-इतिहास में जब-जब रियासतों के एकीकरण की बात आती है जोधपुर के महाराजा हनुवंत सिंह को खलनायक बना दिया जाता है, पर हकीकत यह है कि जिन्ना से हाथ मिलाना तो महाराजा की चाल थी, वे जोधपुर की जनता की भलाई के लिए सरदार पटेल से अपनी शर्तें मनवाना चाहते थे…इतिहास की अनसुलझी गुत्थी पर एक नजर…
अयोध्या प्रसाद गौड़. जोधपुर
इतिहास का एक सच हमेशा से गलत ढंग से प्रस्तुत किया जाता रहा है। राजस्थान दिवस पर जबकि यह बात जाहिर है कि जोधपुर रियासत मुश्किल से भारत में विलय हुई। पर यह भी उतना ही सच है कि महाराजा हनुवंत सिंह जोधपुर की जनता का भला चाहते थे और उन्होंने एकीकरण के पेपर पर साइन किए थे उसी पेन से विलय में सरदार पटेल के सहयोगी रहे वीपी मेनन पर अपने पेन में छुपी रिवॉल्वर तानकर धमकी तक दे डाली थी कि- तुमने मेरी जनता को भूखों मारा तो तुम्हें कुत्ते की मौत मार दूंगा। रियासतों के एकीकरण में जोधपुर महाराजा हनवंतसिंह से जुड़ी कड़िया पेश हैं। इसे इतिहास के विभिन्न दस्तावेजों से सहेजा गया है।
ब्रिटिश हुकूमत के भेजे गए आखिरी वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने शिमला में हुई नाटकीय बैठक के बाद 3 जून 1947 को भारत-पाकिस्तान विभाजन का जो संदेश सुनाया उसके बाद सवालों के घेरे में 500 से ज्यादा देसी रियासतें और ठिकाने थे। इन्हें भारत में विलय के लिए साम-दाम-दंड भेद नीति से राजी करना सरदार वल्लभ भाई पटेल का लक्ष्य था। रियायसतों ने व्यक्तिगत रूप से वायसरॉय को ये संकेत दिया कि वे अगस्त के पहले सप्ताह तक विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर देंगे। हालांकि इसी दौरान त्रावणकोर, हैदराबाद, धौलपुर ने नाख़ुशी के संकेत दे दिये थे।
अखबारों में काल्पनिक विवरण परोसे जा रहे थे
जोधपुर में लोक परिषद और उनका मुखपत्र अखबार प्रजा सेवक ‘भोपाल के नवाब की गुपचुप जोधपुर यात्रा’ की खबर के साथ बनाए गए माहौल को नई रंगत देने में जुटे हुए थे। एक हिंदू बहुल रियासत को पाकिस्तान में मिला देने की मंशा? हनवंत सिंह के दिमाग में चल रही भारत-विरोधी योजना…? इस तरह के जुमले के साथ पैलेस में होने वाली बैठकों और हनवंत सिंह के बार-बार हो रहे दिल्ली दौरों का काल्पनिक विवरण खबरों के नाम पर परोसा जाता था। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा तय समय सीमा से पांच दिन पूर्व यानी दस अगस्त तक भोपाल, इन्दौर, धौलपुर, हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ और जोधपुर… हाँ! जोधपुर रियासत ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। ये सरदार पटेल और मेनन के अलावा खुद लॉर्ड माउण्टबेटन के लिए भी चिंता का विषय था।
जब जिन्ना ने जोधपुर महाराज हनुवंत सिंह पर डोरे डाले
