अनिल भारद्वाज
नव संवत्सर बन आना
सभी मौसम सभी ऋतुओं को संग ले आना।
प्रिये नव संवत्सर बन के मेरे घर आना।
बन के सरसों के फूल यादें तेरी आतीं हैं।
मुझसे गेहूॅं की बालियों सी लिपट जातीं हैं।
अपनी यादों की पालकी में बैठ कर आना,
प्रिये नव संवत्सर बन के मेरे घर आना।
जब भी आते थे तो फागुन की तरह आते थे,
गुलमोहर सी दहकती तड़प छोड़ जाते थे।
सुनहरे पल मिलन के अपने संग ले आना,
प्रिये नव संवत्सर बन के मेरे घर आना।
याद आती है तेरे हाथों की बसंती छुअन,
विरह की तपती दुपहरी में झुलसता है बदन।
नीम की ठंडी-ठंडी छाया बन के आ जाना,
प्रिये नव संवत्सर बन के मेरे घर आना।
देखो इन मेरी बिना नींद वाली पलकें उठा,
प्यासे कजरारे नयन बन गये सावन की घटा।
नई सुबह नये दिन रात बन कर आ जाना,
प्रिये नव संवत्सर बन के मेरे घर आना।
गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर
नाचीज बीकानेरी
नुवों साल
नुंवै साल री पैली किरण
आछौ सन्देसो अबै लावैली
नित नुवीं तरक्की करसां
देस री साख जग में छावैली
भूखां नैं रोटी तिस्सां नैं पाणी
मिनखां री अबै आस जागैली
टाबर-टोळ्यां री किल्कारयां सूं
स्कूलां अबै सगळी भर जावैली
गांव – गांव मोकळी सुविधावां
सगळै जन जन नैं मिळ जावैली
आतंक रो अबै अंत करण सारु
भारत री जनता भी आगै आवैली
राज – काज रै भिर्ष्टिवाड़े नैं भी
मिटावण सारु जनता आगै आवैली
मूल्यां री गिरावट नैं भी रोकण सारु
आच्छै संस्कारां सूं नैतिकता आवैली
पाप रो घड़ो तो अबै सैंठो भरग्यो
अन्याय मिटण री खबरां ही आवैली
” नाचीज़ ” भूल जा पुराणी बातां नैं
नुवैं साल में नुवीं बातां ही आवैली
मईनुदीन कोहरी “नाचीज़ बीकानेरी”मो.9680868028
