादों के साथ झांसे में लिया और कम समय में दोगुनी-तिगुनी राशि करने का झांसा देकर हजारों निवेशकों के करोड़ों रुपये की पूंजी जमा कर ली। निवेशकों की पूंजी पर आलीशान दफ्तर, गाड़ियां और फ्लैट खरीद लिए गए। ऐश-मौज की जिंदगी के साथ ही जोधपुर में तीन मंजिला प्रधान कार्यालय खोल दिया गया।
इस मामले के संज्ञान में आने के बाद राजस्थान की एसओजी की ओर से इस मामले में सरगना को 23 अगस्त 2019 में एफआईआर दर्ज होने के बाद गिरफ्तार कर लिया था। सीएमडी विक्रम सिंह इंद्रोई और चार अन्य आरोपी की गिरफ्तारी के बाद से लगातार इस मामले को लेकर जांच की जा रही है। साथ ही मामले की सुनवाई भी कोर्ट में चल रही है। मामले का खुलासा निवेशकों की ओर से शिकायत करने के बाद हुआ, जिसके बाद जब कंपनी की बैलेंस शीट खंगाली गई, तो उसमें एक हजार करोड़ जमा कर 11 सौ करोड़ के बोगस ऋण दिखाए गए। साथ ही बैलेंस शीट जीरो दिखाई गई। देश में 1.46 लाख निवेशकों के एक हजार करोड़ रुपये हड़पने और वित्तीय अनियमित्ताओं से जुड़ा यह बड़ा मामला राजस्थान में इस रूप में सामने आया है।
इतने बड़े और गंभीर मामले में शेखावत को बरी करने की पूर्व में प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट पर एक नजर
केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने जोधपुर सांसद शेखावत को संजीवनी घोटाले में क्लीन चिट दे दिया है। बुधवार को SOG की विस्तृत रिपोर्ट के आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट की जस्टिस अरुण मोंगा की बेंच ने शेखावत को दोष मुक्त करार दिया। जस्टिस मोंगा की बेंच ने आदेश पारित करते हुए कहा रिपोर्ट के आधार पर कोई मामला नहीं बनता है। कोर्ट द्वारा क्लीन चिट मिलने के बाद केंद्रीय मंत्री शेखावत ने राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता अशोक गहलोत पर हमला बोला। मंत्री ने कहा कि गहलोत ने पुत्र मोह में आकर मुझे फंसाया।
दरअसल संजीवनी क्रेडिट को-ऑपरेटिव प्रकरण में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को मंगलवार को राजस्थान हाईकोर्ट से क्लीन चिट मिल गई है। शेखावत की ओर से दायर याचिका में एफआईआर के साथ-साथ जांच को भी रद्द करने को लेकर मांग की गई थी।
17 सितंबर को कोर्ट ने SOG से मांगा था जवाब
17 सितंबर 2024 को जस्टिस अरुण मोंगा की बेंच ने मामले में अंतिम आदेश पारित करते हुए SOG को इस सवाल का जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया कि ‘क्या SOG गजेंद्र सिंह शेखावत के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने का इरादा रखता है.’ मामले में स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) की ओर से एक विस्तृत रिपोर्ट दायर की गई, जिसमें कहा गया कि गजेंद्र सिंह शेखावत के खिलाफ कोई भी सबूत नहीं हैं और कंपनियों में निदेशक के रूप में उनके इस्तीफे के बाद किए गए कृत्यों के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
SOG की रिपोर्ट पर मिली क्लीन चिट
ऐसे में कोर्ट ने आदेश पारित करते हुए निर्देश दिया कि SOG द्वारा प्रस्तुत की गई विस्तृत रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ता गजेंद्र सिंह शेखावत के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है। एडवोकेट आदित्य विक्रम सिंह ने जानकारी दी कि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि SOG ट्रायल कोर्ट से अनुमति लिए बिना शेखावत के खिलाफ आगे की जांच नहीं कर सकती है।
