(हर मेजेस्टी क्वीन मदर आशी दोरजी वांगमों वांगचुक (बाएँ) मेरु गोखले (दाएँ) के साथ।)
हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष मुंशी प्रेमचंद की पोती सुश्री सारा रॉय ने कार्यक्रम को यादगार बना दिया
केबी व्यास. थिम्फू
राजधानी थिम्फू में भूटान एको का 3 अगस्त से 5 अगस्त तक 13 वां ड्रुक्यूल साहित्य और कला उत्सव मनाया गया। इसमें बुद्ध के पुनर्जन्म जैसे सवाल-जवाब छाए रहे। रॉयल भूटान विश्वविद्यालय में 3 अगस्त को पूरे उल्लास के साथ 13वें ड्रुक्यूल साहित्य और कला के कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। सवेरे ठीक 9-15 बजे हर मेजेस्टी द क्वीन मदर ग्यालयुम आशी दोरजी वांगमों वांगचुक का आगमन हुआ और भूटान-भारत की संयुक्त पहल पर 13 वां ड्रुक्यूल साहित्य और कला उत्सव का शुभारंभ हुआ। भूटान – भारत के संयुक्त तत्वावधान में यह उत्सव 2010 से मनाया जा रहा है, जिसमें इस वर्ष 14 देशों से 70 वक्ताओं के 34 सेशंस तथा 14 मनमोहक कार्यशालाएं हुईं।
कार्यक्रम की शुरुआत हर मेजेस्टी द क्वीन मदर ग्यालयुम आशी दोरजी वांगमों वांगचुक के सुश्री मेरु गोखले के साथ वार्तालाप से हुई, जिसमें मेरु गोखले ने पहला प्रश्न किया – क्या आप पुनर्जन्म में विश्वास करती हैं? क्या होता है आत्मा के साथ जब मृत्यु हो जाती है? क्या मृत्यु के बाद जीवन होता है? इन प्रश्नों के उत्तर में हर मेजेस्टी द क्वीन मदर ग्यालयुम आशी दोरजी वांगमों वांगचुक ने अपना बहुत ही निजी अनुभव सबके साथ साझा किया। उन्होंने बताया कि उन्हीं का दोहिता ट्यूक वांगचुग, वैरोचन रिम्पोचे बुद्ध का पुनर्जन्म है और ये अपने पिछले जन्म में नालन्दा विश्विद्यालय में अध्ययन करते थे और उसके पश्चात् वे नालन्दा विश्विद्यालय में ही अध्यापन कार्य करने लगे।
हर मेजेस्टी ने बताया कि उनके शाही परिवार में इस बच्चे ने 1300 वर्षों बाद के बाद पुनर्जन्म लिया है और ये भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी मिल चुके हैं। इनके कई सारे वीडियोज़ यू ट्यूब पर हैं। वैरोचन रिम्पोचे बुद्ध के बारे में बताते हुए हर मेजेस्टी ने कहा कि हम लोग उन्हें नालन्दा विश्विद्यालय तो ले ही गए, फिर तिब्बत भी गए और उन्होंने वहां कई सारी चीजों को पहचाना, हालांकि वे बता रहे थे कि मेरे ज़माने में तिब्बत अलग था और आज बहुत कुछ अलग है।
तो इस तरह से हर मेजेस्टी द क्वीन मदर ने कहा कि पुनर्जन्म होता है और मृत्यु के बाद जीवन होता है। उन्होंने कहा कि वो जन्म कहां होता यह मनुष्य के कर्मों पर निर्भर करता है। फिर हर मेजेस्टी ने कहा – कि आज हम यहां भूटान एको में एकत्रित हुए हैं, यह भी पिछले कर्मों के कारण है।
एक और वक्ता जो यहाँ आई हुई थी और जिन का नाम मैं लेना चाहूँगा वो हैं – सुश्री सारा रॉय का। जो हिन्दी साहित्य के शिखर प्रेमचंद की पोती हैं। उन्होंने प्रेमचंद के बारे में बहुत कुछ बताया । उन्होंने कहा कि किस तरह लमही ( प्रेमचंद का उत्तर प्रदेश में पैतृक स्थान) में प्रेमचंद को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए हज़ारों लोग आए थे। वो जुलाई का तपता महीना था और पांडाल के बाहर भी बहुत भीड़ थी। मैंने पहले तो ये सोचा कि ये लोग कौन हैं और यहाँ क्यों आए हैं ? फिर मैंने पता लगाया कि वे सारे लोग आम नागरिक थे जो केवल प्रेमचंद को श्रद्धांजलि देने के लिए आए थे। ऐसा इसलिए हुआ था क्यों कि प्रेमचंद ने ही आम आदमी को अपने लेखन में मंच पर ला खड़ा किया था। प्रेमचंद के साहित्य के पश्चात ही हिन्दी साहित्य में आम भाषा का प्रयोग हुआ और उनके चाचा जी ने प्रेमचंद को नाम दिया – कलम का सिपाही ।
3 अगस्त से लेकर 5 अगस्त तक का कार्यक्रम साहित्य और कला की दृष्टि से बहुत ही ज्ञानवर्धक रहा। भूटान की सांस्कृतिक परम्परा को साहित्य की दृष्टि से अपनी आंखों से देखने का मौक़ा मिला। अगले वर्ष पुनः मिलने का वादा कर कार्यक्रम का समापन हुआ ।
