जब चेती (चैत्र) माह की अमावस्या के बाद जब पहली बार चांद दिखाई देता है तो इस दिन को चेटीचंद के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व सिंधी समुदाय का विशेष पर्व है मान्यताओं के अनुसार इसी तिथि पर भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ था। झूलेलाल को वरुण देव, जल का देवता और समुद्र का स्वामी माना जाता है, ये सत्य और व्यवस्था के रक्षक भी माने जाते हैं।…
आलेख : डॉ. सीमा दाधीच, लेखिका और वरिष्ठ स्तंभकार
चैत्र मास प्रतिपदायानी नवसंवत्सर। एक दिवस जो गुड़ी पड़वा, वरुण देव,माता के आशीर्वाद से प्रारंभ हो गौतम ऋषि को समर्पित। सनातन परम्परा के अनुसार नव संवत्सर को लेकर अनेक प्रसंग ओर धार्मिक आधार माने गए हैं। सनातन धर्म में वर्ष प्रतिपदा का विशेष महत्व है। इसलिए यह दिन सनातनियों के विशेष महत्व रखता है। माना यह जाता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि की रचना का पहला दिन है, मान्यता यह है कि ब्रह्मा जी ने इसी दिन सृष्टि की रचना की थी। इस दिन को गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा के नाम से भी जाना जाता है।
सिंधी में चैत्र महीने को चेत कहा जाता है। ऐसे में जब चेती (चैत्र) माह की अमावस्या के बाद जब पहली बार चांद दिखाई देता है तो इस दिन को चेटीचंद के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व सिंधी समुदाय का विशेष पर्व है मान्यताओं के अनुसार इसी तिथि पर भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ था। झूलेलाल को वरुण देव, जल का देवता और समुद्र का स्वामी माना जाता है, ये सत्य और व्यवस्था के रक्षक भी माने जाते हैं। ऋतु परिवर्तन में वरुण देव के आशीर्वाद का विशेष महत्व बन जाता है। वे सिंधी समाज के प्रमुख देवता हैं। चेटीचंड का पर्व सत्य, अहिंसा, भाईचारे और प्रेम का संदेश देता है, जो आज भी सिंधी समाज के मूल जीवन मूल्यों में शामिल हैं। इस पर्व के दौरान लकड़ी का मंदिर बनाकर उसमें ज्योति प्रज्वलित की जाती है, जिसे बहिराणा साहब कहा जाता है।
महर्षि गौतम का अवतरण दिवस, जिसे गौतम ऋषि जयंती भी कहा जाता है। वह भी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। महर्षि गौतम ‘अक्षपाद’ या ‘अक्षचरण’ नाम से भी प्रसिद्ध हैं। अक्षपाद नाम के सम्बन्ध में एक रोचक लोक कथा है। कहा जाता है कि महर्षि गौतम प्रतिदिन निस्तब्ध रात्रि में एकान्त भ्रमण करते और शास्त्रचिन्तन में तल्लीन हो सूत्ररचना करते चलते थे। वे अपनी विचारधारा में इतने मग्न हो जाते थे कि आगे क्या है, इसकी उन्हें कुछ भी सुध नहीं रहती थी। एक दिन वे किसी पदार्थ का विश्लेषण करते-करते कुएँ में जा गिरे। इस प्रकार उनके चिन्तन में बाधा पड़ते देख विधाता ने उनके पाँवों में भी दृष्टिशक्ति प्रदान कर दी। तबसे वे ‘अक्षपाद’ (जिसके पाँव में आंख हो) कहलाने लगे।
गौतम ऋषि न्याय दर्शन के प्रणेता थे और उन्होंने न्यायसूत्र नामक ग्रंथ की रचना की थी। गौतम को मेधातिथि नाम से भी जाना जाता है इसका उल्लेख महाभारत के शांति पर्व में मिलता है । इसमें न्यायकर्ता मेधातिथि का जिक्र किया गया है। महर्षि गौतम सप्तर्षियों में से एक ऋषि के रूप में जाना जाता है। महर्षि गौतम का संबंध त्रयंबक क्षेत्र (ब्रह्मगिरी) से भी जोड़ा जाता है। महर्षि गौतम की तपस्या से प्रसन्न होकर ही भगवान महादेव ज्योतिर्लिंग के रूप में त्रयंबकेश्वर, नासिक के पास में स्थापित हुए थे। ऐसी मान्यता है कि उस क्षेत्र में गौतमी गंगा (गोदावरी) का अवतरण महर्षि गौतम की तपस्या के कारण ही संभव हो सका। ब्रह्मगिरी को महर्षि गौतम की तपोभूमि माना जाता है। गौतम ऋषि वैदिक काल के एक महर्षि एवं मन्त्रद्रष्टा थे। उत्तरप्रदेश की गोमती नदी भी ऋषि गौतम के ही नाम से विख्यात है।
ऋग्वेद में उनके नाम से अनेक सूक्त हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या थीं जो प्रातः काल स्मरणीय पंच कन्याओं में गिनी जाती हैं। अहिल्या ब्रह्मा की मानस पुत्री थी जो विश्व मे सुंदरता में अद्वितीय थी। भगवान हनुमान की माता अंजनी गौतम ऋषि और माता अहिल्या की पुत्री थी। महर्षि गौतम परम तपस्वी एवं संयमी थे। धनुर्धर तथा स्मृतिकार महर्षि गौतम बाण विद्या में अत्यन्त निपुण थे।
पौराणिक कथाओं के अनुसार दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने देवताओं द्वारा तिरस्कृत होने के बाद अपनी दीक्षा गौतम ऋषि से पूर्ण की थी।अहिल्या जो गौतम ऋषि की पत्नी थी वो सृष्टि की पवित्रतम पाँच कन्याओं में से एक मानी जाती थी जो महर्षि गौतम के श्राप से पाषाण बन गयी थी। त्रेता युग में भगवान श्रीराम की चरण- रज से अहिल्या का श्रापमोचन हुआ, जिससे वह पाषाण से पुन: ऋषि पत्नी बनी। यानी हम यह भी कह सकते है कि वर्ष प्रतिपदा हमारे जीवन में अनेक उपलब्धियों से परिपूर्ण है।