शेखावत बोले- गहलोत ने पुत्र मोह में मुझे फंसाया
संजीवनी घोटाले को लेकर बोले गजेंद्र सिंह शेखावत पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा अपने पुत्र मोह में मुझ पर आरोप लगाए गए थे। उन्होंने कहा कि पुत्र की हार और भाजपा की लगातार जीत की खीझ से मुझ पर जो आरोप लगाए गए थे, चरित्र हनन का जो प्रयास किया गया था, वैसे लोगों पर न्यायालय के फैसले से तमाचा लगा है। आज राजस्थान हाईकोर्ट ने मुझे क्लीन चिट दे दी है। SOG द्वारा अनुसंधान में मुझे कहीं दोषी नहीं पाया गया। कोर्ट ने बिना अदालत की अनुमति के इस मामले में आगे कोई जांच नहीं करने का आदेश भी दिया है।
संजीवनी क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइटी केस में राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) को फटकार लगाते हुए चार्जशीट फाइल करने पर रोक लगा दी है। जहां इस केस में जोधपुर सांसद और केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को बड़ी राहत मिली है, वहीं राजस्थान सरकार को झटका लगा है। इस केस में 13 अप्रैल 2023 को हाईकोर्ट ने शेखावत की गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी।
शुक्रवार को हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान शेखावत की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता वि.आर.बाजवा ने पैरवी करते हुए कहा कि एसओजी ने अगस्त 2019 में यह केस दर्ज किया था। एसओजी ने साढ़े चार साल बाद भी जांच को पूरा नहीं किया है, क्योंकि राजनीतिक द्वेष के चलते राज्य सरकार शेखावत को गलत तरीके से फंसाना चाहती है। एसओजी ने कभी गजेंद्र सिंह शेखावत को पूछताछ के लिए नहीं बुलाया और ना ही पूर्व में दायर चार्जशीटों में कहीं शेखावत का नाम अभियुक्तों में शामिल किया गया।
हाईकोर्ट ने SOG से पूछा 4 साल में कोई नोटिस क्यों नहीं दिया?
बाजवा ने बताया कि हाईकोर्ट ने पूछा कि अगर शेखावत की संजीवनी केस में संलिप्तता थी तो एसओजी ने चार साल में कोई नोटिस क्यों नहीं दिया? कोर्ट ने यह भी पूछा कि फरवरी 2020 में चार्जशीट फाइल करने के तीन साल बाद फरवरी 2023 में दूसरे लोगों के खिलाफ चार्जशीट फाइल की, जबकि उसमें शेखावत या उनके परिवार के किसी सदस्य का नाम नहीं था।
सरकार शेखावत को फंसाना चाहती है- शेखावत के वकील
बाजवा ने कोर्ट में कहा कि राजनीतिक बदले के लिए सरकार विधानसभा चुनावों के बीच शेखावत को फंसाने का प्रयास कर रही है, जबकि इसी साल अप्रैल में राजस्थान सरकार के वकील हाईकोर्ट में यह भी कह चुके हैं कि शेखावत का किसी एफआईआर और चार्जशीट में नाम नहीं है।
900 करोड़ का संजीवनी घोटाला, गहलोत ने शेखावत पर लगाए थे आरोप
गौरतलब है कि करीब 900 करोड़ रुपए के संजीवनी घोटाले में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्रीय मंत्री शेखावत पर आरोप लगाकर पूरे मामले को राजनीतिक रंग दे दिया था, जबकि शेखावत शुरू से कह रहे हैं कि, साढ़े चार साल में इस प्रकरण की जांच न तो राज्य की एसओजी ने पूरी की और न ही इसे सीबीआई को सौंपा जा रहा है. मुख्यमंत्री गहलोत राजनीति करते हुए केवल जांच को भटकाने का काम कर रहे हैं.