6 अगस्त 1947। ये वो तारीख थी जब जोधपुर रियासत को लेकर एक ऐतिहासिक घटना हुई। पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना और जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह इस घटना के मुख्य पात्र थे। दिल्ली को कमजोर करने की अपनी रणीनति पर काम करते हुए जिन्ना ने त्रावणकोर और हैदराबाद रियासत पर डोरे डालने शुरू कर दिए थे। जूनागढ़, काठियावाड भी जिन्ना की लिस्ट में थे। लेकिन जितना फायदेमंद उनके लिए जोधपुर का पाकिस्तान में शामिल होना हो सकता था वो लालच ही जिन्ना को जोधपुर के लिए बार-बार प्रयास करने के लिए मजबूर कर रहा था। जोधपुर, भावी पाकिस्तान से सटी सबसे बड़ी रियासत थी। भारत के दिल- दिल्ली तक घुसपैठ करने के लिए जोधपुर को पाकिस्तान में शामिल कर लेना जिन्ना की सबसे बड़ी राजनैतिक और रणनीतिक जीत होती।
हनुवंत सिंह जिन्ना की आड़ में जोधुपर की जनता का भला चाहते थे
दरअसल राजनैतिक उठापटक के बीच अपनी रियासत के लिए बेहतर भविष्य का लक्ष्य लेकर महाराजा हनवंत विशुद्ध मारवाडी मोलभाव की मुद्रा में आ चुके थे। जिन्ना से मुलाकात, उनकी रणनीति का पहला कदम थी। रियासत उन बरसों में भीषण अकाल से रूबरू थी। लोगों को विशेष सहायता की दरकार थी। जोधपुर को जोधपुर-हैदराबाद (सिंध) रेलवे नेटवर्क का अधिकार हासिल था। भारत में विलय के साथ ही यह महत्वपूर्ण रेलवे नेटवर्क और इससे होने वाली आमदनी भी जोधपुर रियासत के हाथ से खिसकने वाली थी। उमरकोट (पूर्व नाम अमरकोट) रियासत पर जोधपुर के हक होने की और वहां के लोगों के भारत में शामिल होने की इच्छा भी पंडित नेहरू तक पहुंचायी गई थी। लेकिन नेहरू ने ठंडी प्रतिक्रिया दी। उन्हें यह बात समझाने की कोशिश की गई कि हिन्दू बहुल उमरकोट पर दावा जताने से वहां की बहुसंख्यक जनता के साथ न्याय होगा। लेकिन पंडित नेहरू ने इस पर किसी बातचीत से मना कर दिया।
जब 11 अगस्त 1947 इतिहास में दर्ज हो गया
11 अगस्त 1947 की सुबह। इम्पीरियल होटल के गलियारों में दिल्ली की तीखी धूप ने अल-सुबह की तेज गर्माहट फैला दी थी। महाराजा हनवंत सिंह होटल से निकल, ग्यारह बजे वो वायसरॉय हाऊस पहुँच चुके थे। “आप और हम बात शुरू करें, उससे पहले मैं एक बात साफ तौर पर रखना चाहूँगा,” महाराजा ने बिना किसी भूमिका के बात शुरू की। उनके सामने वायसरॉय लॉर्ड माउण्टबेटन के अलावा सहयोगी वी.पी. मेनन भी थे। “सरदार पटेल ने जोधपुर रियासत के विलय के साथ जुड़ी विशषे रियायतों की शर्त को स्वीकार कर लिया है। आप भी उस पर सहमति दे दें!” महाराजा ने नपे तुले शब्दों में अपनी बात कह दी। मेनन के चेहरे पर बैचेनी की लकीरें उभर आईं। वो इस मुद्दे पर अपनी जिद्द कायम रखने की इच्छा लेकर ही मीटिंग में आए थे। लिहाजा उन्होंने महाराजा का उत्साह ठंडा करने की कोशिश में बात आगे बढ़ाई – “अगर आप चाहते हैं कि मैं झूठी उम्मीदों पर हस्ताक्षर कर दूं तो आपकी शर्तों को भी मान जाऊंगा। सच्चाई ये है कि आपकी ज्यादातर शर्तें अव्यवहारिक होने के कारण मानी नहीं जा सकती। हो सकता है कि सरदार पटेल के दिमाग में कोई तरीका हो जिससे आपकी शर्तों को पूरा किया जा सके । मुझे ऐसा कोई तरीका नहीं सूझता। इसीलिए हमने बड़ौदा और भोपाल रियासत की शर्तों को भी ठुकरा दिया,” मेनन बोले। “जोधपुर ठुकराए जाने के लिए नहीं है! नहीं हैं हम आप लोगों से ठुकराए जाने के लिए! एक बार, जब सरदार पटेल शर्तों पर सहमति दे चुके हैं तो अब ये नया नाटक किसलिए? ये धोखाधड़ी क्यों?” आग-बबूला हुए महाराजा ये कहते-कहते अपनी जगह से उठ खड़े हुए। अब लॉर्ड माउण्टबेटन ने स्थिति को बिगडने से बचाने के लिए बातचीत की कमान संभाली। हाथ के इशारे से मेनन को चुप रहने का संकेत देते हुए उन्होंने बात शुरू की- “मुझे आप जोधपुर रियासत का शुभचिंतक ही समझें। आपके पिता मेरे खास दोस्तों में से एक थे। अगर उनका स्वर्गवास नहीं हुआ होता तो जोधपुर का अब तक विलय हो चुका होता।”
