(ऐसी होती है एंटी पर्सनल लैंडमाइन जो दुश्मन को घायल करने के लिए काम में ली जाती है।)
-बॉर्डर इलाकों में पिछले कुछ दिनों से लगातार एंटी पर्सनल लैंडमाइन और जिंदा बम मिल रहे हैं, यह सिलसिला जारी है। आखिर ऐसा क्या है कि बॉर्डर इलाके में बड़ी तादाद में एंटी पर्सनल लैंडमाइन मिल रही है? दरअसल यह भारतीय सेना का नया और अचूक हथियार है। विदेशों में इसका इस्तेमाल पहले से किया जाता रहा है, मगर भारतीय सेना ने जासूसी पर लगाम लगाने और स्थानीय लोगों की सजगता परखने का यह नायाब तरीका अपनाया है।
-बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद पाकिस्तान की ओर से भारतीय सेना बॉर्डर के इस पार सतर्क है। जानकारी मिली है कि पाकिस्तान ने बॉर्डर के समीप सामरिक गतिविधियां तेज कर दी है। कई कैंपों में जवानों को ट्रेनिंग दी जा रही है। इसको देखते हुए भारतीय सेना ने एहतियातन कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। भारतीय सेना हर चुनौती से निपटने के लिए तैयार है और दुश्मन की हर नापाक हरकत को मुंह तौड़ जवाब देगी।
भारत-पाक पश्चिमी सीमा से डीके पुरोहित की विशेष रिपोर्ट
पश्चिमी सीमा पर फिर से एंटी पर्सनल लैंडमाइन का मिलना और बार-बार मिलना…क्या लगता है? आखिर इसका क्या कारण है? कभी जिंदा बम मिल रहे हैं तो कभी एंटी पर्सनल लैंडमाइन…। दरअसल बदलते दौर में दुश्मनों की नापाक हरकतों पर नजर रखने के लिए भारतीय सेना ने नया और अचूक हथियार अपनाया है। इसके जरिए बॉर्डर इलाकों में जासूसी पर नकैल का प्रयास किया जा रहा है। जो भी घुसपैठिए और जासूस बॉर्डर इलाकों में प्रवेश करेंगे वे चप्पे-चप्पे पर तैनात इस तरह की माइंस के शिकंजे में आकर घायल हो जाएंगे और उन्हें पकड़ कर भारतीय सेना और बीएसएफ के जवान उनसे राज उगल सकते हैं कि जासूसी क्यों की जा रही है और घुसपैठ किस उद्देश्य से की गई। आत्मसुरक्षा का यह हथियार विदेशों में लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है, लेकिन अब भारतीय सेना ने इसे बॉर्डर इलाकों में इस्तेमाल करना शुरू किया है।
हालांकि मानवाधिकार संगठन इस तरह की माइंस बिछाने को उचित नहीं ठहराते हैं और मानवाधिकार संगठन लंबे समय से इस तरीके को गलत ठहराते आ रहे हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देश इस अचूक हथियार से जासूसी रोकने में कारगर सिद्ध हुए हैं। यही तरीका अब भारतीय सेना ने पश्चिमी राजस्थान बॉर्डर पर अपनाना शुरू कर दिया है। इससे दुश्मन के नापाक इरादों को नेस्तनाबूद करने में मदद मिलेगी वहीं जासूसी की घटनाओं पर रोक लग सकेगी। आम तौर पर बॉर्डर इलाकों में रहने वाले नागरिक सजग रहते हैं और उन्हें चप्पे-चप्पे का भान होता है। चूंकि बॉर्डर इलाकों में सेना के अभ्यास भी चलते रहते हैं और उन्हें पता होता है कि कहां क्या खतरा हो सकता है। यह एक तरह से भारतीय सेना अपने नागरिकों की एफिशिएंसी परखने के लिए भी उपयोग में लेती है। क्योंकि इस तरह की माइंस से आदमी की मौत नहीं होती बल्कि वह घायल हो जाता है। एंटी पर्सनल लैंडमाइन से व्यक्ति मरता नहीं है और उसके पैर या हाथ जख्मी हो जाते हैं। कई बार बॉर्डर इलाकों में जासूसी घुसपैठ हो जाती है। लेकिन जासूसों और घुसपैठ करने वालों को पता नहीं होता और अनजाने में उनके पैर इस तरह की माइंस पर पड़ जाते हैं और धमाके के साथ घायल हो जाते हैं। इस तरह ये जासूस अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाते और सेना और सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ मे आ जाते हैं। पाकिस्तान से निरंतर बढ़ रहे खतरे और आईएसआई के बढ़ते खतरे को देखते हुए पश्चिमी बॉर्डर पर सेना ने यह कदम उठाया है। बताया जाता है कि पश्चिमी सीमा पर जो जिंदा बम और एंटी पर्सनल लैंडमाइन मिली है, उसका उद्देश्य भी स्थानीय नागरिकों की सजगता परखना और जासूसी घटनाओं पर रोक लगाना है।
आइए जानते हैं क्या होती है एंटी पर्सनल लैंडमाइन?