CM गहलोत पर मानहानि का मामला
जब अशोक गहलोत ने शेखावत की मां समेत पूरे परिवार पर संजीवनी घोटाले में शामिल होने के आरोप लगाए तो शेखावत ने गहलोत के खिलाफ दिल्ली की कोर्ट में मानहानि का केस किया है, जिसमें अब तक गहलोत को राहत नहीं मिली है।
मल्टीस्टेट सोसायटी होने के बावजूद राजनीतिक कारणों से राजस्थान सरकार इस केस को सीबीआई को सौंप नहीं रही है, जबकि मल्टी स्टेट सोसाइटी होने के कारण इसकी जांच सीबीआई द्वारा नियमित जमा पर प्रतिबंध योजना अधिनियम 2019 के तहत की जानी चाहिए।
अब नजर डालते हैं उन गलियों पर जो एसओजी ने शेखावत को बचाने में रखी…
1- शेखावत की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता वि.आर.बाजवा ने पैरवी करते हुए कहा कि राजनीतिक बदले के लिए सरकार विधानसभा चुनावों के बीच शेखावत को फंसाने का प्रयास कर रही है, जबकि इसी साल अप्रैल में राजस्थान सरकार के वकील हाईकोर्ट में यह भी कह चुके हैं कि शेखावत का किसी एफआईआर और चार्जशीट में नाम नहीं है। यहां गौर करने वाली बात है कि जब कोर्ट ने शेखावत और उनकी पत्नी नोनद कंवर सहित 17 लोगों को नोटिस जारी किए थे तो वो किस आधार पर किए थे। इससे जाहिर होता है कि कोर्ट में मामला आया था तभी तो नोटिस जारी किए थे। फिर कोर्ट में यह बात कैसे कही गई कि शेखावत का किसी एफआईआर और चार्जशीट में नाम नहीं है। मीडिया रिपोर्ट का ऊपर हवाला दिया गया है जिसमें कोर्ट ने शेखावत और नोनद कंवर सहित 17 लोगों को नोटिस जारी किया था। जाहिर सी बात है जब कोर्ट में कोई मामला आता है तभी नोटिस जारी किया जाता है। बेवजह कोर्ट किसी को नोटिस जारी क्यों करेगा?
2-बाजवा ने बताया कि हाईकोर्ट ने पूछा कि अगर शेखावत की संजीवनी केस में संलिप्तता थी तो एसओजी ने चार साल में कोई नोटिस क्यों नहीं दिया? कोर्ट ने यह भी पूछा कि फरवरी 2020 में चार्जशीट फाइल करने के तीन साल बाद फरवरी 2023 में दूसरे लोगों के खिलाफ चार्जशीट फाइल की, जबकि उसमें शेखावत या उनके परिवार के किसी सदस्य का नाम नहीं था। गौरतलब है कि जब मंत्री के रूप में गजेंद्रसिंह शेखावत और उनकी पत्नी नोनद कंवर और 17 लोगों को नोटिस जारी हुए तभी गजेंद्रसिंह शेखावत और उनकी पत्नी नोनद कंवर के बैंक एकाउंट सीज क्यों नहीं किए गए। सारे दस्तावेज जब्त क्यों नहीं किए गए। राइजिंग भास्कर को जानकारी मिली है कि गजेंद्रसिंह शेखावत ने घोटाला सामने आने के बाद बैकडेट में सोसायटी के पदों से इस्तीफा दिया। कोर्ट को इसकी आशंका होने के बावजूद उनके बैंक खातों को सीज नहीं करवाया गया और ना ही सारे दस्तावेज जब्त किए गए। जो दस्तावेज जब्त किए गए उनमें काफी देर लगा दी गई और तब तक शेखावत को समय मिल गया उनमें हेरफेर करने का।
हाईकोर्ट का फैसला ही संदिग्ध…
इन तथ्यों पर गौर करें- ‘राजस्थान सरकार के वकील हाईकोर्ट में यह भी कह चुके हैं कि शेखावत का किसी एफआईआर और चार्जशीट में नाम नहीं है।’ ‘शेखावत की ओर से दायर याचिका में एफआईआर के साथ-साथ जांच को भी रद्द करने को लेकर मांग की गई थी।’ अब सवाल है कि जब राजस्थान सरकार के वकील हाईकोर्ट में यह कह चुके थे कि शेखावत का किसी एफआईआर और चार्जशीट में नाम नहीं है तो शेखावत की ओर से किस एफआईआर और जांच को रद्द करने की मांग की गई। दरअसल पूरे मामले में भांग मिली हुई है और हाईकोर्ट का फैसला यहीं संदिग्ध नजर आ रहा है।
राइजिंग भास्कर के सवाल :
1-क्या एसओजी विश्वास योग्य जांच एजेंसी है?