तीन शर्तों पर माने थे हनुवंत सिंह
लेकिन महाराजा ने अपनी बात जारी रखी- “मारवाड को भारत में शामिल करवाने के लिए आपका ऑफ़र क्या है? और सबसे खास बात ये कि कल ही सरदार पटेल जोधपुर रियासत को विशषे रियायतें देने की बात मान चुके हैं तो फिर अब मेनन को वो ही शर्तें मानने में क्या दिक्कत आ रही है? महाराजा के शब्द अब उनके गुस्से की गर्माहट लिए बाहर आ रहे थे। गुस्से के कारण आंखों में ललाई नजर आने लगी। बोलते हुए उनका हाथ बार-बार जैकेट की जेब पर जा रहा था। इस स्थिति में माउण्टबेटन ने हथियार डालने की मुद्रा अख्तियार करते हुए निर्णय सुनाया- “मैं आपकी बात मानता हूँ। मेनन को जोधपुर रियासत के लिए विशेष रियायत का प्रावधान मानना और उसे लागू करना चाहिए,” इतना कहते हुए उन्होंने वी.पी. मेनन को इस चर्चा को तुरंत खत्म करने का इशारा किया। अनमने मेनन ने तीन शर्तों पर सहमति की बात कही। ये वो ही शर्तें थीं जिन पर सरदार पटेल पहले ही सहमति दे चुके थे। यानी हथियारों के मुक्त आयात की छूट, अकाल राहत के लिए खाद्य और जोधपुर से कच्छ के बन्दरगाह तक रेलवे लाइन का प्राथमिकता से निर्माण। महाराजा के चेहरे पर विजयी मुस्कुराहट खेल गई। जिन्ना के साथ निकटता के नाटक ने अपना काम कर दिखाया था। “आपका बहुत शुक्रिया! मैं ख़ुशी-ख़ुशी भारत में विलय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर सकंगा,” महाराजा ने आभार भरे स्वर में वायसरॉय का शुक्रिया अदा किया। लॉर्ड माउण्टबेटन के दिमाग से एक बोझ उतर चुका था। महाराजा को शुभकामना दे कर वो अपनी पत्नी के स्टडी रूम की तरफ बढ़ गए जहाँ हैदराबाद का प्रतिनिधिमंडल उनका इंतजार कर रहा था।
…और हनुवंतसिंह ने मेनन की बजाय खुद के पेन से हस्ताक्षर किए और पेन में छुपा रिवॉल्वर तान दिया
“मैं अंगीकार पत्र का ड्राफ्ट साथ ही लाया हूं। आप अब इन पर हस्ताक्षर कर दें,” मेनन ने एक दस्तावेज महाराजा की तरफ खिसकाते हुए कहा। उनके स्वर में रूखापन अभी भी बरकरार था। “मेरा ख्याल है कि आप जोधपुर को मिलने वाली रियायतों वाले दस्तावेज पर हस्ताक्षर भी अभी कर लें, ताकि कुछ और चर्चा बाकी ना रह जाए।” महाराजा, मेनन के प्रति अविश्वास को कम नहीं कर पा रहे थे। उधर मेनन भी हार मानने की मुद्रा में नहीं थे। उन्होंने रियायतों वाले दस्तावेज पर हस्ताक्षर की बात को नजरअंदाज करते हुए जेब से पेन निकाला और महाराजा की तरफ बढा दिया ताकि वो अंगीकार पत्र पर हस्ताक्षर कर सकें। महाराजा इस रूखेपन के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। उन्होंने अचानक अपनी जेब में हाथ डाला और अगले पल जो दृश्य उपस्थित हुआ उसकी कल्पना मेनन को सपने में भी नहीं थी। महाराजा ने मेनन के पेन को नजरअंदाज