(रमजान के दिनों में अल्लाह की इबादत में समय कैसे गुजरा पता ही नहीं चला। अब रमजान विदा हो रहा है। एक साधक के लिए ये पल कैसा होता है…बता रहे कासिम बीकानेरी अपनी कविता के माध्यम से।)
रमज़ान जा रहा है
दिल रो रहा है ग़म से, रमज़ान जा रहा है
मौला का प्यारा अब ये, मेहमान जा रहा है
कितनी तड़प है दिल में जाकर किसे बताएं
आंखों से दूर माहे-ज़ीशान जा रहा है
सब्रो-सुकून कितना वो लोग पा रहे हैं
जो भी इबादतों के यां गुल खिला रहे हैं
लेकर हमारे लब की मुस्कान जा रहा है
दिल रो रहा है ग़म से, रमज़ान जा रहा है
नूरे-ख़ुदा की हरसू बरसात हो रही है
अल्लाह की, नबी की, बस बात हो रही है
देकर ये तोहफ़े माहे-गुफ़रान जा रहा है
दिल रो रहा है ग़म से, रमज़ान जा रहा है
देखो नमाज़ियों से मस्जिद भरी हुई है
राज़ी ख़ुदा को करने की धुन लगी हुई है
रहमत लुटाके माहे-ज़ीशान जा रहा है
दिल रो रहा है ग़म से, रमज़ान जा रहा है
इस माह में इबादत का इक महल बनाया
फिर उस महल को हम ने सजदों से है सजाया
दूर अब वो रहमतों का ऐवान जा रहा है।
दिल रो रहा है ग़म से, रमज़ान जा रहा है।।
क़ुरआ़न की तिलावत दिन रात हो रही है
हर लम्हा रहमतों की, बरसात हो रही है
अब फिर ख़ता की जानिब इंसान जा रहा है
दिल रो रहा है ग़म से, रमज़ान जा रहा है
अल्लाह बख़्श देगा पिछले गुनाह अपने
जन्नत हमें मिलेगी वा’दा किया है रब ने
हमको सुना के रब का फ़रमान जा रहा है।
दिल रो रहा है ग़म से, रमज़ान जा रहा है।।
जन्नत में जाना हो तो तुम काम अच्छे करना
नै’मत से रब की अपने फिर झोलियों को भरना
जन्नत का दूर हमसे दरबान जा रहा है।
दिल रो रहा है ग़म से, रमज़ान जा रहा है।
क़ासिम बीकानेरी