राइजिंग भास्कर जनता की अदालत में सवाल रख रही है कि क्या एसओजी जैसी जांच एजेंसियाें पर भरोसा किया जाना चाहिए। हाल ही में कितने ही हाईप्रोफाइल मामले एसओजी में सामने आए। मगर एसओजी केवल सरकार की रखेल बनकर रह गई है। जिस पार्टी की सरकार होती है एसओजी उसकी हाजिरी बजाती है। ऐसी एजेंसी को भंग कर देना चाहिए। यह निक्कमी और नाकारा एजेंसी है, इसकी गतिविधियां संदिग्ध ही है। इसका शेखावत के मामले में पैरवी करना या तो दिखावा था नहीं तो इस प्रकरण से साफ होता है कि शेखावत को खुद एसओजी फंसाना चाहती थी। कुछ भी हो एसओजी की विश्वसनीयता खतरे में है। सरकार को एसओजी को तुरंत भंग कर देना चाहिए क्योंकि यह किसी का चरित्र हनन कर सकती है और किसी के साथ मनमाना व्यवहार कर सकती है।
2-क्या गजेंद्रसिंह शेखात को क्लीन चिट देना उचित है?
राइजिंग भास्कर का दूसरा सवाल है क्या हाईकोर्ट द्वारा भाजपा सरकार के मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत को क्लीन चिट देना उचित है? ऐसे में जब कि एक हजार करोड़ के घोटाले का मामला हो और हजारों लोगों के साथ आर्थिक ठगी की गई हो। जिन लोगों के साथ धोखाधड़ी और ठगी हुई उनमें कई लोगों को जिंदगी भर की पूंजी लुट गई। अब इन लोगों को कोर्ट से ही आस थी कि एक दिन उनकी पूंजी उन्हें वापस मिलेगी। लेकिन अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि गजेंद्रसिंह शेखावत के छूटने के बाद जेल में बंद आरोपी भी सबकुछ ठीक चला तो जल्दी छूट जाएंगे और हजारों लोगों के जीवन भर की कमाई भी उन्हें मिलती नजर नहीं आ रही? गजेंद्रसिंह शेखावत के खिलाफ मामला जब बनता ही नहीं था तो इतने साल तक कोर्ट में खिंचता ही क्यों चला गया? जब कोर्ट ने शेखावत को बरी ही कर दिया तो इस मामले में एसओजी के जांच अधिकारियों को झूठा मामला बनाने पर कठोर सजा क्यों नहीं दी गई? अगर ऐसे ही एसओजी के अधिकारियों को छोड़ा जाता रहा तो कभी भी किसी राजनेता ही नहीं अफसर और आम आदमी का चरित्र हनन होता रहेगा। इसलिए कोर्ट ने एसओजी के अधिकारियों को उनकी जानबूझकर की गई गैर कानूनी कार्रवाई के लिए सजा क्यों नहीं दी? ऐसे तो उनके हौसले बुलंद होते जाएंगे। अगर एसओजी ने तथ्यों की अनदेखी की है तो क्या हाईकोर्ट को इतनी आसानी से और इतनी जल्दी शेखावत को क्लीन चिट देनी चाहिए थी? सवाल अपनी जगह कायम है।
3-क्या हाईकोर्ट गारंटी लेता है कि निवेशकों के रुपए उन्हें वापस मिलेंगे?
अब सवाल है कि घोटाले में जिन हजारों लोगों के जीवन भर की कमाई लुट गई क्या उन्हें वापस मिलेगी? क्या हाईकोर्ट गारंटी लेता है कि निवेशकों को उनके पैसे लौटाए जाएंगे। जो हालात बन रहे हैं और जैसी कि भूमिका बन रही है उससे साफ जाहिर है कि जेल में बंद आरोपी भी जल्दी बाहर आ जाएंगे और निवेशक अपनी फूटी किस्मत को रोते रहेंगे। उनके साथ न्याय होता नजर नहीं आ रहा।
4-अगर शेखावत को गहलोत ने गलत फंसाया तो गहलोत को सजा क्यों नहीं?