करते हुए अपनी जैकेट की जेब में हाथ डाला और सामान्य से बड़े आकार का फाउण्टेन पेन निकाला। जैसे कोई प्रोफेशनल जादूगर अपना करतब दिखाता है उस नाटकीय अंदाज में महाराजा ने पेन का ढक्कन हटाया और अंगीकार-पत्र (इन्स्ट्रूमेन्ट ऑफ़ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर किए। “मिस्टर मेनन! मैंने जिस पेन से हस्ताक्षर किए हैं उसी से मैं तुम्हें मार भी सकता हूँ,” हस्ताक्षर करने के बाद पेन का ढक्कन लगा उसे अंगुलियों के बीच नचाते हुए महाराजा ने मानो एक रहस्य उजागर किया। “क्-क्या! क्या मतलब है आपका? आप मजाक कर रहे हो!” मेनन का गला सूखने लगा। डर के कारण पसीने की बूंदे उनके ललाट पर झलक गईं। पेन के पिछले हिस्से को घुमाकर उसे अलग करते हुए महाराजा की नजरें नीचीं थीं इसलिए मेनन ये भी नहीं देख पा रहे थे कि महाराजा की आँखों में गुस्सा है या शरारत। उन्होंने इतना जरूर देखा कि पेन के एक हिस्से के खुलते ही रिवाल्वर का छोटा रूप उनके सामने था। महाराजा उस पैन-पिस्तौल को मेनन की तरफ तान चुके थे। “अगर तुमने जोधपुर की जनता को भूखों मारा तो… तो मैं तुम्हें कुत्ते की मौत मार दूंगा,” वो गरजे। महाराजा की प्रतिक्रिया मेनन को भीतर तक कंपा देने के लिए काफी थी। वो तेजी से वायसरॉय के कक्ष से बाहर निकले और लेडी माउण्टबेटन के स्टडी रूम में पहुँचे। वहां हैदराबाद प्रतिनिधिमंडल के साथ माउण्टबेटन मौजूद थे। “मैं आपका थोड़ा समय लेना चाहूँगा,” चेहरे पर उड़ती हवाईयों के बीच मेनन जब बोले तो उखड़ती सांसे उनके शब्दों में शामिल हो गईं। “कहो मेनन, क्या बात है? हो गए महाराजा के हस्ताक्षर!” माउण्टबेटन ने दरवाजे की तरफ बढते हुए पूछा। “वो महाराजा जोधपुर… हनवंत सिंह। वो मेरी हत्या करना चाहते हैं। उनके हाथ में पिस्तौल हैं। आप साथ रहें तो बेहतर होगा।” मेनन की आवाज में हड़बड़ाहट को देख माउण्टबेटन ने तेजी से पास वाले कक्ष की तरफ कदम बढा दिए। “ये क्या मजाक है योर हाईनेस?” माउण्टबेटन के स्वर में झुंझलाहट थी। “मैं भी मेनन महाशय को ये ही समझाना चाह रहा था कि बार-बार विशेष शर्तों की बात पर वे अपने पुराने पाले में घुस कर विरोध करने लग जाते हैं। ये क्या मजाक है!” महाराजा ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ देते हुए पेन वापस बंद किया। “लेकिन मैंने इस तरह का पेन पहली बार देखा है जो पिस्टल में बदल जाता हो,” माउण्टबेटन के स्वर में उत्सुकता थी। “ये मेड इन जोधपुर पिस्टल पेन है। आपको अच्छा लगा तो आप रख लीजिए इसे। लेकिन मेनन को मैं याद दिलाना चाहता था कि वो शर्तों का स्वीकृति पत्र जल्दी ही मुझे भिजवा दें। वो इतना डर गए कि अंगीकार-पत्र जिस पर मैं साइन कर चुका था, उसे मेरे पास ही भूल कर भाग लिए। ऐसे तो आप कैसे संभालेंगे इतनी सारी रियासतों का जिम्मा,” महाराज ने मेनन को उपहास भरे स्वर में उलाहना दिया। और इस तरह जोधपुर के भारत में विलय और कालांतर में राजस्थान के गठन का रास्ता 11 अगस्त 1947 को साफ हो चुका था।
(जैसा कि अयोध्या प्रसाद गौड़ ने राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर डीके पुरोहित को बताया)