एंटी पर्सनल लैंडमाइन या एंटी पर्सनल माइन (एपीएल) एक प्रकार की माइन है जिसे मनुष्यों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए डिजाइन किया गया है। जो एंटी टैंक माइन के विपरीत है। जो वाहनों को निशाना बनाती है। एपीएल को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है- ब्लास्ट माइंस और विखंडन माइंस। एपीएल को अक्सर अपने पीडितों को घायल करने और अपंग करने के लिए डिजाइन किया जाता है न कि मारने के लिए ताकि उनका सामना करने वाले दुश्मन दलों की रसद (ज्यादातर चिकित्सा) सहायता प्रणाली को भारी नुकसान हो। कुछ प्रकार के एपीएल बख्तरबंद वाहनों या पहिएदार वाहनों के टायरों की पटरियों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। लैंडमाइंस पर प्रतिबंध लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय अभियान ने माइंस पर प्रतिबंध लगाने और भंडार को नष्ट करने की मांग की है। इस उद्देश्य के लिए 1997 में ओटावा संधि भी हुई। जिसे अभी तक कई देशों ने स्वीकार नहीं किया है। एंटी पर्सनल माइंस का इस्तेमाल एंटी टैंक माइंस के समान तरीके से किया जाता है। राष्ट्रीय सीमाओं के साथ स्थिर माइन फील्ड में या रणनीतिक पदों की रक्षा में लैंड माइन का उपयोग किया जाता है। एंटी पर्सनल माइंस के लिए विशिष्ट अन्य उपयोग वे हैं, जहां उन्हें घात लगाते समय, अस्थाई बेस की सुरक्षा करने, किसी हमलावर को एक संकीर्ण, साफ रास्ते से यात्रा करने के लिए मजबूर करने जहां दुश्मन पर गोलाबारी केंद्रित की जा सकें, माइंस को बूबी ट्रैप के रूप में इस्तेमाल करके उपकरणों की सुरक्षा करने आदि के लिए किया जाता है। आमतौर पर एंटी पर्सनल ब्लास्ट माइंस तब ट्रिगर होती है जब कोई उन पर कदम रखता है। उनका प्राथमिक उद्देश्य पीड़ित के पैर या टांग का उड़ा देना है, उन्हें अक्षम करना होता है। पीड़ित को मारने के बजाय घायल करना होता है। सेना ने बॉर्डर इलाकों में जासूसी रोकने के लिए यह तरीका अपनाया है।
बॉर्डर पर रहने वाले लोगों को अब रोज सावधान रहना होगा
अंतरराष्ट्रीय सीमा पार से आने वाले खतरे से निपटने के लिए स्थानीय लोगों को भी भारतीय सेना का साथ देना ही होगा। उन्हें अब इस चुनौती के साथ रहना स्वीकार करना ही होगा। साथ ही अब उनके धैर्य और सजगता की रोज परीक्षा होगी। दरअसल स्थानीय लोग ही सीमा के सच्चे प्रहरी हैं और अब तक के युद्धों में बॉर्डर के लोगों ने बड़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बॉर्डर के देशभक्त लोगों ने ही हिन्दुस्तान की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यही कारण है कि इतनी बार माइंस पकड़ में आने के बाद भी बॉर्डर के लोग उफ नहीं कर रहे क्योंकि वे देश की सुरक्षा की कीमत जानते हैं।
सीमा पार पाकिस्तान सामरिक गतिविधियां बढ़ा रहा ! भारत को अतिरिक्त सावधान रहने की जरूरत
जानकारी मिली है कि सीमा पार पाकिस्तान ने सामरिक गतिविधियां बढ़ा दी है। बॉर्डर के उस पार कई सामरिक कैंप चल रहे हैं जिसके माध्यम से भारत के इस पार होने वाली गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। पाकिस्तान लंबे समय से भारत पर नापाक नजर रखता आ रहा है। 1965 और 1971 में पाकिस्तान भारत पर हमला कर चुका है और तब से पश्चिमी राजस्थान सीमा अत्यंत ही संवेदनशील बनी हुई है। बॉर्डर के लोगों का मानना है कि सीमा पार पाकिस्तान बाज नहीं आता है। बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद शेख हसीना के भारत में शरण लेने के बाद से पाकिस्तान में परिस्थितियां तेजी से बदली है और बॉर्डर के उस पार सामरिक गतिविधियां बढ़ गई है। सेना इसको लेकर काफी अलर्ट है और पश्चिमी राजस्थान बॉर्डर पर इस बार विशेष ध्यान दे रही है।