अब सबसे बड़ा सवाल है कि अगर भाजपा सरकार के मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गलत फंसाया तो उन्हें सजा क्यों नहीं हो रही? जब हाईकोर्ट जेल में बंद आरोपियों के साथ न्यायिक फैसले में हो रही देरी को लेकर चिंतित है तो गहलोत पर जो मान हानि का मुकदमा चल रहा है उस पर फैसला जल्द क्यों नहीं आ रहा। जबकि इस पर तो संदेह ही नहीं क्योंकि शेखावत को हाईकोर्ट खुद बरी कर चुका है। जब शेखावत को हाईकोर्ट खुद बरी चुका है और यह साफ हो चुका है कि शेखावत पर मुकदमा नहीं बनता तो गहलोत को हाईकोर्ट शेखावत की मानहानि के मामले में सजा क्यों नहीं सुना रहा?
5-जस्टिस वर्मा के प्रकरण के बाद अदालतों ने विश्वसनीयता खोई, अब कौन भरोसा करे जजों पर?
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के बंगले से करोड़ों नोट मिलने की घटना के बाद अब जाहिर हो चुका है कि जजों की विश्वसनीयता खतरे में है। यशवंत वर्मा के बंगले से नोट मिलने के मामले में जनता क्या सच जान पाएगी? कुछ भी पूरे प्रकरण में अदालतों की विश्वसनीयता और साख जरदबस्त खतरे में है। ऐसे में राजस्थान हाईकोर्ट कैसे अछूता रह सकता है। शेखावत को बरी करने से लेकर अब जो संभावनाएं बन रही है, इस पूरे प्रकरण पर नजर डालें तो राजस्थान हाईकोर्ट की कार्य प्रणाली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इसलिए अब जनता की एक ही मांग है कि समस्त हाईप्रोफोइल मामलों की सुनवाई और पूरी प्रक्रिया का लाइव प्रसारण किया जाए ताकि आम जनता दूध का दूध और पानी का पानी होते अपनी आंखों से देख सकें।
6-जब शेखावत और नोनद कंवर को नोटिस जारी हो ही चुके थे, तो फाइल रि-ओपन क्यों नहीं होनी चाहिए?
जब पहली बार कोर्ट द्वारा शेखावत, उनकी पत्नी नोनद कंवर और 17 अन्य लोगों को नोटिस जारी किए गए तो कोर्ट ने कई तथ्यों पर गौर किए बगैर शेखावत को बरी कैसे कर दिया? शेखावत बरी हो गए सो हो गए, नोनद कवर कैसे बरी हो गई? नोनद कंवर पर आरोप क्यों लगे? नोनद कंवर को नोटिस मिलने के बाद उनसे संबंधित बैंक खाते सीज क्यों नहीं किए गए। नोनद कंवर से संबंधित सारे दस्तावेज जब्त क्यों नहीं किए गए? अब जबकि यह जाहिर हो चुका है कि संजीवनी सोसायटी घोटाला हाईप्रोफाइल होता जा रहा है और इसके कई पहलू अनसुलझे हैं तो क्या एक बार फिर नोनद कंवर और शेखावत की फाइल रिओपन नहीं होनी चाहिए?
7-पूरे प्रकरण में अशोक गहलोत को फिर से पक्षकार बनाया जाए और कोर्ट को गुमराह करने पर कठोर सजा हो
जैसा कि शेखावत को कोर्ट ने बरी कर दिया तो साबित हो ही गया कि अशोक गहलोत झूठे थे। अशोक गहलोत ने शेखावत और उनके रिश्तदारों की मानहानि की। यह भी जाहिर हो गया है। ऐसे में शेखावत को कठोर सजा क्यों नहीं हो रही? क्या पूरे प्रकरण में अशोक गहलोत को फिर से पक्षकार नहीं बनाया जाना चाहिए। क्या अशोक गहलोत कोर्ट को गुमराह करते रहे।
